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दिवास्वप्न जैसे लक्ष्य

साप्ताहिक मंथन
टी. एन. नाइनन /  July 26, 2019

मोदी सरकार अपने लिए ऐसे महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य तय करती है जिनके बारे में अधिकांश लोगों को लगता है कि इन्हें हासिल नहीं किया जा सकता है। ऐसे कुछ लक्ष्यों की बात करें  तो जीडीपी में विनिर्माण की हिस्सेदारी को 2022 तक 17 फीसदी से बढ़ाकर 25 फीसदी करना, 2022 तक ही किसानों की आय दोगुनी करना, 2025 तक निर्यात दोगुना करना और 2025 तक जीडीपी का आकार 5 लाख करोड़ डॉलर करना शामिल हैं। गत वर्ष तक इसका आकार 2.7 लाख करोड़ डॉलर था। लक्ष्य को हासिल करने के लिए जीडीपी में 8 फीसदी की औसत वार्षिक वृद्धि की जरूरत होगी, वह भी तब जबकि मुद्रास्फीति 4 फीसदी हो। सरकार को ये महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य तय करने का प्रोत्साहन इस बात से मिलता होगा कि उसने ऐसे ही कुछ लक्ष्य हासिल करने की दिशा में अहम प्रगति की है। इनमें घरेलू गैस की उपलब्धता, राजमार्ग निर्माण, नवीकरणीय ऊर्जा, बैंकिंग समावेशन और खुले में शौच से मुक्ति शामिल हैं। परंतु शौचालय बनाने जैसे लक्ष्य हासिल करना एक बात है और महत्त्वाकांक्षी वृहद आर्थिक लक्ष्यों को हासिल करना एकदम अलग बात है। ऐसा इसलिए क्योंकि इसके लिए शिथिल नियंत्रण वाली व्यवस्था, तालमेल भरे कदम और उचित नीतिगत ढांचे के साथ समय-सीमा का मजबूती से पालन आवश्यक हैं। सरकार पहले मोर्चे पर तो सफल है लेकिन बाद वाले मुद्दों पर नहीं।

 
निर्यात वृद्धि की बात करें तो गत पांच वर्षों में इसमें 5 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। ऐसे समय में जबकि वैश्विक कारोबारी माहौल में गिरावट आ रही है, अगले छह वर्ष में इसमें 100 फीसदी की बढ़ोतरी लाने के लिए कितने बदलाव और प्रयास की आवश्यकता पड़ेगी, यह अंदाजा लगाया जा सकता है। जीडीपी में विनिर्माण की हिस्सेदारी मोदी सरकार के पहले कार्यकाल से ही थमी हुई है। ऐसे में अगले कुछ वर्ष में इसमें 50 फीसदी सुधार की अपेक्षा कैसे की जाए? किसानों की आय दोगुनी करने के लिए सरकार के पास नीतिगत उपाय नहीं हैं और वित्तीय हालात भी अनुकूल नहीं हैं।
 
अवास्तविक लक्ष्य तय करने का सिलसिला मोदी सरकार के शुरुआती वर्षों तक जाता है। तब कहा गया था कि जीडीपी वृद्धि दर को दो अंकों में ले जाया जाएगा। आज जब हम हकीकत के करीब हैं तो अगर हम अरविंद सुब्रमण्यन की चिंताओं को किनारे कर आधिकारिक जीडीपी आंकड़ों को स्वीकार कर लें तो भी विगत कुछ वर्षों में जीडीपी वृद्धि दर औसतन 7 फीसदी रही है। अधिकांश पूर्वानुमान कहते हैं कि वृद्धि इस वर्ष और अगले वर्ष इसके आसपास ही रहेगी। अगर 5 लाख करोड़ डॉलर के लक्ष्य को गंभीरता से लिया जाए तो जीडीपी वृद्धि दर को बढ़ाकर औसतन 8.5 फीसदी करना होगा। वर्ष 2008 के वित्तीय संकट के बाद से हम इस लक्ष्य को हासिल नहीं कर सके हैं। कहने वाले कह सकते हैं कि इस लक्ष्य को हासिल करने में एक वर्ष की देरी से कुछ खास नुकसान नहीं होगा। ऐसे में चिदंबरम की बात याद आती है कि तब यह मौजूदा वृद्धि दर का संयुक्तीकरण रह जाएगा। असल मसला है सरकार की नीतिगत दिशा का। उदाहरण के लिए संरक्षणवाद और शुल्क नीति के मामले में सरकार निर्यात मामलों के उच्च स्तरीय सलाहकार समूह की अनुशंसा के एकदम विपरीत काम कर रही है। दो श्रम संहिताओं से श्रम कानून संबंधी कुछ मुद्दों से निबटा जा रहा है जिन्हें अंतिम रूप दिया जा चुका है। अधिक लचीले श्रम बाजार का मूल मुद्दा आंशिक रूप से ही हल हुआ है। वैश्विक आपूर्ति शृंखला से एकीकरण बढ़ाने की दिशा में भी कुछ खास नहीं हुआ।
 
आगे की राह आसान नहीं रहने वाली है, यह बात प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद की लॉजिस्टिक सलाहकार समिति की गत दिसंबर की रिपोर्ट से पता लग चुकी है। रिपोर्ट देश के निर्यातकों की लागत की समस्या और बुनियादी सुविधाओं की कमी का जिक्र करती है और अन्य देशों के निर्यातकों से उनकी तुलना प्रस्तुत करती है। पोर्ट लॉजिस्टिक्स (नौपरिवहन समेत) के कारण कुल लागत 7 से 8 फीसदी बढ़ जाती है। परिवहन, पूंजी, बिजली आदि अन्य लागत भी दूसरे देशों से अधिक हैं। प्रक्रियाओं और दस्तावेजीकरण को सुसंगत और आसान बनाने की दिशा में भी अभी काफी कुछ किया जाना है। यह नई सरकार के कार्यकाल के शुरुआती दिन हैं। एक ओर जहां 100 दिन की कार्य योजना की बात हो रही है, वहीं सबको पता है कि प्रधानमंत्री भारी भरकम कदम के बजाय चरणबद्ध तरीके से आगे बढऩा पसंद करते हैं। इसके बावजूद अगर उनकी सरकार चाहती है कि तय किए गए महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य शर्मिंदगी का सबब न बन जाएं तो उसे तेजी से कदम उठाने होंगे।
Keyword: narendra modi, economy, GDP,,
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