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मोदी की वापसी से स्तब्ध क्यों बाजार?

देवाशिष बसु /  July 30, 2019

यदि आज बाजार प्रतिभागी नाराज हैं तो शायद इसकी वजह यह है कि इतने वर्षों तक वे सपनों की दुनिया में जी रहे थे। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं देवाशिष बसु

 
बजट के पहले सेंसेक्स 39,908 के स्तर पर था और अब तक करीब 2,500 अंक फिसल चुका है। कुल मिलाकर निराशा का भाव है। सेंसेक्स जून के अंत में उच्चतम स्तर पर पहुंचा था। अगर आप सोशल मीडिया पर एक घंटा या इससे कुछ अधिक समय बिताते हैं तो आपको निरंतर इस सरकार की नीतियों की आलोचना सुनने को मिलेगी। यह सुनने को मिलेगा कि सेंसेक्स की इस ऊंचाई की आड़ में जो संपत्ति तिरोहित हुई, वह इन नीतियों की बदौलत ही हुई। ऐसी टिप्पणियां की जा रही हैं कि एक महीना भी नहीं हुआ और मोदी के दूसरे कार्यकाल से जुड़ी सारी सद्भावना समाप्त हो चुकी है। इसके लिए बजट के स्तरहीन होने को वजह बताया जा रहा है। कहा जा रहा है कि यह भारतीय राजनीति का सबसे छोटा मधुमास साबित हुआ।
 
गत वर्ष बजट में सबसे बड़ा झटका दीर्घावधि के पूंजीगत लाभ (एलटीसीजी) कर के रूप में सामने आया था। इस वर्ष लाभांश पर कर और पुनर्खरीद पर कर लगाया गया है। इसके अलावा प्रवर्तक हिस्सेदारी को घटाकर 65 फीसदी करने और सालाना 2 से 5 करोड़ रुपये अर्जित करने वाले लोगों के व्यक्तिगत आय कर में 3 फीसदी और 5 करोड़ रुपये से अधिक की वार्षिक आय वालों पर लगने वाले कर में 7 फीसदी का इजाफा किया गया है। सरकारी खजाने के दम पर आराम का जीवन जी रहे राजनेता और अधिकारी अमीरों को आदेश दे रहे हैं कि वे गरीबों के लिए छोटा-मोटा बलिदान दें। हम इंदिरा गांधी के जमाने से ऐसा होते देख रहे हैं लेकिन इसके लिए जो समय चुना जाता है वह महत्त्वपूर्ण होता है। सरकार जहां समृद्ध कंपनियों और निवेशकों से अधिक से अधिक पैसा जुटाने में लगी हुई है, वहीं वह आर्थिक मंदी, रोजगार की कमी, निवेश में मामूली इजाफे और अपने व्यय में भारी इजाफे के लिए भी वही उत्तरदायी है।
 
सपनों की दुनिया से बाहर 
 
आज यदि बाजार प्रतिभागी नाराज हैं तो इसकी वजह शायद यह है कि वे इतने वर्षों तक स्वप्न लोक में थे। नरेंद्र मोदी को जहां आबादी के हर तबके ने वोट दिया वहीं कारोबारी, वित्तीय और निवेशक समुदाय का उन्हें खास समर्थन हासिल रहा। पांच वर्ष तक फंड प्रबंधक, विश्लेषक और कारोबारी बदलाव के हर वादे में यकीन करते नजर आए। उन्होंने तमाम सही-गलत आंकड़ों तक को हजम कर लिया और अपने प्रजेंटेशन में उन्हें शामिल किया। इस तरह निवेशकों और फाइनैंसरों के समक्ष वृद्धि की गुलाबी तस्वीर पेश की गई। उन्होंने इस सरकार के हर समाजवादी कदम का स्वागत किया और उसे नये भारत की दिशा में उठा कदम बताया। जबकि ऐसे हर अवसर पर उन्हें सरकार को पिछली सरकारों के कदमों की याद दिलानी चाहिए थी।
 
