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श्रम कानूनों में सुधार

संपादकीय /  July 24, 2019

सरकार ने भारत में निवेश आकर्षित करने की बड़ी बाधा माने जाने वाले जटिल श्रम कानूनों के सुधार की दिशा में कदम बढ़ा दिए हैं। सरकार ने अपने कार्यकाल के पहले दो महीनों में ही श्रम सुधारों से संबंधित दो नए विधेयक पेश कर श्रम कानूनों से जुड़ी गुत्थी सुलझाने की प्रतिबद्धता दर्शायी है। इन दोनों कानूनों- वेतन संहिता विधेयक और पेशेवर सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कामकाजी हालात विधेयक 2019 में 17 पुराने श्रम कानूनों का समावेश किया गया है। इस तरह श्रम कानूनों संबंधी प्रावधानों की कुल संख्या 747 से घटकर 203 रह गई है। सहज अनुपालन के लिए एक अहम प्रस्ताव एकल पंजीकरण, एकल लाइसेंस और सेवा एवं उद्योग प्रतिष्ठान के लिए एकल रिटर्न भरने के साथ ही देश भर में कहीं भी कम-से-कम 10 कर्मचारियों को नौकरी पर रखने का है। इससे न केवल विश्व बैंक के कारोबारी सुगमता सूचकांक में भारत की रैंकिंग सुधरेगी बल्कि यहां नया कारोबार लगाना भी अधिक सरल हो सकेगा। फिलहाल एक इकाई को आठ श्रम कानूनों के तहत पंजीकरण कराना होता है, अलग-अलग लाइसेंस लेने होते हैं और 17 कानूनों के लिए रिटर्न भरना होता है।

 
इसी तरह पेशेवर सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कामकाजी हालात विधेयक में किए गए एक प्रावधान के मुताबिक, कंपनियों को पांच साल की अवधि के लिए अनुबंधित कामगारों वाली कई परियोजनाएं पूरी करने के लिए एक ही लाइसेंस लेने की जरूरत होगी। फिलहाल कंपनियों को अलग-अलग परियोजनाओं के लिए अलग-अलग लाइसेंस लेने पड़ते हैं जिससे उनको पूरा करने में देर होती है। हालांकि कंपनियों के लिए पांच वर्षों के दौरान जरूरत पडऩे वाले अनुबंधों की संख्या के बारे में बताने का जिक्र करने वाले उपबंध पर फिर से गौर किया जाना चाहिए। निर्धारित संख्या से एक भी अधिक कर्मचारी रखने के लिए लाइसेंस की दोबारा अर्जी लगाने को कहने से कानून का अनुपालन सरल बनाने का विचार धराशायी हो जाएगा।
 
वेतन विधेयक संहिता का नया मसौदा स्वागतयोग्य है क्योंकि वर्ष 2017 में पेश किया गया पिछला मसौदा सभी कर्मचारियों को न्यूनतम वेतन कानून के दायरे में लाने की बात करता था। सरकार ने राज्यों के लिए अलग-अलग 'राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन' तय करने के प्रस्ताव पर उनकी चिंताएं भी दूर करने की कोशिश की है। यह राज्यों के लिए एक अनिवार्य ढांचा तय करेगा जो 'श्रमिकों की न्यूनतम बुनियादी जरूरतों' पर आधारित होगा। इससे राज्यों को एक ही स्तर पर होने के बावजूद अपने यहां न्यूनतम वेतन का अलग स्तर तय करने की सुविधा मिलेगी। अगला तर्कसंगत कदम इस स्तर को वाजिब स्तर पर रखने का होगा ताकि सभी राज्य प्रतिस्पद्र्धा के मोर्चे पर पीछे छूटे बगैर नियम का पालन कर सकें।
 
लेकिन इस कानून में रखा गया यह प्रस्ताव गलत है कि न्यूनतम वेतन 'प्राथमिक तौर पर' दक्षता या भूगोल या इन दोनों के आधार पर तय किया जाएगा। कुशल श्रमिकों के लिए न्यूनतम वेतन तय करने से बाजार के सुचारु संचालन में बाधा आएगी क्योंकि न्यूनतम स्तर से आगे वेतन बाजार से ही जुड़ा होना चाहिए। इसके अलावा केरल में कुशलता के आधार पर 10 अलग तरह के न्यूनतम वेतन हैं जबकि चंडीगढ़ में नौ और बिहार एवं दिल्ली में छह-छह तरह के न्यूनतम वेतन हैं। यह विधेयक एक राज्य में न्यूनतम वेतन के अलग स्वरूप पैदा कर सकता है। आगे चलकर श्रम सुधार की दिशा में असली परीक्षा औद्योगिक संबंध विधेयक संहिता पर होगी। कारोबारी इकाइयों को अपने कर्मचारियों की छंटनी करने या धंधा बंद करने के मामले में अधिक लचीला बनाने के लिए यह सुधार अहम होगा। अधिक कर्मचारियों को नौकरी पर रखने और आर्थिक स्थिति को काबू में रखने के लिए इकाइयों को अधिक लचीला बनाने से वैश्विक बाजार में भारत की प्रतिस्पद्र्धात्मकता बढ़ेगी। 
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