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येदियुरप्पा के रसूख से कर्नाटक बना अपवाद

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  July 28, 2019

कर्नाटक राजनीतिक दृष्टि से देश का सबसे महत्त्वपूर्ण प्रांत नहीं है। लोकसभा सीटों के मामले में यह केरल (20) और मध्य प्रदेश (29) के बीच में आता है। इसके बावजूद बीते महीनों में सुर्खियां बटोरने के मामले में कर्नाटक इन राज्यों पर भारी पड़ा। अब जबकि वहां भाजपा दोबारा सत्ता में है, आप आशा करेंगे कि जीत की संतुष्टि और शांति हावी होगी लेकिन सतह के नीचे काफी असंतोष और बेचैनी नजर आएगी। हम कह सकते हैं कि मझोले आकार के कर्नाटक ने अमित शाह और नरेंद्र मोदी की अक्षुण्ण और निर्विवाद सत्ता को पहली चुनौती दी है। ज्यादा बारीकी से बात करें तो यह चुनौती कर्नाटक ने नहीं बल्कि बीएस येदियुरप्पा ने दी है। उन्होंने अपनी ही पार्टी में अनपेक्षित बगावत की है। पहली बार किसी व्यक्ति ने अपने आला कमान को ऐसे समझौते करने पर मजबूर किया जो शायद वह पार्टी में किसी अन्य के लिए नहीं करते।

 
75 वर्ष की आयु सीमा के नियम का उल्लंघन तो इन समझौतों में केवल एक है। येदियुरप्पा 76 वर्ष के हैं। वह उम्र की वह सीमा पार कर चुके हैं जिसके बाद मोदी और शाह के आगमन के बाद नेता या तो राजभवन जाते हैं या मार्गदर्शक मंडल। अगर हम 2014 के बाद से अब तक की भाजपा पर नजर डालें तो केवल दो नेता 75 के बाद भी कैबिनेट में बने रह सके। एक हैं नजमा हेपतुल्ला, जो आखिरकार मणिपुर की राज्यपाल बनीं और दूसरे कलराज मिश्र जो अब हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल बने हैं। बीच की अवधि में अलग-थलग रहते हुए भी वह बिना नागा मोदी की तारीफ में ट्वीट करते रहे और इसका फल भी उन्हें मिला।
 
भाजपा में कोई और आयुसीमा का उल्लंघन नहीं कर सका। यहां तक कि जो भाजपा नेता शायद मोदी को ताउम्र देश का प्रधानमंत्री बनाने की मांग करते वे भी ये अटकल लगाने लगे थे कि तीसरे कार्यकाल में 75 की उम्र पार करने पर उनका उत्तराधिकारी कौन होगा। इससे येदियुरप्पा की विशेष ताकत का अंदाजा लगता है। यकीनन इसका यह अर्थ भी हो सकता है कि मोदी के 75 की उम्र में पद त्यागने की संभावना बेमानी हो जाए। अगर एक छोटे क्षेत्रीय नेता को यह छूट दी जा सकती है तो भला अपेक्षाकृत स्वस्थ एवं ताकतवर मोदी को क्यों नहीं?
 
कई मायनों में येदियुरप्पा उस आदर्श मुख्यमंत्री से एकदम उलट हैं जैसा मोदी और शाह चाहते। इसके लिए सन 2014 के बाद से उनके द्वारा नियुक्त मुख्यमंत्रियों की सूची खंगाली जा सकता है। इनमें से कोई अपने राज्य में इतना रसूखदार नहीं था और न ही पद का सबसे बड़ा दावेदार ही था। यहां तक कि योगी आदित्यनाथ भी नहीं। इनमें से कोई भी राज्य की प्रभावशाली जाति से नहीं आता था। जाट बहुल हरियाणा में मनोहर लाल खट्टर जैसे पंजाबी को मुख्यमंत्री बनाया गया। झारखंड में आदिवासियों को सत्ता नहीं सौंपी गई। महाराष्ट्र में युवा ब्राह्मण देवेंद्र फडणवीस को पद सौंपना, मराठाओं की आंख में किरकिरी जैसा था। यहां तक कि असम में भी सबसे ताकतवर नेता हिमंत विश्वशर्मा को कम शक्तिशाली सर्वानंद सोनोवाल के अधीन रखा गया।
 
अब तक के मॉडल के मुताबिक भाजपा को केवल दो नेताओं की जरूरत है और वे दिल्ली  में रहते हैं। शेष नेता उनके अनुचर हैं। येदियुरप्पा ने इस नियम को भंग कर दिया है। उन्होंने खुद को अपने बूते स्थापित किया है। वह न केवल एक रसूखदार जाति के नेता हैं बल्कि वह आलाकमान की निरंतर अवहेलना भी करते रहे हैं। अतीत में जब उन्हें सत्ता सौंपने से इनकार कर पार्टी ने उनके शत्रु सदानंद गौड़ा को राज्य की सत्ता सौंपी और जब वह भी अस्थिर हो गए तो येदियुरप्पा ने बगावत कर भाजपा छोड़ दी और एक क्षेत्रीय दल बनाकर 2013 का चुनाव लड़ा। उन्हें केवल छह सीटों पर जीत मिली लेकिन लिंगायत वोटों को उन्होंने पार्टी से दूर कर दिया। भाजपा भी 224 सदस्यीय विधानसभा में 40 सीटों पर सिमट कर रह गई।
 
