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ऊंचे लाभांश वाले शेयरों पर दांव मुनाफे का सौदा

श्रीपाद ऑटे और विशाल छाबडिय़ा /  July 28, 2019

ऐसे में जब आर्थिक और कॉरपोरेट वृद्घि धीमी है और ताजा गिरावट के बावजूद बाजार ऊंचे स्तरों पर बना हुआ है, ऊंचे मूल्यांकन की वजह से शेयर कमजोर बन गए हैं। ऐसे में ज्यादा लाभांश प्रतिफल वाले शेयरों में पैसा लगाना निवेशकों के लिए एक अच्छी रणनीति हो सकती है। बाजार में आम चुनाव के साथ शुरू हुआ उत्साह सीमित था, खासकर बजट में ज्यादा अमीर लोगों की आय पर अधिभार में वृद्घि की वजह से, बाजार पर प्रभाव पड़ा है। आम चुनाव में जीत से राजग के लगातार दूसरे कार्यकाल का रास्ता साफ हुआ। 

 
इसके अलावा, कुछ एफआईआई भी अपनी कर देनदारियों में इजाफा देख सकते हैं, बशर्ते कि वे अपने कॉरपोरेट ढांचे में बदलाव नहीं करते हैं। व्यापार युद्घ की छाया और धीमी वैश्विक वृद्घि ने निवेशकों को चिंतित बना दिया है। इसके परिणामस्वरूप, धारणा कमजोर हुई है और विदेशी निवेशक भारतीय इक्विटी बाजारों में निवेश घटा रहे हैं और घरेलू निवेशक ताजा कोष की अपनी प्रतिबद्घताओं में कमी ला रहे हैं जिससे गिरावट का जोखिम बढ़ रहा है। निफ्टी-50 अब 3 जून के 12,103 के अपने सर्वाधिक ऊंचे स्तर से लगभग 7 प्रतिशत नीचे है। विश्लेषकों का कहना है कि ऐसे परिदृश्य में, ऊंचे लाभांश वाले शेयर अच्छा विकल्प हो सकते हैं। मॉर्निंगस्टार इन्वेस्टमेंट एडवाइजर में निदेशक (फंड रिसर्च) कौस्तुभ बेलापुरकर कहते हैं, 'कर वृद्घि की घोषणा, भारतीय इक्विटी बाजार में नकदी प्रवाह में बड़ा बदलाव आया है। विदेशी निवेशक बाजार से पैसा निकाल रहे हैं। हमारा मानना है कि बाजार अल्पावधि में सीमित दायरे में बने रहेंगे। इसलिए ऊंचे लाभांश और अच्छे बुनियादी आधार वाले शेयर पोर्टफोलियो निर्माण के लिए बेहतर विकल्प होंगे।'
 
बजट के बाद 25 जुलाई तक भारतीय इक्विटी बाजार में एफआईआई ने 1.6 अरब डॉलर की बिकवाली की। इक्विनोमिक्स रिसर्च के संस्थापक एवं प्रबंध निदेशक जी चोकालिंगम ने भी इसी तरह की राय जताई है, हालांकि वह बाजार में मौजूदा स्तरों से काफी कम गिरावट का जोखिम देख रहे हैं। हालांकि विश्लेषकों का कहना है कि बात सिर्फ ऊंचे कर की नहीं है बल्कि अर्थव्यवस्था में मंदी और वाहन, एनबीएफसी (आवास वित्त कंपनियां शामिल) जैसे कुछ क्षेत्रों में समस्याओं से भी भारतीय बाजारों में निवेशक धारणा प्रभावित हुई है। कुल मिलाकर खपत की स्थिति धीमी है, जिसका कई प्रमुख कंपनियों के जून तिमाही के नतीजों में असर दिख चुका है। इसके अलावा आगे भी स्थिति में ज्यादा बदलाव आने के आसार नहीं हैं।
 
उदाहरण के लिए, हिंदुस्तान यूनिलीवर ने जून तिमाही में महज 5 प्रतिशत की बिक्री वृद्घि दर्ज की जबकि मार्च 2019 की तिमाही में यह 7 प्रतिशत थी। बजाज फाइनैंस भी धीमी वृद्घि को लेकर चौकस बनी हुई है और उसके फंसे कर्ज में इजाफा हुआ है। भारत की सबसे बड़ी कार निर्माता मारुति ने अपने मुनाफे में सालाना आधार पर 27 प्रतिशत की कमी दर्ज की। पहली तिमाही में कमजोरी के बाद भारतीय कॉरपोरेट जगत के आय अनुमानों में कमी किए जाने की आशंका है। हाल में, आईएमएफ ने भी 2019-20 के लिए भारत की आर्थिक वृद्घि के लिए अपना अनुमान 0.3 प्रतिशत तक घटाकर 7 फीसदी किया है। मुख्य रूप से वाहन समेत कई क्षेत्रों में कमजोर घरेलू मांग को देखते हुए इस अनुमान में कटौती की गई है।
 
हालांकि ऊंचे लाभांश वाली कंपनियों का चयन करने के लिए भी निवेशकों को खास मानकों पर ध्यान देने की जरूरत होगी। चोकालिंगम का मानना है, 'निवेशकों को उन कुछ क्षेत्रों पर सतर्क रहना चाहिए जो समस्याओं से जूझ रहे हैं और शेयरों के चयन को लेकर कंपनियों के बैलेंस शीट को लाभांश प्रतिफल के मानक के तौर पर नहीं देखना चाहिए।' कुछ अच्छे शेयरों की पहचान के प्रयास में बिजनेस स्टैंडर्ड रिसर्च ब्यूरो ने बीएसई-500 कंपनियों का आकलन किया और पिछले पांच वर्षों में उनके लाभांश भुगतान पर विचार किया। ताजा लाभांश प्रतिफल 4 प्रतिशत से अधिक रहा है। कुछ मामलों में, जहां लाभांश शेयरधारकों द्वारा मंजूर किया जाना बाकी है, वहीं कई कंपनियों का कर्ज-पीई अनुपात एक अंक में रहा है। एक घरेलू म्युुचुअल फंड के सीआईओ का कहना है कि हालांकि निवेशक अच्छे मुनाफे वाली कंपनियों का चयन कर कमाई कर सकते हैं। कर्नाटक बैंक और बीएसई लिमिटेड उन अन्य कुछ अच्छे लाभांश वाले शेयरों में शामिल हैं जिन पर विश्लेषक मौजूदा समय में खरीदने का सुझाव दे रहे हैं। 
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