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भारत में जी 20 की बैठक कैसे हो कामयाब

आलोक शील /  July 24, 2019

भारत को इस बात को लेकर सचेत रहना होगा कि दुनिया का प्रमुख बहुपक्षीय आर्थिक मंच कहीं द्विपक्षीय बातचीत का मंच बनकर न रह जाए। विस्तार से जानकारी प्रदान कर रहे हैं आलोक शील

 
इस बात पर आम सहमति है कि जी 20 वैश्विक आर्थिक सहयोग का प्रमुख बहुपक्षीय मंच है। जी 20 देशों की 17वीं शिखर बैठक सन 2022 में भारत में आयोजित होगी। यह अब तक की सर्वाधिक अधिकार प्राप्त बैठक होगी जिसकी हमारा देश मेजबानी करेगा। इस दौरान तमाम महत्त्वपूर्ण देशों के नेताओं के मौजूद रहने की उम्मीद है। इनमें जी 7 देशों के नेता और ब्रिक्स के नेता शामिल हैं। भारतीय प्रधानमंत्री एक ऐसी बैठक की अध्यक्षता करेंगे जिसमें अमेरिका के राष्ट्रपति, ब्रिटिश प्रधानमंत्री, जर्मन चांसलर, यूरोपीय संघ के प्रमुख, चीन के राष्ट्रपति, जापान के प्रधानमंत्री, रूस के राष्ट्रपति के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ), विश्व बैंक और संयुक्त राष्ट्र जैसे संस्थानों के प्रमुख भी मौजूद रहेंगे। माना जा रहा है कि ये नेता एक दस्तावेज पर हस्ताक्षर करेंगे जिसे इतिहास में नई दिल्ली घोषणापत्र या 'नई दिल्ली कार्य योजना' के नाम से जाना जा सकता है। 
 
जी 20 शिखर बैठक की सफल मेजबानी के क्या-क्या जरूरी है? सबसे पहले तो इतने सारे प्रभावशाली वैश्विक नेताओं की एक ही स्थान पर मेजबानी, उनका परिवहन और सुरक्षा व्यवस्था अपने आप में एक बड़ी चुनौती है। माना जा रहा है कि इस शिखर बैठक का आयोजन दिल्ली में निर्माणाधीन एक नई इमारत में होगा। हालांकि यह जरूरी नहीं कि बैठक का आयोजन दिल्ली में ही किया जाए। शुरुआती कुछ शिखर बैठकों का आयोजन कान (फ्रांस), लॉकस काबॉस (मैक्सिको) और ओसाका में हुई बैठकें प्राय: आरामदेह रिजॉर्ट में आयोजित की गईं। समुचित आयोजन स्थलों के अलावा सुरक्षा, हवाई एवं सड़क परिवहन पर नियंत्रण के साथ-साथ पर्याप्त संख्या में पांच सितारा होटलों के कमरों की भी आवश्यकता होगी। 
 
जी 20 ने बहुत सचेत ढंग से यह निर्णय लिया है कि वह अपना सचिवालय नहीं स्थापित करेगा। ऐसा इस आशंका के कारण किया गया कि कहीं यह संस्थान भी आईएमएफ और विश्व बैंक की तरह अंतरराष्ट्रीय अफसरशाही का बंधक बनकर न रह जाए। इस संगठन की चाह यह रही है कि इसके नेता शिखर बैठक की प्रक्रियाओं में अहम जिम्मेदारी संभालें। माना जाता है कि साल दर साल इसकी अध्यक्षता बदलने से नई ऊर्जा का संचार होगा और संस्थान आगे बढ़ेगा। वर्तमान, पिछले और आगामी अध्यक्ष देश इसे संस्थागत निरंतरता प्रदान करते हैं। भारत सन 2021 से 2023 तक इस त्रयी का सदस्य रहेगा। बैठक की अध्यक्षता करने वाले देश को यह विशेषाधिकार रहता है कि वह तीन विशेष आमंत्रित देशों में से दो का चयन करे। हालांकि स्पेन जी 20 का हिस्सा नहीं है लेकिन उसने इसकी हर बैठक में शिरकत की है। अफ्रीका से भी एक विशेष आमंत्रित सदस्य रहता है। भारत के पास अवसर है कि वह अपने विशेषाधिकार का प्रयोग कर सार्क देशों में से किसी एक को बैठक में शामिल होने का न्योता दे।
 