उन्होंने अपनी पार्टी को एक और प्रमुख सिद्धांत तोडऩे पर मजबूर किया: वह था भ्रष्टाचार को सहन न करना। अपने पहले कार्यकाल में येदियुरप्पा को भ्रष्टाचार के आरोपों और लोकायुक्त की प्रतिकूल रिपोर्ट के चलते सत्ता गंवानी पड़ी। वह कुछ समय जेल में भी रहे और बाद में बरी हुए। परंतु चूंकि उन्हें पद से हटाया गया था इसलिए 2008 से 2013 के बीच कोई चैन से नहीं रह सका। भाजपा को राज्य में तीन मुख्यमंत्री बदलने पड़े। यही कारण है कि 2013 में कांग्रेस ने स्पष्ट बहुमत हासिल किया। परंतु येदियुरप्पा को न केवल पार्टी में वापस लिया गया बल्कि क्षेत्रीय कद्दावर नेता की उनकी हैसियत भी बरकरार रही। इसकी तुलना गुजरात में शंकर सिंह बाघेला से कर के देखिए। उस दौर में भाजपा के सबसे बड़े नेता और आरएसएस के आदमी रहे बाघेला ने पार्टी छोड़कर कांग्रेस की सहायता से गुजरात के मुख्यमंत्री  का पद संभाला। क्या भाजपा उन्हें कभी दोबारा राज्य में सत्ता सौंपती?
 
उम्र, जाति, भ्रष्टाचार और वफादारी को धता बताने के अलावा येदियुरप्पा ने अपनी पार्टी को मजबूर किया कि वह राज्य की कांग्रेस-जदसे सरकार गिराकर तत्काल उन्हें पद सौंपे। भाजपा शायद उक्त गठबंधन सरकार को थोड़ा और समय देती कि वह स्वयं गिर जाए। हालांकि ऐसा अनिवार्य तौर पर नहीं कहा जा सकता। बहुत संभव है कि मोदी और शाह राज्य को कुछ और वक्त तक राष्ट्रपति शासन के अधीन रहने देते और दलबदलुओं से निपटकर सरकार बनाते। फिलहाल जिस हड़बड़ी में येदियुरप्पा को शपथ दिलाई गई वह अजीब है और उसका कोई लाभ भी नहीं है। 
 
इसलिए कि तमाशा अभी खत्म नहीं हुआ है। विधानसभा अध्यक्ष ने सभी बागियों की अर्हता समाप्त कर दी है यानी वे अगला विधानसभा चुनाव नहीं लड़ सकेंगे। खेल अभी खत्म नहीं हुआ है। कम से कम वैसे तो बिल्कुल नहीं जैसा भाजपा चाहती। भाजपा के इस बुजुर्ग नेता को इतनी ताकत कहां से मिलती है और भाजपा तथा राष्ट्रीय राजनीति के लिए इसके क्या मायने हैं? पहली बात तो यही कि भाजपा राज्य में युवा नेतृत्व कायम करने में नाकाम रही। येदियुरप्पा के प्रमुख विरोधी अनंत कुमार की असमय मृत्यु से भी उन्हें मदद मिली। परंतु सबसे अहम बात यह है कि भाजपा को अंदाजा हो गया कि कर्नाटक में वह केवल मोदी के दम पर विधानसभा में बहुमत नहीं हासिल कर सकती। यह इकलौता राज्य है जहां भाजपा को हिंदू वोट बैंक के भीतर अपने ही नेता के जातीय वोट बैंक से चुनौती मिली।
 
अन्य राज्यों के भाजपा नेता भी इसे ध्यान में रखेंगे। आसपास नजर दौड़ाएं तो अन्य राज्यों में येदियुरप्पा की हैसियत का भाजपा नेता नहीं दिखता। राजस्थान में वसुंधरा राजे अपने वफादारों को किनारे करने और निंदकों की तरक्की से नाराज होंगी। शिवराज सिंह चौहान को वह छूट और संसाधन नहीं मिले जिनकी बदौलत वे कमलनाथ की सरकार को गिरा सकें। परंतु ऐसे नेता हैं कम से कम महाराष्ट्र और झारखंड में। योगी आदित्यनाथ को इस गिनती में क्यों न शामिल किया जाए, वह भी कर्नाटक के अपवाद से प्रेरणा ले सकते हैं। पुनश्च: आपने देखा होगा कि उनके नाम के वर्णाक्षर एक बार फिर बदल गए हैं। बुरे दिनों में उन्होंने इसे बदला था लेकिन कोई लाभ न होने पर पुन: मूल नाम को अपना लिया है। मैं कह नहीं सकता कि उनका अंधविश्वास भी कम हुआ है या नहीं।
 
Keyword: karnataka, B. S. Yeddyurappa, BJP,,
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