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बातचीत और राजनीतिक पहल से ही कश्मीर में निकलेगा कोई हल

दोधारी तलवार
अजय शुक्ला /  July 24, 2019

पिछले हफ्ते मैंने कश्मीर के युवाओं की मनोदशा परखने के लिए वहां चार दिन बिताए। कश्मीर के युवाओं से बातचीत काफी अहम है। हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के अलगाववादी नेताओं के 'संयुक्त प्रतिरोध नेतृत्व' खत्म होने के बाद एक विभाजित एवं बेहद स्थानीय युवा नेतृत्व अब सुरक्षाबलों के साथ टकराव की राह पर है। दक्षिण कश्मीर के अशांत जिलों में युवाओं से बात करने पर साफ हो जाता है कि भारत सरकार को लेकर लंबे समय से चला आ रहा कश्मीरी गुस्सा अब नफरत में तब्दील हो चुका है। हरेक कश्मीरी यही दलील देगा कि मोदी सरकार का 'तीव्र मुस्लिम-विरोध' द्वि-राष्ट्र सिद्धांत को वैधता देता है और इस देश में अब मुसलमानों के लिए कोई जगह नहीं रह गई है। वे सुरक्षाबलों के हाथों दुव्र्यवहार की अनगिनत घटनाएं बताते हैं। उनके मुताबिक हरेक कश्मीरी को निर्दोष साबित होने तक आतंकवादी ही माना जाता है। वहां के युवाओं में नशे की बढ़ती लत के लिए भी भारतीय साजिश को जिम्मेदार माना जाता है। कई युवाओं का कहना कि आजादी मिलने तक कश्मीर के लोग अपना संघर्ष जारी रखेंगे।

 
हालांकि कश्मीर मामलों के जानकारों का कहना है कि लोगों के भीतर के इस गुस्से को बाहर निकालने की जरूरत है। किसी भी बातचीत का दूसरा हिस्सा पहले हिस्से की तुलना में समझदारी और व्यवहारिकता से भरा होता है। कश्मीरियों को अपनी स्थिति सड़क के दोराहे जैसी नजर आ रही है। एक रास्ता अनवरत हिंसा, अनिश्चय और सुरक्षाबलों की कार्रवाई से भरपूर है तो दूसरा रास्ता वार्तालाप एवं शांति वाला है। सबको मालूम है कि बातचीत शुरू करने भर से हिंसा खत्म नहीं होगी लेकिन इससे ध्यान संघर्ष के बजाय मेलमिलाप पर केंद्रित हो जाएगा। कश्मीर के लोग नई दिल्ली से बातचीत की पहल होने की राह देख रहे हैं लेकिन सरकार ने अभी अपने पत्ते नहीं खोले हैं। 
 
लोगों के भीतर दशकों से जारी हिंसा से उपजी थकान भी एक कारक है। सुरक्षाबलों के साथ मुठभेड़ में आतंकी कमांडर बुरहान वानी के मारे जाने के बाद 2016 के मध्य में कश्मीर घाटी सुलग उठी थी। उसके बाद से केंद्र सरकार ने सुरक्षाबलों के ही जरिये कश्मीर से संवाद रखा है। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल की यह रणनीति इस धारणा पर आधारित है कि दशकों से कश्मीरियों को पुचकारा जाता रहा है और अब उन्हें यह याद दिलाने की जरूरत है कि केंद्र मुश्किल विकल्प भी अपना सकता है। इसी राह पर चलते हुए केंद्र सरकार ने आतंक-रोधी अभियानों के साथ अलगाववादी नेताओं के वित्तीय स्रोतों पर नकेल कसी है। इस दौरान सैयद अली शाह गिलानी और मीरवाइज उमर फारूक को घर में नजरबंद रखा गया जबकि यासीन मलिक और शब्बीर शाह को जेल भेजा जा चुका है। 
 
