बिजनेस स्टैंडर्ड - भारत के नदी बेसिनों का संरक्षण जरूरी
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भारत के नदी बेसिनों का संरक्षण जरूरी

मिहिर शाह /  July 29, 2019

नदी मार्गों में बड़े ढांचागत बदलाव जल, समाज और पारिस्थितिक के लिए अप्रत्याशित और खतरनाक साबित हो सकते हैं। बता रहे हैं मिहिर शाह 

 
नदी जल के बंटवारे को लेकर राज्यों के बीच झगड़े बहुत बड़ी समस्या बन गए हैं। उनके समाधान के लिए कई दशकों से प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन समाधान के कहीं दूर-दूर तक आसार नजर नहीं आ रहे हैं। इसके साथ ही, आध्यात्मिक रूप से अहम डुबकी लगाने के पवित्र स्थल सूख गए हैं या महज कचरा डालने की जगह बन गए हैं। भारत की सबसे पवित्र नदियों की यह बदहाली राष्ट्रीय शर्मिंदगी का विषय है। यह जल प्रबंधन में हमारी गलत नीतियों का सबूत है। इन हालात की मुख्य वजह यह है कि हमने जल विज्ञान के बुनियादी सिद्धांतों की अनदेखी की है। जब हम बच्चे थे, तब हमने स्कूल में जल चक्र सीखा था। लेकिन भारत में नीति-निर्माता इस पाठ को भूल गए हैं। उन्होंने जल ग्रहण क्षेत्र और नदियों की सेहत के बीच के अटूट संबंध की अनदेखी की है। नदियों का जल ग्रहण क्षेत्र जितना स्वस्थ होगा, उतनी ही नदियों की स्थिति बेहतर होगी। गंगा के जल के विशिष्ट औषधीय गुणों को केवल तभी बरकरार रखा जा सकता है, जब हम हिमालय के उस साफ-सुथरे जल ग्रहण क्षेत्र को सुरक्षित बनाएंगे, जहां से गंगा निकलती है। 
 
यही वजह है कि न्यूयॉर्क के बाशिंदे शहर के जल ग्रहण क्षेत्र में रहने वाले लोगों को जल क्षेत्र को सुरक्षित रखने के रूप में पारिस्थितिक सेवा मुहैया कराने के लिए भुगतान करते हैं, जिससे नदी बेसिन स्वस्थ एवं हरा रहता है। इससे शहर को स्वच्छ जलापूर्ति सुनिश्चित होती है। ऐसे उदाहरण चीन, ब्राजील, मैक्सिको, कोस्टारिका और इथियोपिया समेत दुनियाभर में बहुत सी जगहों पर मिलते हैं। लेकिन यदि हम उन रास्तों पर अतिक्रमण करते हैं, नुकसान पहुंचाते हैं, रोकते हैं या प्रदूषित करते हैं, जिनसे जल नदी में आता है तो जल के प्रवाह पर मात्रात्मक एवं गुणात्मक असर पडऩा स्वाभाविक है। 
 
नदियों की प्राकृतिक संरचना को विकसित होने में लाखों वर्ष लगे हैं। नदियों के रास्तों में बड़े ढांचागत बदलावों के जल, समाज और पारिस्थितिक पर अनपेक्षित एवं खतरनाक असर पड़ सकते हैं। उदाहरण के लिए ब्रिटेन में मृदा अपरदन से मत्स्यपालन उद्योग को कम से कम 50 लाख पाउंड के नुकसान का अनुमान है। मेरा संगठन- समाज प्रगति सहयोग पिछले 30 वर्षों से मध्य भारत के आदिवासी क्षेत्रों में जल ग्रहण कार्यक्रमों को लागू कर रहा है। इसने हमें यह सिखाया है कि अर्थव्यवस्था को वृहद पारिस्थितिकी के साथ जोड़कर देखने की जरूरत है। इस आपसी संबंध की अनदेखी करने और इन्हें हमारी विकास योजनाओं में शामिल न करने से जल समस्या विकराल रूप धारण कर सकती है। वर्ष 2018 में 55 जल ग्रहण क्षेत्रों का अध्ययन किया गया, जो प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय पत्रिका साइंटिफिक रिपोट्र्स में प्रकाशित हुआ था। इसमें दर्शाया गया है कि वैतरणी, ब्रह्माणी, गोदावरी, कृष्णा, माही, नर्मदा, साबरमती और तापी समेत भारत के प्रमुख नदी बेसिनों में जल प्रवाह में कमी आ रही है। इसकी वजह बारिश में कमी नहीं बल्कि उनके जल ग्रहण क्षेत्रों में विध्वंसकारी आर्थिक गतिविधियां हैं। इस बात की चिंता जताई गई है कि अगर यह रुझान आगे भी बना रहा तो इन नदियों में से ज्यादातर पूरी तरह सूख जाएंगी। 
 
