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कर्नाटक की राजनीति में बनी रहेगी अनिश्चय की स्थिति

सियासी हलचल
आदिति फडणीस /  July 26, 2019

बूकानाकेरे सिद्घलिंगप्पा येदियुरप्पा (उन्होंने ज्योतिषियों की सलाह पर आखिरी नाम में बदलाव किया है) चौथी बार कर्नाटक के मुख्यमंत्री बनने को तैयार हैं। वह इससे पहले कभी बतौर मुख्यमंत्री कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए और इस बार भी ऐसा ही लगता है। इसकी वजह एकदम स्पष्ट है। सबसे पहले देखते हैं कि कर्नाटक विधानसभा का अंक गणित क्या कहता है? प्रदेश विधानसभा में कुल 225 सदस्य हैं जिनमें 224 निर्वाचित और एक नामित सदस्य है। एक स्वतंत्र विधायक के अलावा बहुजन समाज पार्टी (बसपा) का एक और कर्नाटक प्रज्ञावंत जनता पार्टी (बीपीजेपी)का भी एक विधायक है। 

 
ये हैं मुलबगल से एच नागेश, कोल्लेगल से एन महेश और रानेबेन्नूर से आर शंकर। ये तीनों कुमारस्वामी के विरोध में हैं और विधानसभा अध्यक्ष ने तीनों को सदस्यता के अयोग्य घोषित कर दिया है। यानी वे उपचुनाव में भी हिस्सा नहीं ले सकते। इस प्रकार इन तीनों को पूरी तरह परिदृश्य से बाहर कर दिया गया है। इसका यह अर्थ भी है कि जब तक उपचुनाव नहीं होते हैं, विधानसभा में कुल 222 सदस्य रह जाएंगे और बहुमत के लिए 112 विधायकों के समर्थन की आवश्यकता होगा। 
 
वर्ष 2018 के विधानसभा चुनाव के बाद भाजपा के पास 105 विधायक थे, कांग्रेस के पास 78 और जनता दल सेक्युलर के पास 37 विधायक। भाजपा ने सरकार बनाने की कोशिश की लेकिन वह नाकाम रही और कांग्रेस और जनता दल सेक्युलर ने साथ मिलकर बहुमत हासिल कर लिया। संकट के संकेत तो पहले दिन से स्पष्ट थे। येदियुरप्पा को लग रहा था कि उन्हें ही मुख्यमंत्री बनना चाहिए था। कांग्रेस ने एक छोटे दल को मुख्यमंत्री का पद सौंपा था, वह इसका लाभ चाहती थी। कांग्रेस के निवर्तमान मुख्यमंत्री सिद्धरमैया को लग रहा था कि उन्हें पद से हटाया गया है और उनकी कुमारस्वामी सरकार की स्थिरता में कोई रुचि नहीं थी। यही वजह है कि राहुल गांधी ने ट्वीट किया, 'पहले दिन से कर्नाटक में कांग्रेस-जनता दल सेक्युलर गठजोड़ भीतर और बाहर से निहित स्वार्थी तत्त्वों के निशाने पर था। ये वे लोग थे जो इस गठबंधन को अपनी सत्ता की राह की बाधा मानते थे।' डीके शिवकुमार (उन चुनिंदा कांग्रेस नेताओं में से एक जो विश्वास मत पर अंगे्रेजी में बोले, कई लोगों के मुताबिक ऐसा इसलिए किया गया ताकि 10 जनपथ उनकी बात सुने) ने वोल्तायर को उद्धृत करते हुए कहा, : ईश्वर मुझे मेरे मित्रों से बचाए। अपने दुश्मनों से मैं स्वयं बचाव कर सकता हूं। 
 
