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समाधान प्रक्रिया में तेजी की कोशिश

ईशिता आयान दत्त और सुदीप्त दे /  July 28, 2019

ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता (आईबीसी) की प्रस्तावना में इसका बुनियादी कार्य 'उद्यमियों, साझेदार कंपनियों और व्यक्तियों के पुनर्गठन एवं दिवालिया समाधान से संबंधित कानूनों को मजबूत और संशोधित करना है ताकि ऐसे लोगों की संपत्ति की अधिक से अधिक कीमत मिले और उद्यमिता, ऋण उपलब्धता एवं सभी भागीदारों के हितों में संतुलन को प्रोत्साहित किया जा सके।'  सरकार ने दिवालिया कानून में आठ संशोधनों का प्रस्ताव लाकर संहिता के कम कम कुछ कार्यों पर ध्यान केंद्रित करने का संकेत दिया है। 

 
भले ही इन बदलावों पर पिछले कुछ समय से काम हो रहा हो, लेकिन हाल में राष्ट्रीय कंपनी कानून अपीलीय न्यायाधिकरण (एनसीएलएटी) ने एस्सार मामले में जो फैसला दिया है, उससे इन बदलावों को प्रोत्साहन मिला है। एनसीएलएटी के इस फैसले में सभी ऋणदाताओं को समान माना गया है। इस आदेश से सुरक्षित ऋणदाताओं की दिवालिया संहिता को लेकर चिंता बढ़ गई है। उन्हें एस्सार के समाधान से प्राप्त होने वाली रकम का एक बड़ा हिस्सा गंवाना होगा। लेकिन प्रस्तावित संशोधनों ने ऋण समाधान के एक साधन के रूप में आईबीसी में नई जान फूंक दी है। 
 
संहिता का एक अहम संशोधन विशेष प्रावधान है। इसमें कहा गया है कि असहमत वित्तीय ऋणदाताओं और परिचालन ऋणदाताओं को कम से कम वह राशि जरूर मिलेगी, जो उन्हें समाधान योजना के तहत राशि को वितरित करने या परिसमापन रकम को धारा 53 के तहत वितरित करने से मिलती। उन्हें इन दोनों में से जो भी अधिक होगी, वह राशि मिलेगी। इस संशोधन का बीते मामलों पर भी असर पड़ेगा। धारा 53 में परिसमापन की स्थिति में संपत्तियों के वितरण के लिए वॉटरफॉल मैकेनिज्म (ऋणी से बड़े ऋणदाताओं को पहले भुगतान मिलेगा) का जिक्र किया गया है। 
 
एजेडबी ऐंड पार्टनर्स में साझेदार सुहर्ष सिन्हा ने बताया कि एक बुनियादी सिद्धांत के रूप में वित्तीय ऋणदाताओं को अपने सुरक्षा हितों से वंचित नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा, 'यह बैंकिंग कानून का बुनियादी सिद्धांत है, जिसे एनसीएलएटी ने एस्सार मामले के आदेश में कमजोर किया है। इस सिद्धांत को प्रस्ताावित संशोधनों में फिर दोहराया जा रहा है। अगर किसी वित्तीय ऋणदाता के लिए असहमत होना वाणिज्यिक रूप से व्यवहार्य है और उसे गिरवी संपत्ति की कीमत का भुगतान किया जाना चाहिए तो उसकी वाणिज्यिक बुद्धिमता का सम्मान किया जाना चाहिए। अगर बहुत से ऋणदाता असहमति के बारे में सोच रहे हैं तो ऋणदाताओं का बहुमत वाला पक्ष सभी ऋणदाताओं को मान्य फैसले के लिए बातचीत कर सकता है।' 
 
लेकिन इसमें अड़चन आ सकती हैं, जो संहिता के हितों के खिलाफ काम कर सकती हैं। ईवाई के प्रमुख (वित्तीय सेवाएं, पुनर्गठन और सुधार सेवाएं) एबिजेर दीवानजी का मानना है कि इन बदलावों से ऋणदाताओं को सहमत होने के लिए बहुत अधिक प्रोत्साहन नहीं मिलेगा। वे असहमति जता सकते हैं और फिर भी परिसमापन या समाधान की कीमत, इसमें से जो भी अधिक होगी, हासिल कर सकते हैं। एलऐंडएल पार्टनर्स में वरिष्ठ साझेदार मोहित सराफ ने कहा कि समाधान योजना और परिसमापन मूल्य के अलावा एक तीसरी चीज को भी शामिल करने की जरूरत है। यह चीज वह है, जो समाधान योजना में मुहैया कराई गई है। 
 
