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नौ महीने के उच्चस्तर पर एफपीआई की निकासी

पुनीत वाधवा और दीपक कोरगांवकर / नई दिल्ली/मुंबई July 31, 2019

विदेशी निवेशकों ने जुलाई में भारतीय इक्विटी से 11,000 करोड़ रुपये (करीब 2 अरब डॉलर) से ज्यादा की निकासी की, जो नौ महीने का सर्वोच्च स्तर है। बजट 2019-20 में घोषित सुपर-रिच पर कर समेत कई तरह के अवरोध के चलते एफपीआई ने यह कदम उठाया। जून में लगातार पांचवें महीने शुद्ध खरीदार रहे विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने जुलाई में 12,419 करोड़ रुपये यानी करीब 2.03 अरब डॉलर की निकासी की। यह अक्टूबर 2018 के बाद की सबसे बड़ी निकासी है जब उन्होंने इक्विटी बाजार से 28,921 करोड़ रुपये यानी 3.93 अरब रुपये निकाले थे। डिपॉजिटरी के आंकड़ों के मुताबिक, फरवरी और जून 2019 के बीच विदेशी निवेशकों ने 82,910 करोड़ रुपये यानी 12.7 अरब डॉलर का निवेश किया था।

 
इक्विरस सिक्योरिटीज के प्रबंध निदेशक अजय गर्ग ने कहा, एफपीआई के लिए ज्यादा कराधान निराशाजनक कदम है। नीतिगत मोर्चे पर सरकार की तरफ से स्पष्टता का अभाव है, जिसकी वजह से कुछ हद तक विदेशी संस्थागत निवेशक परेशान हुए हैं। माह के दौरान एफपीआई की बिकवाली से बेंचमार्क सूचकांकों एसऐंडपी बीएसई सेंसेक्स (करीब 5 फीसदी नीचे) और निफ्टी-50 (करीब 6 फीसदी नीचे) ने सितंबर 2018 के बाद सबसे तेज मासिक गिरावट दर्ज की है। सितंबर 2018 में ये सूचकांक क्रमश: 6.2 फीसदी व 6.4 फीसदी टूटे थे। हालांकि घोषणा के बावजूद एफपीआई का शुद्ध रूप से संचयी निवेश मौजूदा कैलेंडर वर्ष में अब तक सकारात्मक बना हुआ है। कैलेंडर वर्ष 2019 के पहले सात महीने में एफपीआई ने 66,228 करोड़ रुपये का निवेश किया है। साल 2018 की समान अवधि में वे 3,411 करोड़ रुपये के शुद्ध बिकवाल थे।
 
विशेषज्ञोंं ने कहा, कर प्रस्तावों के अलावा विदेशी निवेशक उपभोग में गिरावट, कंपनियों की कमजोर आय और मॉनसून में नरमी के बीच आर्थिक बढ़त की रफ्तार को लेकर भी चिंतित हैं। आने वाले समय में भारत में उनका आवंटन वैश्विक संकेतों, प्रमुख देसी आर्थिक संकेतकों और सरकार की तरफ से सामने रखी जाने वाली नीतियों पर निर्भर होगा। नोमूरा की प्रबंध निदेशक और मुख्य अर्थशास्त्री (भारत) सोनल वर्मा ने ए नंदी के साथ लिखी रिपोर्ट में कहा है, अल्पावधि में हमारा मानना है कि दूसरी तिमाही भी मुश्किल भरी रह सकती है। यह बैंकिंग संकट व कमजोर वैश्विक बढ़त का नतीजा है।
 
दूसरी ओर देसी म्युचुअल फंड निचले स्तर पर शेयर की खरीद कर रहे हैं। इक्विटी में उनका शुद्ध निवेश अक्टूबर 2018 के बाद पहली बार 10,000 करोड़ रुपये के पार निकल गया। 30 जुलाई 2019 मंगलवार तक वे 10,218 करोड़ रुपये के शुद्ध खरीदार रहे। विश्लेषकों ने कहा, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की तुलना में एफपीआई निवेश की प्रकृति ज्यादा उतारचढ़ाव वाली होती है। चूंकि अमेरिकी फेडरल रिजर्व की मौद्रिक नीति उदार रह सकती है, लिहाजा इसका असर आने वाले दिनों में भारत समेत अन्य उभरते बाजारों पर पड़ सकता है।
 
एवेंडस कैपिटल ऑल्टरनेट स्ट्रैटिजीज के मुख्य कार्याधिकारी एंड्र्यू हॉलैंड ने कहा, जून तिमाही में कंपनियों की आय बहुत अच्छी नहीं रही है और दूसरी तिमाही भी मुश्किल भरी होगी। भारत में एफपीआई का निवेश वैश्विक माहौल पर भी निर्भर करेगा। अमेरिकी फेडरल रिजर्व ब्याज दरें घटा सककता है और हमें उनकी टिप्पणी पर नजर डालने की दरकार होगी। इंडेक्स के स्तर पर पहले ही काफी क्षति हो चुकी है और जुलाई में यह करीब 7 फीसदी टूट चुका है। ऐसे में सापेक्षिक तौर पर अगर वैश्विक बाजार गिरता है तो भारतीय बेंचमार्क कम टूट सकते हैं। 
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