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खराब नजीर पेश करता पंचाट का फैसला

ओंकार गोस्वामी /  July 26, 2019

भारत को खराब दिवालिया निर्णयों से बचाव की आवश्यकता है। एस्सार स्टील मामले में न्यायमूर्ति मुखोपाध्याय द्वारा दिया गया निर्णय ऐसा ही एक फैसला है। विस्तार से बता रहे हैं ओंकार गोस्वामी 

 
राष्ट्रीय कंपनी लॉ अपील पंचाट (एनसीएलएटी) द्वारा एस्सार स्टील मामले में दिए गए फैसले के बाद देश के कानूनी और बैंकिंग हलकों में मानो आफत सी आ गई है। गत 4 जुलाई को दिए गए इस 116 पन्नों के निर्णय में एनसीएलएटी प्रमुख न्यायधीश सुधांशु मुखोपाध्याय ने दिवालिया पुनर्गठन के सिद्घांतों को मानो सर के बल उलट दिया है। इसे लेकर की गई टिप्पणियां भी नकारात्मक थीं। एक खबर की सुर्खी थी, 'एनसीएलएटी का एस्सार स्टील संबंधी फैसला सुरक्षित ऋणदाताओं के अधिकार का हनन करता है, आईबीसी का मजाक उड़ाता है।' एक अन्य खबर में लिखा गया कि एस्सार स्टील मामले में एनसीएलएटी का निर्णय एकदम गलत है। भारतीय स्टेट बैंक के चेयरमैन रजनीश कुमार ने कहा कि ऋणदाता इस निर्णय के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय का रुख करेंगे। 
 
सवाल यह उठता है कि उक्त आदेश क्या है और आईबीसी तथा दिवालिया प्रक्रिया के वैश्विक मानकों के समक्ष यह कहां टिकता है? दिवालिया का संबंध ऋण डिफॉल्ट से है। चूंकि ऋण में कर्जदार और कर्जदाता के बीच अनुबंध होता है। कर्ज चुकाने से जुड़ी तमाम बातों से इतर दिवालिया प्रक्रिया का एक सर्वमान्य सिद्घांत यह है कि कर्जदाता के बकाया कर्ज का निस्तारण अन्य दावेदारों से पहले किया जाएगा।  कर्ज के मामलों में दावेदारों का एक पदसोपान होता है। पहला दावा सुरक्षित कर्जदारों का होता है। इसमें बैंक और वित्तीय संस्थान आते हैं। आईबीसी इन्हें सुरक्षित वित्तीय कर्जदाता कहता है। अगर उनके दावों के निपटान के बाद कुछ बच जाता है तो असुरक्षित कर्जदाताओं की बारी आती है। ये होते हैं व्यापारिक कर्जदाता, सरकारी एजेंसियां और कर्मचारी आदि। इन सबके पास कर्जदाता के अधिकार होते हैं लेकिन इनका ऋण असुरक्षित होता है। आईबीसी में इन्हें परिचालन ऋण दाता कहा जाता है।
 
सुरक्षित वित्तीय ऋणदाताओं को दावे में वरीयता देने की दो वजह हैं। वैधानिक नजरिये से सबसे पहले सुरक्षित ऋणदाताओं का दावा निपटाया जाना चाहिए। इससे भी अहम यह कि ये सुरक्षित ऋणदाता यानी बैंक और वित्तीय संस्थान सार्वजनिक और जमाकर्ताओं के फंड का इस्तेमाल करते हैं। बिना वरीयता के दावे के पूरे बैंकिंग तंत्र को जोखिम पैदा हो जाएगा। बैंक अपने सुरक्षित ऋण की दर कम रखते हैं क्योंकि उन्हें कर्जदार की परिसंपत्ति का भरोसा रहता है। बिना इसके वे ज्यादा ब्याज वसूलेंगे। 
 
आईबीसी के अधीन दिवालिया निस्तारण की बात करें तो इसकी दो धाराएं अधिक महत्त्वपूर्ण हैं। पहली है धारा 30, जिसमें कहा गया है कि दिवालिया निस्तारण के लिए नियुक्त पेशेवर को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि कतिपय शर्तों का पालन हो। एक शर्त यह है कि योजना में असुरक्षित परिचालन ऋणदाताओं का कर्ज चुकाने के लिए अलग रखी गई राशि उस राशि से कम नहीं होनी चाहिए जो नकदीकरण की स्थिति में चुकाई जाती।  धारा 30 की अन्य शर्तों के अनुसार: (1) निस्तारण पेशेवर को योजना मंजूरी के लिए ऋणदाता समिति के समक्ष पेश करनी चाहिए (2) यदि वित्तीय ऋणदताओं की कुल मत हिस्सेदारी का 75 फीसदी पूरा होता है तो मंजूरी दी जाती है, बशर्ते कि यह बकाया सुरक्षित ऋण की हिस्सेदारी का प्रतिनिधित्व करता हो और (3) ऋणदाता समिति की मंजूरी हासिल हो और यह योजना समुचित प्राधिकार के समक्ष प्रस्तुत हो जो कि एनसीएलटी या अपील के मामलों में एनसीएलएटी है। 
 
