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महज सूचकांक से नहीं लगता प्रगति का सही अंदाजा

जिंदगीनामा
कनिका दत्ता /  July 30, 2019

वैश्विक स्तर पर अपने प्रदर्शन को आंकने के लिए आतुर देशों की नजर में वैश्विक सूचकांक तेजी से मापदंड बनते जा रहे हैं। खास तौर पर प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) के लिए जद्दोजहद कर रहे विकासशील देशों के बीच इन सूचकांकों को लेकर खास आकर्षण देखा जा रहा है। सवाल है कि क्या इन सूचकांकों को किसी देश की प्रगति का सटीक संकेत माना जा सकता है? कई सूचकांकों में भारत के अलग-अलग प्रदर्शन को देखें तो इसमें संदेह की काफी गुंजाइश नजर आती है।  मसलन, हाल ही में जारी वैश्विक नवाचार सूचकांक में भारत की रैंकिंग के पांच स्थानों के सुधार के साथ 52वें नंबर पर पहुंच जाने को लेकर अच्छा-खासा रोमांच देखा गया है। इसी तरह कुछ समय पहले आई विश्व बैंक की कारोबारी सुगमता रैंकिंग में भी भारत का स्थान 100 से उछलकर 77 पर आ गया था। मोदी सरकार की तरफ से उठाए गए कुछ सकारात्मक कदमों का इस जबरदस्त उछाल में योगदान रहा है। सरकार ने कारोबारी सुगमता रैंकिंग में शामिल मापदंडों पर नजदीकी नजर रखने के लिए एक कार्यबल गठित किया था। वाणिज्य मंत्रालय की विज्ञप्ति के मुताबिक, इन कोशिशों का नतीजा यह हुआ है कि पिछले चार वर्षों में भारत की रैंकिंग में 65 पायदान का सुधार देखने को मिला है। 

 
वैश्विक नवाचार सूचकांक को पहली बार किसी विकासशील देश में जारी किया गया है। नई दिल्ली में आयोजित इस कार्यक्रम में वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने जोशीले अंदाज में कहा कि 'एक नया नजरिया भारत की नई पहचान बन चुका है और हम एक अधिक समृद्ध देश बनते जा रहे हैं।' उनके ये शब्द उत्तेजना जगाते हैं लेकिन मौजूदा हालात को बढ़ा-चढ़ाकर भी पेश करते हैं। हमारे पास भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) और भारतीय विज्ञान संस्थान (आईआईएससी) जैसे कुछ विश्वस्तरीय शिक्षण संस्थान हैं और हम वैश्विक स्तर पर आईटी एवं इंजीनियरिंग क्षेत्र की बड़ी ताकत भी हैं। फिर भी यह सोचने वाली बात है कि भारतीय दूरसंचार उद्योग 5जी सेवाओं की शुरुआती तैयारियों के मामले में चीन, कोरिया एवं अमेरिकी कंपनियों पर ही आश्रित है। दवा क्षेत्र से इतर भारतीय कंपनी जगत शोध एवं विकास के मद में बहुत कम खर्च करता है और शायद ही कोई ऐसा हफ्ता गुजरता होगा जब कोई टिप्पणीकार या विश्लेषक चीन की वैश्विक तकनीकी महारत का जिक्र नहीं करता है। चीन का शोध एवं विकास पर प्रति व्यक्ति व्यय भारत की तुलना में आठ गुना है। 
 
इसके बावजूद निस्संदेह यह सरकार नवाचार को बढ़ावा देने में सही मायने में रुचि ले रही है। विश्व बौद्धिक संपदा संगठन ने भी नीतिगत परिवेश में सुधार और बौद्धिक संपदा अधिकारों के आवंटन एवं परीक्षण में लगने वाला समय कम करने के लिए किए गए प्रयासों की सराहना की है। लेकिन बड़ी समस्या यह है कि कुछ खास सूचकांकों में प्रदर्शन सुधारने पर ध्यान देने भर से मनचाहा नतीजा नहीं सुनिश्चित किया जा सकता है। कारोबारी सुगमता रैंकिंग में प्रदर्शन सुधरने के बावजूद एफडीआई प्रवाह में कोई खास अंतर नहीं आया है (असल में यह घट ही गया है)। इसी तरह नवाचार सूचकांक में भारत की रैंकिंग सुधरने से वह अचानक वैश्विक स्तर पर तकनीकी चैंपियन नहीं बनने जा रहा है क्योंकि ऐसी उपलब्धियां एकाकीपन में नहीं होता है।
 
