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नागरिक सुरक्षा

साप्ताहिक मंथन
टी. एन. नाइनन /  August 02, 2019

वी जी सिद्धार्थ के लिखे कथित 'सुइसाइड नोट' (आत्महत्या के पूर्व लिखी बातें) में ऐसी परेशानियों का जिक्र है जिनके कारण उन्हें मरणोपरांत सहानुभूति मिल रही है। उन्होंने जिन समस्याओं का जिक्र किया है उनमें कर अधिकारियों द्वारा परेशान किए जाने का उल्लेख है। इसके बाद आय कर विभाग ने एक विस्तृत नोट जारी किया जिसमें कहा गया है कि अब हमारे बीच नहीं रहे 'कॉफी किंग' ने 350 करोड़ रुपये की अघोषित आय होने की बात स्वीकार की थी। हालांकि मामले की जानकारी रखने वाले एक व्यक्ति का कहना है कि कर अधिकारियों ने सिद्धार्थ की हिस्सेदारी वाले शेयर जब्त कर जल्दबाजी दिखाई थी। सारे तथ्य धीरे-धीरे सामने आएंगे। संभव है कि यह मामला भी तमाम अन्य मामलों की तरह दोहरेपन का निकले। हमारे कई कारोबारियों को ऐसे ही काम करना पड़ता है।

 
कर प्रशासन द्वारा परेशान करने के आरोप के बाद कारोबारी समुदाय और आम जनता से प्रतिक्रिया मिल रही है। वित्त मंत्री इस मुद्दे से भलीभांति अवगत हैं। अपने बजट भाषण में उन्होंने प्राचीन संगम साहित्य का उल्लेख करते हुए कहा कि अगर हाथी धान के खेत में घुस जाए तो वह जितना खाए, उससे कहीं बहुत ज्यादा रौंदकर नुकसान पहुंचाएगा। लगभग 15 वर्ष पहले वित्त मंत्री रहे जसवंत सिंह ने अपने बजट भाषण में कहा था, 'हमें यह स्वीकार करना होगा कि हमारे नागरिकों का अनिवार्य उद्यमी चरित्र और उनकी रचनात्मकता हमारी सबसे बड़ी पूंजी है।' उन्होंने कहा कि वह आशंका से ग्रस्त, शोषण करने वाली व्यवस्था के बजाय आपसी विश्वास पर आधारित व्यवस्था लागू करना चाहते हैं। उन्होंने यह भी कहा था कि वह अपने देश के नागरिकों के भरोसे पर ऐसा कर रहे हैं। सिंह ने यह कहकर अपना कद ऊंचा कर लिया था कि करदाताओं के साथ अदब से पेश आना चाहिए। यह याद करना बेहतर होगा कि उन्होंने क्या करने की बात कही थी, 'पहला, किसी जांच या जब्ती अभियान के दौरान मिलने वाले शेयरों को किसी भी हालत में जब्त नहीं किया जाएगा। दूसरा, ऐसी जांच या जब्ती अभियान के दौरान कोई स्वीकारोक्ति नहीं ली जाएगी। तीसरा, संयुक्त आयकर आयुक्त के दर्जे के नीचे किसी भी अधिकारी को सर्वे अभियान की अनुमति देने का अधिकार नहीं होगा। आखिर में, सर्वे में मिले बहीखातों को बिना मुख्य आयुक्त की पूर्व मंजूरी के 10 दिन से अधिक जब्त नहीं रखा जाएगा।'
 
जिन कारोबारियों के यहां ऐसी कर जांच या जब्ती हुई है वे इस बात की पुष्टि कर सकते हैं कि इन वादों को पूरा किया गया या नहीं। सकारात्मक पहलुओं पर बात करें तो डिजिटल तकनीक के इस्तेमाल ने औसत करदाताओं के लिए कर प्रक्रिया को सहज और सुरक्षित बनाया है। इसने करदाताओं और कर आकलन करने वाले अधिकारियों के सीधे संपर्क की जरूरत समाप्त कर दी है। इस बात ने भी काफी हद तक शोषण और रिश्वत पर लगाम लगाई है। इसके अतिरिक्त मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल की शुरुआत के साथ ही दो दर्जन से अधिक कर अधिकारियों को भ्रष्टाचार के आरोप में अपना सामान समेटना पड़ा। माना जा रहा है कि इससे नीचे कड़ा संदेश गया होगा। लॉर्ड एक्टन की कहावत याद करें तो सत्ता में भ्रष्ट करने की प्रवृत्ति होती है और पूर्ण सत्ता पूरी तरह भ्रष्ट कर देती है। ऐसे में देखें तो मौजूद कर एवं अन्य छापों में एक खास रुख नजर आता है: इस दौरान सरकार के विरोधियों या आलोचकों पर कार्रवाई की गई। इस बीच सरकार उन विधानों को सरकारी मंजूरी दिलाने में लगी रही जो कई विभागों में अधिकारियों को कई प्रकार से मजबूत बनाते हैं। जबकि बचाव के तरीके बहुत कम हैं। इस दौरान अधिकारों को बहुत हद तक केंद्र सरकार के पास केंद्रीकृत रखा गया है।
 
अब संभव है कि तेज वाहन चलाने जैसे यातायात नियमों का उल्लंघन करने वालों को जेल हो सकती है। अन्य देशों में ऐसे अत्यधिक विशिष्ट मामलों में भी बड़ा जुर्माना लगाया जाता है। गृह मंत्री ने आश्वस्त किया है कि सरकार के कई नए अधिकारों का दुरुपयोग नहीं किया जाएगा। लेकिन क्या सबसे शक्तिशाली और नेक इरादों वाले मंत्री भी ऐसे देश में यह गारंटी दे सकते हैं जहां हर व्यक्ति जानता है कि ताकत का दुरुपयोग आम बात है। क्या यह ज्यादा बेहतर नहीं होगा कि जसवंत सिंह के तर्ज पर नरमी बरती जाए?
 
खासकर उन्नाव जैसे घटनाक्रम के बाद, जब लोगों को लगने लगा है कि पुलिस से 25 बार अनुरोध करने के बाद भी आम नागरिकों को जरूरी सांविधिक संरक्षण नहीं मिल पा रहा। हालांकि वे असंगत तरीके से लगाए जाने वाले जुर्मानों के खतरों से भी खीझ में रहते हैं।
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