धारा 31 में कहा गया है कि सक्षम प्राधिकार संतुष्ट है कि ऋणदाता समिति की निस्तारण योजना धारा 30 के अधीन सारी जरूरतों को पूरा करती है तो यह योजना को मंजूरी देते हुए आदेश पारित कर सकता है जो तमाम पक्षकारों पर लागू होगा।  न्यायमूर्ति मुखर्जी ने धारा 31 का इस्तेमाल करते हुए यह दर्शाया कि एनसीएलएटी केवल ऋणदाताओं की समिति की योजना को मंजूरी देने वाला प्राधिकार नहीं है बल्कि वह उसमें तब्दीली भी ला सकता है।  सबसे पहले उन्होंने पैरा 148 में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय की मनमानी व्याख्या करते हुए कहा कि परिचालन ऋणदाताओं और वित्तीय ऋणदाताओं के साथ समान व्यवहार होना चाहिए। यह आईबीसी और दिवालिया के नियमों के खिलाफ है। 
 
दूसरा, पैराग्राफ 149 और उसके बाद उन्होंने कहा कि आर्सेलर मित्तल द्वारा एस्सार स्टील के अधिग्रहण के बाद दी गई 42,000 करोड़ रुपये की राशि के वितरण में परिचालन और वित्तीय ऋणदाताओं में काफी भेदभाव किया गया। तीसरा, मुखोपाध्याय आईबीसी की धाराओं 5 (7) और 5 (8) में वित्तीय ऋणदाताओं और वित्तीय कर्ज की अजीब परिभाषा देते हुए कहते हैं कि निस्तारण योजना में वित्तीय ऋणदाता को सुरक्षित या असुरक्षित में नहीं बांटा जा सकता। यह बात नकदीकरण या दिवालिया पुनर्गठन के तमाम सिद्घांतों को धता बताती है। 
 
मुखोपाध्याय कहते हैं कि जहां परिचालन ऋणदाता को पुनर्गठन में नकदीकरण की तुलना में कम भुगतान नहीं किया जा सकता वहीं इसका यह अर्थ नहीं कि उन्हें अधिक राशि भी नहीं दी जा सकती। इस आधार पर उन्होंने ऋणदाता समिति द्वारा किए गए आवंटन को रद्द कर दिया और एक नई व्याख्या प्रस्तुत की जहां सभी ऋणदाताओं से समान व्यवहार किया जाना था। उनका आदेश नुकसान पहुंचाने वाला है क्योंकि यह दिवालिया पुनर्गठन के नियमों के खिलाफ है। 2017 में विश्व बैंक के कारोबारी सुगमता सूचकांक में भारत की रैंकिंग 190 देशों में 130वीं थी। ऋणशोधन के मामले हल करने में हम 136वें स्थान पर थे। आईबीसी की बदौलत 2019 में हम इस मामले में 108वें स्थान पर आ गए और हमारी कुल रैंकिंग सुधरकर 77वीं हो गई। अगर मुखोपाध्याय के नियमों को सर्वोच्च न्यायालय भी स्वीकार कर लेता है तो हम न केवल आधुनिक दिवालिया पुनर्गठन में पिछड़ जाएंगे बल्कि कारोबारी सुगमता में भी हमारी रैंकिंग कमजोर हो जाएगी।
 
यह इसलिए भी खतरनाक है क्योंकि अगर यह दिवालिया मामलों की न्यायिक व्याख्या का उदाहरण बन गया तो देश में विदेशी पूंजी का आगमन या दिवालिया फर्म के लिए उनका बोली लगाना मुश्किल हो जाएगा।  ऐसे परिदृश्य में मुझे नहीं लगता कि बैंक अपने फंसे हुए कर्ज की समस्या को जल्दी निपटा पाएंगे। अच्छी बात यह है कि भारत सरकार ने तेजी दिखाते हुए 17 जुलाई को आईबीसी में संशोधन का प्रस्ताव रख दिया जो कुछ अहम खामियों को दूर करेंगे। इससे मदद मिलनी चाहिए। चाहे जो भी हो लेकिन हमें सावधानी बरतनी होगी कि भविष्य में न्यायिक सक्रियता के उदाहरण स्वरूप ऐसे फैसले न आएं जो दिवालिया प्रक्रिया की बिल्कुल समझ न रखते हों।
 
यह इसलिए भी खतरनाक है क्योंकि यहां भी 'किंतु भारत जैसे देश में...' जैसी दलील इस्तेमाल की गई। याद रहे सन 1991 तक देश में सैकड़ों मूर्खतापूर्ण आर्थिक निर्णय लिए गए और उन्हें ऐसी ही दलील के माध्यम से उचित ठहराया गया। बीते 28 वर्षों में इसमें नाटकीय रूप से कमी आई है। फिर भी यह दबे छिपे ढंग से सामने आ ही जाता है। न्यायमूर्ति मुखोपाध्याय का निर्णय ऐसा ही मामला है। 
Keyword: NCLT, essar steel, banking,,
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