जी 20 की स्थापना सन 1999 में एशियाई वित्तीय संकट के दौरान वित्त मंत्रियों और केंद्रीय बैंक गवर्नरों के स्तर पर की गई थी। सन 2008 में शेरपा चैनल के साथ इसेबढ़ाकर शिखर वार्ता के स्तर का कर दिया गया। शेरपा वह नेता होता है जो आयोजन के घोषणापत्र पर बनी सहमति की जवाबदेही लेता है। शुरुआती तीन शिखर बैठकें वाशिंगटन डीसी, लंदन और पिट्सबर्ग में आयोजित की गईं। ये तीनों बैठकें तात्कालिक वैश्विक वित्तीय संकट से निपटने का जरिया थीं। पिट्सबर्ग में विजय की घोषणा के साथ जी 20 ने अपना ध्यान ढांचागत और संकट से परे अन्य मुद्दों पर देना शुरू किया। इसमें वित्तीय नियमन सुधार, वैश्विक असंतुलन दूर करना और वृद्धि शामिल थे। भारत कनाडा के साथ जी 20 के शीर्ष कार्य समूह का सह-अध्यक्ष है। मजबूत, स्थायी, संतुलित और समान वृद्धि इसका लक्ष्य है। बाद में इसमें विकास, पर्यावरण, व्यापार, कृषि आदि विभागों के मंत्री भी शामिल किए गए। थिंक टैंक 20, वीमन 20 और यूथ 20 के रूप में इसके गैर सरकारी अंग भी हैं।
 
एक ऐसी शिखर बैठक जिसके सहमति दस्तावेज पर दुनिया के तमाम शीर्ष राजनेता हस्ताक्षर करते हों, उसे तैयार होने में एक वर्ष से अधिक का वक्त लगता है। सन 2020 में शिखर बैठक की अध्यक्षता करने वाले देश सऊदी अरब में सन 2018 में ही सचिवालय स्थापित कर लिया गया था। चूंकि देश में नई सरकार आ चुकी है, इसलिए हमारे यहां भी इस दिशा में काम शुरू कर देना चाहिए। अध्यक्षता वाले देश के लिए वर्ष भर के लिए तीन चार चार प्राथमिकताएं तय करना और जी 20 पर अपनी छाप छोडऩे के लिए नए काम शुरू करने की रस्म है। भारत को यह देखना होगा कि वह किन बातों को प्राथमिकता पर रखना चाहता है और वह किन मंत्रालयों की मेजबानी करना चाहता है। इन बातों में जहां भारत के घरेलू हित झलकने चाहिए, वहीं एक सफल शिखर बैठक में बड़े मुल्कों मसलन अमेरिका और जर्मनी तथा चीन आदि को भी प्रक्रिया से जोडऩा चाहिए। 
 
इस प्रक्रिया का नेतृत्व करने वाले भारतीय शेरपा का कद ऐसा हो कि उसे वैश्विक नेतृत्व समूह में मान मिले। इसके अलावा उसे प्रधानमंत्री का भरोसा और करीबी हासिल हो। ऐसी उच्चस्तरीय शिखर बैठक के लिए प्राय: ऐसे व्यक्ति को शेरपा चुनना चाहिए जो प्रधानमंत्री कार्यालय से जुड़ा हो। हालंाकि वह विदेश मंत्रालय से भी हो सकता है। समुचित अनुभव वाले सेवारत या सेवानिवृत्त अफसरशाह को यह दायित्व सौंपा जा सकता है, हालांकि ऐसा अनिवार्य नहीं है। विदेश मंत्रालय और आर्थिक मामलों के मंत्रालय की एक मजबूत और समर्पित टीम का होना जरूरी है। विदेश मंत्रालय को जी 20 देशों के दूतावासों से बेहतर संवाद कायम करना होगा। खासतौर पर प्रतिभागी चयन के मामले में। 
 
जोखिम इस बात का है कि अगर जी 20 के प्रमुख देशों ने मजबूती नहीं दिखाई तो बैठक पर ऐसी बातें हावी हो सकती है जिनका आधिकारिक एजेंडे से कोई लेनादेना नहीं है। खासतौर पर तब जबकि इसकी मेजबानी एक गैर जी 7 देश कर रहा है। सीरिया संकट ने सेंट पीटर्सबर्ग में आयोजित बैठक को प्रभावित किया था। ब्रेक्सिट, खशोगी मामले और द्विपक्षीय व्यापार से जुड़े मुद्दों ने ब्यूनस आयरस की बैठक को प्रभावित किया था। हाल ही में ओसाका में संपन्न बैठक पर अमेरिका-चीन की व्यापारिक लड़ाई की छाया पडऩा लाजिमी था।
 
जी 20 देशों की बैठक में दुनिया भर के शीर्ष नेता एकत्रित होते हैं। ऐसे में द्विपक्षीय चर्चाएं होना अस्वाभाविक नहीं है। परंतु दुनिया के इस शीर्ष बहुपक्षीय आर्थिक मंच पर इसका खतरा कभी इतना नहीं रहा जितना कि अभी महसूस किया जा रहा है। जी 20 देशों की शिखर बैठक का असल परीक्षण इस बात से होगा कि इसे नई दिल्ली घोषणा पत्र/कार्य योजना के लिए जाना जाता है या महाशक्तियों के बीच उच्च स्तरीय द्विपक्षीय चर्चाओं के लिए।
 
(लेखक अवकाश प्राप्त आईएएस अधिकारी और इक्रियर की आरबीआई चेयर में हैं। वह पहले सात जी 20 शिखर सम्मेलनों में भारत के प्रतिनिधिमंडल से संबद्ध रहे।)
Keyword: G20, india, economy,,
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