बिजनेस स्टैंडर्ड - ब्रांड की विदाई का आ गया वक्त?
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ब्रांड की विदाई का आ गया वक्त?

अजित बालकृष्णन /  August 01, 2019

विपणन की सफलता का आकलन करने में जिस तरह डेटा का इस्तेमाल बढ़ रहा है उससे यह सवाल उठता है कि क्या ब्रांड का अंत हो जाएगा? विस्तार से बता रहे हैं अजित बालकृष्णन 

 
अतीत के अकादमिक गर्व और दिखावे की अनदेखी कीजिए। भाषाई दलीलों को तो भूल ही जाइए। आज डेटा यानी आंकड़ों का जमाना है। डेटा विज्ञान विपणन (मार्केटिंग) का नया हथियार है।  मैंने जब यह बात लिखने वाले के बारे में जानकारी जुटाई तो आश्चर्य से अपनी आंख मलता रह गया। इसे लिखने वाले शख्स का ताल्लुक नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी से था। यही वह विश्वविद्यालय है जहां से प्रोफेसर फिलिप कोटलर आते हैं। कोटलर ने ब्रांड मार्केटिंग की अवधारणा प्रस्तुत की। सन 1967 में आई उनकी किताब 'मार्केटिंंग मैनेजमेंट: एनालिसिस, प्लानिंग ऐंड कंट्रोल' आज 52 वर्ष बाद भी दुनिया के हर कारोबारी स्कूल के लिए अनिवार्य मानी जाती है।
 
मैंने पहले पैराग्राफ में जिस वाक्य का इस्तेमाल किया वह थॉमस मिलर की किताब 'मार्केटिंग डेटा साइंस' से लिया गया है। मिलर स्वयं नॉर्थवेस्टर्न विश्वविद्यालय में हैं। परंतु कोटलर की किताब के उलट यह किताब कंप्यूटर आधारित मॉडल से भरी हुई है और इसमें कंप्यूटर प्रोग्रामिंग की भाषा आर और पाइथन की मदद से मार्केटिंग के मॉडल तैयार किए गए हैं। अगर प्रोफेसर मिलर की बातें सही हैं तो निश्चित रूप से आने वाले दिनों में हमें यकीनन आज की बड़ी और समृद्घ बाजार शोध कंपनियों, विज्ञापन एजेंसियों, जनसंपर्क कंपनियों आदि की आवश्यकता नहीं पडऩे वाली। इसके अलावा उत्पाद प्रबंधक, विपणन प्रबंधक जैसे रोजगार भी खतरे में पड़ जाएंगे। मीडिया उद्योग की बात करें तो उसका तो जीवन ही विज्ञापन से होने वाली आय है। इसके आधार पर ही ब्रांड बनते और चलते हैं। कहने का मतलब यह कि संपाश्र्विक क्षति न केवल बॉलीवुड के सितारों को नुकसान पहुंचाएगी बल्कि क्रिकेट, फुटबॉल और टेनिस जैसे खेलों को भी, जिनके खिलाडिय़ों को विभिन्न ब्रांड भारी राशि देते हैं। 
 
ये तमाम आकर्षक उद्योग इस धारणा पर टिके हुए हैं कि हर उत्पाद या सेवा के भौतिक गुणों या उसकी कीमत से परे एक खास तत्त्व है जो उसके ब्रांड में समाहित है। ब्रांड के अपने तमाम तत्त्व होते हैं। ब्रांड नाम विशिष्ट और आकर्षक होना चाहिए, एक टैगलाइन होनी चाहिए जो चार या पांच शब्दों में ब्रांड की खासियत समेटे रहे। मिसाल के लिए नाइकी की टैगलाइन कहती है: जस्ट डू इट। इसके अलावा इसमें रचनात्मकता की अलग भूमिका होती है। एक ब्रांड इन सारी चीजों से मिलकर बनता है। 
 
इन अवधारणाओं के इस्तेमाल की शुरुआती सफलता अमेरिका में नजर आई जहां सन 1947 में डी बियर्स के 'डायमंड्स आर फॉर एवर' (हीरा है सदा के लिए) अभियान ने हीरे को अमीरों के अलावा आम लोगो के बीच प्रेम की अभिव्यक्ति की प्रतीक बना दिया। सन 1954 में मार्लबोरो मैन अभियान ने मार्लबोरो सिगरेट को शानदार मर्दों की पसंद के तौर पर स्थापित किया। इस बीच कोलगेट पामोलिव, यूनिलीवर और अन्य कंपनियों के साबुनों के विज्ञापनों की भरमार रही। सन 1950 के दशक में साबुनों के इन विज्ञापनों का इतना प्रभाव था कि जिन रेडियो और टेलीविजन कार्यक्रमों में ये विज्ञापन आते थे उनको सोप ओपेरा कहा जाने लगा। उन आर्थिक और तकनीकी ताकतों पर पुनर्दृष्टि डालना उचित है जिनकी बदौलत ब्रांड विज्ञापनों का यह जबरदस्त सिलसिला शुरू हुआ। 
 