उन्हें यह बात जरा भी अजीब नहीं लगी कि जिस सरकार ने पिछली कांग्रेस सरकार के हर काम को बुरा बताया, वह न केवल उसी कांग्रेस सरकार के विचारों और योजनाओं को जारी रखे हुए है बल्कि उन्हें कई गुना विस्तार दे चुकी है। उनके लिए नोटबंदी एक बड़ा बदलाव लाने वाला कदम था, न कि व्यापक आर्थिक क्षति और बिना किसी पूर्व शर्त के बैंकों के पुनर्पूंजीकरण को वे एक अनिवार्य कदम मानते हैं, न कि पैसे डुबाने जैसा कदम। सबसे अहम बात यह है कि उन्होंने सरकार के हर दंडात्मक और जबरिया कदम को पारदर्शी और स्वच्छ भारत के लिए उठाया गया जरूरी कदम बताया। बच्चों तक के लिए आधार अनिवार्य करना हो, वस्तु एवं सेवा कर या बिना कारण बताए कर छापे अथवा यह कहना कि नागरिकों को गोपनीयता का अधिकार नहीं है, ये सारी बातें उन्हें देश की स्वच्छता को लेकर प्रतिबद्धता नजर आती रहीं। उनका भरोसा इतना गहरा था कि वे देख नहीं पाए कि व्यवस्था की सफाई का दावा करने वाली सरकार धीरे-धीरे पारदर्शिता के सबसे अहम उपाय सूचना के अधिकार तक को खत्म कर रही है।

और फिर वे मेरे लिए आये
 
उपरोक्त गलत धारणा अब ध्वस्त हो चुकी है। इन्फोसिस के पूर्व मुख्य वित्तीय अधिकारी और इस सरकार के समर्थक रहे मोहनदास पई कहते हैं कि सरकार देश के नागरिकों और कारोबारियों को एक ऐसी कर व्यवस्था से बचाने में नाकाम रही है जो एक गलत आकलन व्यवस्था और ध्वस्त अपील व्यवस्था के साथ काम कर रही है। किसी भी बड़े देश में ये दोनों व्यवस्थाएं एक साथ गड़बड़ नहीं रहतीं। कर अधिकारी हर किसी को कर वंचक और खुद को निगरानी समिति का सदस्य समझते हैं। हमने 30 से अधिक देशों में रिटर्न फाइल किए हैं लेकिन किसी देश में करदाताओं से इतना बुरा व्यवहार नहीं किया जाता है जितना भारत में। हाल ही में प्रकाशित एक आलेख में उन्होंने आलोचना करते हुए लिखा कि भारतीय जनता पार्टी ने पिछली सरकार का कर आतंकवाद समाप्त करने का वादा किया था लेकिन 50 फीसदी से अधिक लंबित कर विवाद पिछले दो वर्ष में उत्पन्न हुए हैं।
 
हम क्या जानते हैं?
 
मुझे हमेशा आश्चर्य हुआ है कि कारोबारियों और वित्तीय जगत के लोगों की आशाओं का आधार क्या था? आखिरकार मौजूदा सरकार देश की अब तक की सरकारों में सबसे अधिक गोपनीयता बरतने वाली सरकारों में शामिल है। यह सरकार कैसे काम करती है और क्या सोचती है इस बारे में हमें बहुत कम जानकारी है। इसके लक्ष्य क्या हैं या फिर जबरदस्त चुनावी जीत के बाद यह किस खाके का अनुसरण करना चाहती है यह भी हमें नहीं पता। इसका चुनावी घोषणापत्र केवल कागज का एक टुकड़ा भर है, आधिकारिक आंकड़ों में छेड़छाड़ करके सरकार की सेहत दुरुस्त दिखाई जाती है, कोई श्वेतपत्र शायद ही देखने को मिले और तमाम राजनीतिक घोषणाएं जुमलों, अलंकारों और शब्द संक्षेपों से भरी रहती हैं। यहां तक कि सेवानिवृत्त सरकारी अधिकारियों तक को बाहर बोलने की इजाजत नहीं रहती।
 
चाहे जो भी हो हमें सरकार के कदमों पर बात करनी चाहिए। अगर बाजार प्रतिभागियों और कारोबारियों ने सरकार के कदमों पर ध्यान दिया होता तो उनका भरोसा बहुत पहले टूट गया होता। सकारात्मक पहलू की बात करें तो विकृत पूंजीवाद में कमी आई है और फंसे कर्ज की वसूली के प्रयास हुए हैं। नकारात्मक पहलू देखें तो कांग्रेस की शैली के समाजवाद, प्रतिबंधों, कर आतंक, दंभ और संस्थाओं के पतन में इजाफा हुआ है। कुलमिलाकर यह तेज आर्थिक वृद्धि हासिल करने का तरीका नहीं है। अगर हम ऐसा मानते हैं, तो अपना मजाक खुद बना रहे हैं।
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