बासवकल्याण के कांग्रेस विधायक बी नारायण राव ने विश्वास मत पर कहा, 'जब आप नीम के बीज बोते हैं तो आप आम की फसल की उम्मीद कैसे कर सकते हैं। मैं मौजूदा मुख्यमंत्री, पिछले मुख्यमंत्री और भविष्य में बनने वाले मुख्यमंत्री से करबद्घ विनती करता हूं, कृपया अपने आसपास अच्छे लोगों को रखें। आप अचल संपत्ति कारोबारियों को टिकट देते हैं, बिल्डरों को टिकट देते हैं, शराब के ठेकेदारों को टिकट देते हैं और उनसे उम्मीद करते हैं कि वे राजनीतिक आदर्शों के प्रति वफादार रहेंगे?' जब मतदान का दिन आया तो 20 विधायक मतदान से दूर रहे। इनमें से 14 कांग्रेस के, तीन जनता दल सेक्युलर के और दो निर्दलीय थे। अब तीन समस्याएं हैं।
 
पहली समस्या है विधानसभा अध्यक्ष की। अध्यक्ष ने भले ही तीन विधायकों को अयोग्य घोषित कर दिया लेकिन बाकी विधायकों के इस्तीफे स्वीकार किए जाएं या नहीं, यह निर्णय उन्हें ही लेना होगा। उन्हें सिद्घरमैया और कांग्रेस की इस याचिका पर भी विचार करना होगा कि जिन लोगों ने पार्टी व्हिप का पालन नहीं किया उन्हें अयोग्य घोषित किया जाना चाहिए। अगर विधानसभा अध्यक्ष उनका इस्तीफा स्वीकार करने के बजाय उन्हें अयोग्य घोषित करते हैं तो क्या होगा? इसमें कोई दो राय नहीं कि इस स्थिति में वे सर्वोच्च न्यायालय जाएंगे और यह प्रक्रिया चलती रहेगी..
 
दूसरी समस्या, बागियों की मनोदशा। वे अपने भविष्य को लेकर अनिश्चित हैं और मंत्री बनाए जाने को लेकर किसी तरह की गारंटी के अभाव में वे काफी दबाव महसूस कर रहे हैं। उनमें से कुछ अपनी मूल पार्टी में वापस लौटने का निर्णय कर सकते हैं। उस स्थिति में क्या होगा? सिद्घरमैया ने कह दिया है कि उन्हें किसी हालत में लौटने नहीं दिया जाएगा। लेकिन हालात बदल भी सकते हैं। 
 
तीसरी समस्या है भाजपा की खुद की दुविधा। पार्टी को पता है कि अगर विधानसभा अध्यक्ष विधायकों को अयोग्य घोषित कर देते हैं और उपचुनाव होते हैं तो बागी विधायक भाजपा से टिकट मांगेंगे, लेकिन भाजपा को पराजित करने में उनकी अहम भूमिका थी। पार्टी किसका दावा मानेगी? अपने पराजित विधायकों का या बागियों का? वह इकलौता मुद्दा नहीं है। भाजपा की आंतरिक स्थिरता भी संदेह के घेरे में है। येदियुरप्पा के सबसे बड़े विरोधियों में से एक बीएल संतोष को पार्टी की केंद्रीय इकाई में स्थानांतरित कर दिया गया है। जो लोग येदियुरप्पा के साथ नहीं हैं, वे दिल्ली में अपील कर सकते हैं। उनकी तादाद बहुत ज्यादा है। एक मुख्यमंत्री के लिए इससे बड़ा भय और क्या हो सकता है? 
 
इन तमाम समस्याओं के बीच केंद्र के पास एक तरीका यह है कि वह इस हकीकत को स्वीकार करे कि विधानसभा में त्रिशंकु की स्थिति है, संवैधानिक मशीनरी ध्वस्त हो चुकी है और ऐसे में केंद्र को नए चुनाव की घोषणा करनी होगी। परंतु यह कोई विकल्प नहीं है क्योंकि विधायक इस बात पर बवाल मचा देंगे कि चुने जाने के एक वर्ष के भीतर दोबारा चुनाव क्यों? यही कारण है कि कर्नाटक में चाहे जो भी हो लेकिन एक बात तो निश्चित है: जो भी सत्ता में आएगा वह एक ऐसी सरकार चलाएगा जो निरंतर अनिश्चय की स्थिति में रहेगी। 
Keyword: karnataka, B. S. Yeddyurappa, BJP,,
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