इन दिनों बढ़ रही सूचकांकों की भीड़ में से किसी पर भी नजर डालें तो एक पैटर्न दिखेगा। इन सूचकांकों में अमेरिका, स्कैंडेनेविया, जर्मनी, चीन, ताइवान और सिंगापुर शीर्ष स्थानों पर मौजूद होते हैं। ये देश न केवल कारोबारी सुगमता एवं नवाचार जैसे मानकों पर काफी आगे हैं बल्कि मानव विकास सूचकांक और जीवन की गुणवत्ता से संबंधित मापदंडों पर भी उनकी स्थिति काफी मजबूत है। अकेले मानव विकास सूचकांक को ही देखें तो भारत लगातार पीछे खिसकता जा रहा है। वर्ष 2018 में भारत 189 देशों में से 130वें स्थान पर रहा और एक साल पहले की तुलना में उसकी रैंकिंग में केवल एक स्थान का ही सुधार हुआ था। हालत यह है कि भारत कई पैमानों पर पाकिस्तान, बांग्लादेश और सहारा क्षेत्र के अफ्रीकी देशों से भी पीछे रहा। भ्रष्टाचार धारणा सूचकांक में भारत की स्थिति 180 देशों में से 78वें स्थान पर ही है जो एक साल पहले के 81वें स्थान से मामूली सुधार ही दिखाता है। यह भी गौर करने वाली बात है कि वैश्विक प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में भारत की रैंकिंग दो स्थान की गिरावट के साथ 180 देशों में से 140वीं पर खिसक गई है।
 
अनूठे सूचकांकों के मामले में भी भारत की स्थिति कोई बेहतर नहीं है। विश्व खुशहाली सूचकांक को ही लीजिए। इसमें फिनलैंड के लोगों को सबसे खुशहाल बताया गया है। लेकिन छह महीने तक सूरज नहीं देख पाने वाले और अजीब तरह के खानपान वाले लोगों को भला इतना खुश क्यों होना चाहिए? दूसरी तरफ अतुल्य भारत, खूबसूरत पर्यटक स्थलों एवं दुनिया की बेहतरीन खानपान वाली जगह होते हुए भी भारत की 140वीं रैंकिंग खटकती है। खुशहाली रिपोर्ट में भारत भूटान, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल और श्रीलंका से भी नीचे मौजूद है।
 
हमारी कंपनियों का प्रदर्शन भी अच्छा नहीं है। संवेदना सूचकांक में कंपनियों का आकलन आंतरिक संस्कृति, सीईओ के प्रदर्शन, नैतिकता पालन और सोशल मीडिया मौजूदगी के आधार पर किया जाता है। आजकल कंपनी प्रबंधन के बीच संवेदना काफी पसंदीदा शब्द है। शीर्ष 20 संवेदनशील कंपनियों में एक भी भारतीय कंपनी शामिल नहीं है। वहीं सबसे कम संवेदनशील कंपनियों की 20 कंपनियों की सूची में भारत की आठ कंपनियां जरूर शामिल हैं।  इसका मतलब है कि सूचकांकों में भारत की स्थिति सुधारने के लिए कार्यबल बनाने से कहीं अधिक प्रयास करने होंगे। लेकिन यह भी तय है कि इन मानदंडों पर सुधार लाए बगैर प्रगति के रास्ते पर बढ़ पाना भी मुश्किल होगा।
Keyword: FDI, india, world bank,,
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