ऐसा इसलिए क्योंकि ये हमें मौजूदा ब्रांड विरोधी गतिविधियों को समझने में मदद कर सकते हैं। 20वीं सदी के शुरुआती दौर में रासायनिक तकनीक का उदय हो चुका था और इसके चलते रसायनों के माध्यम से बनने वाले व्यापक उत्पाद मसलन साबुन, डिटर्जेंट, सिगरेट, नाश्ते में काम आने वाले अनाज आदि चीजें आसपास की छोटी-मोटी किराना दुकानों की शोभा बढ़ाने लगे। खासतौर पर अमेरिका में इन वस्तुओं के बड़े उत्पादकों पर अपनी वस्तुओं को दूसरों से अलग दिखाने का दबाव था। विज्ञापनों पर भारी खर्च करने की उनकी इच्छा के कारण अचानक उभार और वृद्घि देखने को मिली। पहले उनका विस्तार बढ़ा और उसके बाद रेडियो और टेलीविजन पर विज्ञापनों का दौर शुरू हुआ। सन 1960 के दशक में ब्रांड इक्विटी जैसी अवधारणाएं चर्चा में आने लगीं, विज्ञापन एजेंसियों ने ऐसी सेवाएं प्रदान करना शुरू कर दिया। कोटलर ने इसी संदर्भ में मार्केटिंग का सिद्घांत दिया था और कहा था कि मांग को प्रभावित करने में ब्रांड उतना ही प्रभावी है जितनी कि मांग। 
 
एक संभावना यह भी है कि प्रोफेसर मिलर की तरह सोचने और ब्रांड छवि या ब्रांड की अवधारणा को खारिज करना केवल एक किस्म की अतिरंजना हो जिसका संबंध नई तकनीक के आगमन से है। सलाहकार फर्म गार्टनर ने इसे लेकर एक सिद्घांत पेश किया है जिसे वे 'हाइप साइकिल' कहते हैं। हाइप साइकिल की शुरुआत तब होती है जब कोई तकनीकी नवाचार तो हो गया हो लेकिन वाणिज्यिक रूप से व्यवहार्य और इस्तेमाल करने लायक उत्पाद अभी सामने आने हों। बहरहाल शुरुआती प्रचार जल्दी ही उम्मीदों का बोझ भी डाल देता है। जल्दी ही पता चलता है कि इसके साथ ढेर सारी नाकामियां भी जुड़ी हैं और सफलताएं बहुत सीमित हैं। इसके बाद आता है मोहभंग का दौर। कई उत्पादक कारोबार से बाहर हो जाते हैं जबकि कई अन्य साहस के साथ डटे रहते हैं और शुरुआती तौर पर अपने उत्पाद बना लेते हैं। इसके पश्चात आता है वह दौर जहां कई वर्ष लंबी अवधि के बाद उत्पाद सामने आता है और मूल वादे के परीक्षा की घड़ी होती है। इसके पश्चात ही नई तकनीक को अपनाने का सिलसिला शुरू होता है। 
 
फिलहाल क्लिक, फॉर्म भरने, कार्ट में शामिल करने, ऑर्डर, ऑर्डर स्वीकार करने के रूप में विपणन के जो तरीके सामने आ रहे हैं और इन्हें लेकर जो आपाधापी है वह आकलन के उन पुराने तौर तरीकों से एकदम अलग है जहां इस आधार पर जांच परख की जाती थी कि उत्पाद के कितने प्रतिशत संभावित ग्राहक उसे लेकर जागरूक हैं, किनकी उसमें रुचि है, लेने के इच्छुक हैं या ले चुके हैं। देखने पर यह एक किस्म की प्रगति को परिलक्षित करता है क्योंकि यह वास्तविक नतीजों का आकलन करता है। परंतु शुरुआती चरणों का आकलन न करके क्या हम ऑनलाइन विज्ञापन तकनीक को हाइप साइकिल में मोहभंग के खतरनाक चरण की ओर ले जा रहे हैं? हकीकत के करीब आकलन तभी हो पाएगा जब वही मशीन से सीखने वाला मॉडल जागरूकता, रुचि और इच्छा जैसे शुरुआती चरणों पर भी लागू होगा और आकलन करेगा। कहा जा सकता है कि गणितीय नवाचार का एक बड़ा स्वरूप अभी हमारे सामने आना शेष है। 
 
(लेखक 22 भारतीय भाषाओं में एक पुस्तक लिख रहे हैं। यह पुस्तक नि:शुल्क होगी और कक्षा 8 के बच्चों को मशीन लर्निंग से परिचित कराएगी।)
Keyword: company, brand, digital, data,,
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