ऐसे में सवाल पैदा होता है कि हम कैसे आर्थिक विकास की जरूरत और उसके जल उपलब्धता एवं नदी प्रवाह पर नकारात्मक असर में सामंजस्य कायम करें? ऐसा विकास की एक बिल्कुल अलग अवधारणा अपनाकर किया जा सकता है। इसमें हम अपनी दखल का प्रकृति की संरचना के साथ सामंजस्य बैठाएंगे, बजाय इस पर हावी होने के। देश में ज्यादातर हिस्सों में पूरे साल की बारिश महज 40 से 50 दिन होती है। हमे जमीन पर बारिश के पानी की रफ्तार घटाने की जरूरत है। इसके लिए प्रत्येक हिस्से में ढलान, मिट्टी, चट्टान और वनस्पति में विभिन्नता के आधार पर अलग-अलग योजना बनानी होगी। ऐसे जल ग्रहण क्षेत्र प्रबंधन से भूजल को रिचार्ज करने और तालाबों, बांधों एवं नदियों में प्रवाह बढ़ाने में मदद मिलेगी। यह कई तरह से मददगार होगा। इससे मिट्टी का कटाव घटेगा, वनों का प्रसार होगा, भूजल में सुधार होगा, नदियों को नया जीवन मिलेगा, रोजगार पैदा होंगे, किसानों की आय बढ़ेगी, ऋणग्रस्तता घटेगी और धीरे-धीरे बंधुआ मजदूरी और मुश्किल परिस्थितियों की वजह से आप्रवास खत्म हो जाएगा। इसकी सफलता में सबसे अहम योगदान स्थानीय लोगों को कुशल बनाना है ताकि वे जल ग्रहण क्षेत्र कार्यक्रम की योजना एवं डिजाइन बना सकें और इसे लागू कर सकें। हमें जल ग्रहण क्षेत्र के आधार पर मनरेगा में बदलाव करना होगा और इसके भरपूर संसाधनों का जल ग्रहण क्षेत्र और नदियों को फिर से जीवन दान देने में करना होगा। मनरेगा का इस्तेमाल परंपरागत जलाशयों को बहाल करने में किया जा सकता है, भले ही ये बदहाल स्थिति में हैं। ये जलाशय देश के कई हिस्सों में अब भी मौजूद हैं। 
 
इस कार्य को भूजल से संबंधित मांग के प्रबंधन की पहलों के साथ समन्वित किया जाना चाहिए।  यह जमीन पर बहने वाला जल है, जिसकी बदौलत नदियां मॉनसून के बाद भी बहती रहती हैं। इसलिए किसी नदी बेसिन संरक्षण कार्यक्रम में नदी जल ग्रहण क्षेत्र और जल संचय करने वाली भूमि की परतों को हमेशा एक साथ प्रबंधित किया जाना चाहिए। इसके लिए फसल प्रोत्साहन के ढांचे में बदलाव किया जाना चाहिए ताकि किसान कम पानी की जरूरत वाली फसलों को अपना सकें।  शहरों के योजनाकारों को यह समझने की जरूरत है कि अगर जल ग्रहण क्षेत्रों में भूमि का नुकसानदेह कार्यों में इस्तेमाल और अतिक्रमण जारी रहता है तो उनके जल संसाधनों की सततता और गुणवत्ता पर नकारात्मक असर पड़ेगा। इसलिए उन्हें न्यूयॉर्क की तरह अपनी जल समस्याओं के समाधान के लिए इस जुड़ाव का इस्तेमाल करना चाहिए। उन्हें यह समझना चाहिए कि हाल के वर्षों में शहरों में बाढ़ की घटनाएं बढऩे की एक वजह यह भी है कि हमने परंपरागत झीलों पर अतिक्रमण कर लिया है और उन प्राकृतिक जलमार्गों को नष्ट कर दिया है, जिनके जरिये अतिरिक्त पानी नदी या समुद्र में चला जाता है। जो लोग कुंभ मेले जैसे सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजन के लिए जिम्मेदार हैं, उन्हें पवित्र नदियों के जल ग्रहण क्षेत्र को संरक्षित करना चाहिए। अन्यथा हम पवित्र कुंडों को कृत्रिम तरीके से बाहरी स्रोतों से भरने के नजारे देखते रहेंगे। 
 
इसे देखते हुए भारत में प्रत्येक नदी बेसिन में नीचे से ऊपर जाने वाले भागीदारी प्रबंधन की जरूरत है। उदाहरण के लिए कावेरी विवाद का एकमात्र समाधान यह है कि दोनों पक्षों के भागीदार अपने साझा नदी बेसिन के स्वास्थ्य को बहाल करने के लिए मिलकर काम करें। इसके लिए दोनों के जल ग्रहण क्षेत्र को दुरुस्त किया जाना चाहिए और धीरे-धीरे पानी की अधिक जरूरत वाली फसलों का रकबा घटाया जाना चाहिए। प्रत्येक नदी बेसिन एक साझा संसाधन है, जिसके स्वास्थ्य से ही बेसिन और उसके आसपास के इलाकों के लोगों का भविष्य निर्धारित होगा। किसी राज्य का ज्यादा से ज्यादा पानी हासिल करने की मंशा के आधार पर अदूरदर्शिता दिखाना उनके हितों के भी खिलाफ होगा, जो ऐसी नासमझी दिखा रहे हैं। अगर हमारे नदी बेसिनों का वजूद बना रहेगा, तभी हमारा वजूद बरकरार रह पाएगा। अन्यथा हम भी बहुत सी महान नदी घाटी सभ्यताओं की तरह नष्ट हो जाएंगे।
 
(लेखक समाज प्रगति सहयोग के सह-संस्थापक हैं। वह मध्य भारत के आदिवासी क्षेत्रों में जल एवं जीविका सुरक्षा पर पिछले 30 वर्षों से काम कर रहे हैं। )
Keyword: river, basin, india, water,,
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