उन्होंने कहा, 'बहुत से मामलों में अगर समाधान योजना या परिसमापन कीमत के तहत वितरित की जाने वाली राशि में वाटरफॉल मैकेनिज्म को अपनाया जाता है तो परिचालन ऋणदाताओं को कुछ नहीं मिलेगा। लेकिन समाधान आवेदक परिचालन ऋणदाताओं को भी मुहैया करा सकता है। इसके अलावा 'कम से कम' जैसे शब्दों का इस्तेमाल ज्यादा हिस्सा हासिल करने के तर्क के रूप में किया जा सकता है।' हालांकि उच्चतम न्यायालय के वकील आनंद वर्मा ने कहा कि प्रस्तावित संशोधनों से परिचालन ऋणदाताओं के लिए असमानता बढ़ेगी। 
 
वर्मा ने कहा, 'इस संशोधन में प्रस्ताव रखा गया है कि परिचालन ऋणदाताओं (और असहमत वित्तीय ऋणदाताओं) को आईबीसी की धारा 53 के तहत राशि मिलेगी। ऐसा करके संशोधन ने समाधान के चरण और परिसमापन के चरण को समान बना दिया है, जो गलत है। दोनों कानूनी रूप से अलग-अलग हैं।' कंपनी दिवालिया समाधान की प्रक्रिया 330 दिन के भीतर पूरी करने की मियाद तय करने के लिए एक संशोधन लाया जाएगा। इस मियाद में मुकदमा और अन्य न्यायिक प्रक्रियाएं भी शामिल होंगी। 
 
एक निश्चित समयावधि में समाधान आईबीसी का एक अहम बिंदु है। लेकिन बहुत से मुकदमों से यह तय हो गया है कि ज्यादातर मामलों में समाधान की 270 दिन की सीमा पार हो जाती है। सराफ ने कहा, 'ये कंपनियां वेंटिलेटर पर हैं और इनके लिए समय बहुत महत्त्वपूर्ण है।' अन्य खासियतों में से एक यह है कि आवेदन के चरण में समयबद्ध निपटान पर जोर देने की जरूरत थी। हालांकि एक ऋणदाता ने कहा कि 'डीम्ड एडमिशन' का प्रावधान शामिल करना बेहतर होगा। दिवालिया संहिता के तहत न्यायिक प्राधिकरण को आवेदन प्राप्त होने के 14 दिनों के भीतर इसे स्वीकार या रद्द करना होगा। लेकिन अब भी नई समयसीमा को लेकर चिंताएं हैं। विशेषज्ञ ने कहा, 'यह समयसीमा निर्देशिका न होकर अनिवार्य होनी चाहिए।'
 
कंपनी पुनर्गठन योजनाओं पर स्पष्टता से कुछ लचीलापन सुनिश्चित होगा। एसऐंडआर एसोसिएट्स में पार्टनर रजत सेठी ने कहा कि इससे ज्यादा बेहतर समाधान हो पाएंगे। सिन्हा ने कहा कि वर्तमान ढांचे में समाधान योजना के तहत पूरी चलती हुई कंपनी को खरीदा जा सकता है, लेकिन बोलीदाताओं के लिए व्यावहारिक संपत्तियों का चयन करना संभव नहीं है। उन्होंने कहा, 'इससे बोलियां कम हो गई हैं क्योंकि  हो सकता है कि अधिग्रहणकर्ता किसी ऋणग्रस्त विविधीकृत कंपनी की गैर-लाभकारी इकाइयों को नहीं खरीदना चाहता हो। इस संशोधन ने विभिन्न बोलीदाताओं के लिए कंपनी की अलग-अलग इकाइयों को खरीदने का रास्ता साफ कर दिया है।'
 
धारा 21(6ए) के तहत वित्तीय ऋणदाताओं से संबंधित प्रावधान में संशोधन घर खरीदारों के लिए मददगार साबित होगा। सेठी ने कहा कि ऋणदाताओं (घर के मालिक जैसे) के एक वर्ग के प्रतिनिधि के जरिये मत डालने से संबंधित प्रावधान में संशोधन से उन अधिकारों का इस्तेमाल हो सकेगा, जो ऐसे ऋणदाता वर्ग को दिए गए हैं। ऋणदाताओं की समिति गठित होने और सूचना मेमोरेंडम तैयार होने से पहले किसी भी समय कॉरपोरेट ऋणी की संपत्तियों के सीधे परिसमापन का प्रस्ताव रखा गया है। हालांकि जूरिस कॉर्प में पार्टनर जयेश एच ने कहा कि ऋणदाताओं की समिति के पास हमेशा शक्ति रही है। उन्होंने कहा, 'लेकिन एनसीएलटी जल्द परिसमापन को स्वीकार करने का इच्छुक नहीं था।'
 
इक्रा के उपाध्यक्ष अभिषेक डफरिया ने आगाह किया कि यह मानना ज्यादा आशावादी होगा कि संशोधनों का तुरंत असर दिखेगा। उन्होंने कहा, 'जब नए मामले आएंगे तो ज्यादातर संशोधनों को अदालतों की दहलीज पार करनी होगी।' अभी ये संशोधन लागू होने से पहले संसद के दोनों सदनों में पारित होंगे। 
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