बिजनेस स्टैंडर्ड - श्रम प्रवास से वृद्धि
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श्रम प्रवास से वृद्धि

संपादकीय /  July 25, 2019

आंध्र प्रदेश विधानसभा ने गत बुधवार को एक ऐसे कानून पर मुहर लगाई जो राज्य के उद्योगों में तीन-चौथाई नौकरियां स्थानीय लोगों के लिए आरक्षित करने का प्रावधान करता है। मुख्यमंत्री वाई एस जगन मोहन रेड्डी की पार्टी वाईएसआर कांग्रेस ने विधानसभा चुनावों के दौरान इसे चुनावी मुद्दा बनाया था और यह कदम उसी वादे को पूरा करने की दिशा में उठाया गया है। आंध्र प्रदेश में कारोबार कर रही कंपनियों को तीन वर्षों के भीतर इस कानून का पालन करने के लिए कहा गया है। केवल दवा एवं पेट्रोलियम जैसे कुछ खास क्षेत्रों की कंपनियों को ही इससे छूट दी जाएगी और वह छूट भी मामला-दर-मामला तय होगी। आंध्र्र प्रदेश और महाराष्ट्र समेत कई राज्यों में अन्य राज्यों से रोजगार की तलाश में आने वाले लोगों की बढ़ती संख्या के चलते लंबे समय से टकराव की स्थिति बनती रही है और जगन मोहन सरकार का यह फैसला उसी का नतीजा है।  
 
राज्यों में नेता अक्सर रोजगार का वादा पूरा करने के लिए निजी क्षेत्र पर स्थानीय लोगों को काम पर रखने का दबाव बनाते हैं। लेकिन ऐसे कानून से रोजगार की तलाश कर रहे लोगों के संतुष्ट हो जाने की संभावना नहीं होती है। दरअसल बदले हुए हालात में कंपनियां आंध्र प्रदेश में काम करने से पहले दो-बार सोचेंगी। वहीं पहले से मौजूद कंपनियों की श्रम लागत बढ़ जाएगी, काम पर रखे जा सकने लायक लोगों की संख्या कम हो जाएगी। फिर वे अधिक संतोषजनक कारोबारी माहौल वाली जगह जाने का रास्ता चुनने लगेंगी, चाहे वह जगह किसी अन्य राज्य में हो या किसी दूसरे देश में। पूंजी का पलायन हकीकत बन जाएगा। वह स्थिति रोजगार सृजन एवं वृद्धि की नहीं बल्कि गतिहीनता एवं शहरी अशांति को जन्म देगी।
 
आंध्र प्रदेश में लंबे समय से कारोबार के प्रति दोस्ताना रवैया रखने वाली सरकारें रही हैं लेकिन नए कानून से इस धारणा पर तगड़ी चोट पहुंचेगी। राज्य सरकार ने कहा है कि कुशल कामगारों की कमी को स्थानीय लोगों को काम पर नहीं रखने का बहाना नहीं बनाया जा सकता है और ऐसा होने पर कंपनियों को उन लोगों को खुद ही प्रशिक्षण देना होगा। इस तरह यह कानून कामगारों को कुशल बनाने का दायित्व सरकार से लेकर निजी क्षेत्र पर डाल देता है। इससे भी बुरी बात यह है कि इस कानून को अन्य राज्यों में भी लागू करने की आवाज जोर पकड़ सकती है। वैसे मध्य प्रदेश की कांग्रेस सरकार की औद्योगिक नीति भी इससे खास अलग नहीं है जिसके मुताबिक सरकार की वित्तीय एवं अन्य मदद से स्थापित किसी भी कारखाने में 70 फीसदी नौकरियां स्थानीय लोगों के लिए आरक्षित रखनी होंगी।
 
बुरी लेकिन लोकलुभावनी नीति जंगल में लगी आग की तरह फैल सकती है। इसकी काफी संभावना है कि प्रवासी श्रमिकों की बड़ी संख्या वाले महाराष्ट्र एवं कर्नाटक जैसे राज्य भी इस तरह का कोई कानून लाने के बारे में चर्चा शुरू कर दें। ऐसा होना भारतीय संविधान के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है। इसके अलावा यह भारत की वृद्धि संभावनाओं पर भी गहरी चोट करेगा। आर्थिक वृद्धि के सिद्धांत में एक बुनियादी एवं स्पष्ट नियम है कि अकुशल श्रमिकों को शहरों का रुख करना चाहिए ताकि वे अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने में योगदान दे सकें। अपनी क्षेत्रीय विषमताओं की वजह से भारत में यह प्रक्रिया स्वाभाविक तौर पर राज्यों के बीच भी घटनी चाहिए। ऐसे में श्रमिकों की आवाजाही पर पाबंदी लगने से भारत की वृद्धि संभावनाएं प्रभावित होंगी। चीन जैसे विशाल देशों ने इस आंतरिक प्रवास के चलते काफी अच्छा प्रदर्शन किया है। ऐसे कानून से भारत के तटीय एवं दक्षिणी राज्यों और उत्तरी राज्यों के बीच असंतोष भी बढ़ेगा। दरअसल तटीय एवं दक्षिणी राज्य विश्व अर्थव्यवस्था से अपना तालमेल बिठा चुके हैं जबकि उत्तरी राज्यों में बेरोजगार युवाओं की भरमार है और उनके पास रोजगार के लिए नजदीकी विकल्प भी नहीं हैं। 
Keyword: andhra pradesh, bill, law, labor, job,
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