महबूबा मुफ्ती की सरकार गिरने के बाद राज्य में राज्यपाल शासन लागू कर राजनीतिक गतिविधियां भी लगभग रोक दी गई हैं। उमर अब्दुल्ला की नैशनल कॉन्फ्रेंस को भी बख्शे जाने की संभावना नहीं है। प्रशासन की कमान राज्यपाल सत्यपाल मलिक के हाथों में है जिनकी छवि पर सवाल उठते रहे हैं। सुरक्षाबलों की भी लग रहा है कि वे नीचे आने वाले एस्केलेटर पर भाग रहे हैं। पुलिस रिकॉर्ड बताता है कि वर्ष 2013-15 में सड़क पर हिंसा का दौर थमने, पर्यटन के जोर पकडऩे और घाटी में महज 150 आतंकवादी ही रह जाने की माकूल स्थिति का फायदा उठाकर राजनीतिक संवाद का मौका गंवा दिया गया था। इसके बजाय भाजपा की अगुआई वाली केंद्र सरकार के बहुसंख्यक एजेंडा ने कश्मीर को फिर से अलगाव की तरफ धकेल दिया। गत तीन वर्षों में हिंसा की यह आग और भड़की है। इस दौरान सुरक्षाबलों को भी खासा नुकसान उठाना पड़ा है। वर्ष 2009-12 के दौरान हरेक तीन आतंकी मारने के क्रम में एक जवान शहीद होता था लेकिन 2016 के बाद से यह अनुपात दोगुना हो गया है। इस स्थिति पर काबू पाना है तो कश्मीर में नई राजनीतिक पहल होनी जरूरी है। 
 
ऐसा कुछ होने के संकेत नजर आ रहे हैं। गृह मंत्री अमित शाह ने पिछले महीने कश्मीर यात्रा के दौरान नवनिर्वाचित पंचायत प्रमुखों को संबोधित किया। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कश्मीर मसले के जल्द समाधान का ऐलान करते हुए कहा है कि दुनिया की कोई भी ताकत इसे रोक नहीं सकती है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि अगर बातचीत से ऐसा नहीं हुआ तो दूसरा रास्ता भी मालूम है। कश्मीर में चल रहीं सरकारी योजनाओं पर प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) की निगरानी बढऩे से भी चुनावों के संकेत मिलते हैं।
 
स्थानीय नेता मानते हैं कि भाजपा कश्मीर में अपनी सरकार बनाने की रणनीति पर काम कर रही है ताकि अनुच्छेद 370 और 35ए को वह संविधान से हटा सके। लेकिन कश्मीरी नेताओं एवं सुरक्षा विशेषज्ञों दोनों का मानना है कि कश्मीर की अलग पहचान पर चोट करने वाली कोई भी योजना गहरी खाई पैदा कर सकती है। हालांकि भाजपा की सोच है कि विधानसभा में बहुमत होने और सुरक्षाबलों के सहारे वह इन बदलावों पर होने वाली प्रतिक्रिया से निपट सकती है। विधानसभा में बहुमत हासिल करने के लिए भाजपा को जम्मू क्षेत्र की 37 एवं लद्दाख की चार सीटों पर भारी जीत दर्ज करनी होगी। कश्मीर घाटी में भी कुछ छिटपुट सीटें जीतकर वह 87 सदस्यीय विधानसभा में बहुमत की उम्मीद कर सकती है। लेकिन इसके लिए नैशनल कॉन्फ्रेंस और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी को कमजोर करना होगा और छोटे दलों का भी साथ लेना होगा।
 
लेकिन कट्टरपंथी अलगाववादियों को वार्तालाप में शामिल नहीं करने पर मोदी सरकार की प्रतिष्ठा को ठेस लगेगी। मेलमिलाप बढ़ाने के साथ सरकार को कश्मीरी युवाओं को घाटी से बाहर निकलने और मुख्यधारा में शामिल होने का मौका भी देना होगा। कभी उग्रवादी हिंसा से ग्रस्त रहे पूर्वोत्तर राज्य मुख्यधारा का हिस्सा बन रहे हैं। यही रास्ता कश्मीर के युवाओं के लिए भी अपनाया जाना चाहिए।
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