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एफपीआई करेंगे बढ़े अधिभार से बचने के लिए पी-नोट्स का रुख

ऐश्ली कुटिन्हो / मुंबई July 23, 2019

आम बजट में लगाए गए अतिरिक्त अधिभार से बचने के लिए विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक भारत में नए निवेश के लिए पार्टिसिपेटरी नोट्स (पी-नोट्स) का रुख कर सकते हैं। सरकार ने पिछले हफ्ते ट्रस्ट या एसोसिएशन ऑफ पर्सन्स के तौर पर संगठित एफपीआई पर लगाए गए सुपर-रिच टैक्स को वापस लेने से इनकार किया। इससे 40 से 50 फीसदी एफपीआई प्रभावित हो सकते हैं। विशेषज्ञों ने कहा, अधिभार से प्रभावित होने वाले 10 से 15 फीसदी एफपीआई अपना नया निवेश पी-नोट्स के जरिए कर सकते हैं। ट्रांजेक्शन स्क्वैयर के संस्थापक गिरीश वनवारी ने कहा, विदेशी संस्थान पी-नोट्स जारी करते हैं, जो मौटे तौर पर कंपनियां होती हैं। ऐसे में अधिभार बढ़ोतरी से बचने का यह एक रास्ता हो सकता है क्योंकि यहां कॉरपोरेट ढांचा अंतर्निहित है।
 
पंजीकृत एफपीआई विदेशी निवेशकों को पी-नोट्स जारी करते हैं जो भारत में नियामक के पास खुद को पंजीकृत कराए बिना यहां निवेश करना चाहते हैं। नियामकीय बदलाव ने पिछले दो साल से इस मार्ग को निवेशकों के लिए अलोकप्रिय बना दिया है और एफपीआई की कस्टडी के तहत इनकी परिसंपत्तियों के कुल प्रतिशत के तौर पर इनकी परिसंपत्तियां 2.5 फीसदी रह गई है, जो एक दशक पहले करीब 50 फीसदी हुआ करती थी। पी-नोट्स जारी करने वाली प्रमुख कंपनियों में जे पी मॉर्गन, सिटी, मॉर्गन स्टैनली, डॉयचे बैंक और गोल्डमैन सैक्स शामिल है। पी-नोट्स के जरिए निवेश से इक्विटी पर सीधा स्वामित्व नहीं मिलता है, जो कुछ निवेशकों यह मार्ग चुनने से रोक सकता है।
 
वनवारी ने कहा, यह एक सीमा है और सामूहिक निवेश फंडों मसलन पेंशन फंडों या म्युचुअल फंडों में से ज्यादातर सीधे निवेश के हक में होंगे, बजाय इसके कि अन्य इकाई को रकम दी जाए। इसे जारी करने वालों को शुल्क के तौर पर निवेशकों को अतिरिक्त लागत उठानी होगी। मौजूदा नियम श्रेणी-3 के एफपीआई को यह मार्ग अपनाने की अनुमति नहींं देता। ध्रुव एडवाइजर्स के पार्टनर पुनीत शाह ने कहा, कुछ सीमाएं हैं, जो पी-नोट्स का मार्ग अपनाने के लिए ट्रस्टों को वांछित लचीलापन शायद मुहैया नहीं कराएगा। उदाहरण के लिए पी-नोट्स जारी करने वाली एफपीआई इकाई बिना हेजिंग के डेरिवेटिव में निवेश नहींं कर सकती। ऐसे में डेरिवेटिव में ज्यादा निवेश पर ध्यान देने वाले एफपीआई यह मार्ग नहीं अपनाएंगे।
 
इस तरह से ज्यादातर एफपीआई अपना नया निवेश मॉरीशस, सिंगापुर या फ्रांस जैसे देशों के कॉरपोरेट ढांचे के जरिए कर सकते हैं ताकि अतिरिक्त अधिभार से बचा जा सके। ऐसी व्यवस्था हालांकि देसी जनरल एंटी अवायडेंस रूल्स (गार) के दायरे में आ सकती है। इस साल पेश बजट में 2 से 5 करोड़ रुपये सालाना आय वाले सुपर-रिच पर अधिभार बढ़ाकर 25 फीसदी और 5 करोड़ रुपये सालाना से ज्यादा आय वालों के लिए अधिभार 37 फीसदी कर दिया गया है। 2 से 5 करोड़ रुपये आय वाले ट्रस्ट के तौर पर परिचालित एफपीआई पर लंबी अवधि के पूंजीगत लाभ कर की प्रभावी दर 11.96 फीसदी से 13 फीसदी पर पहुंच गई है जबकि 5 करोड़ रुपये से ज्यादा आय वालों के लिए यह दर 14.25 फीसदी हो गई है।
 
अल्पावधि वाले पूंजीगत लाभ कर की प्रभावी दर 17.94 फीसदी से 19.5 फीसदी हो गई है (2 से 5 करोड़ रुपये की आय पर) और 5 करोड़ रुपये से ज्यादा की आय पर यह दर 21.37 फीसदी हो गई है। असूचीबद्ध प्रतिभूतियों व डेरिवेटिव पर अल्पावधि वाले लाभ पर कर की प्रभावी दर अब 39 फीसदी (2 से 5 करोड़ रुपये की आय) और 5 करोड़ रुपये से ज्यादा आय पर 42.74 फीसदी हो गई है।  वैश्विक स्तर पर ज्यादातर म्युचुअल फंड व पेंशन फंड गैर-कॉरपोरेट इकाई यानी ट्रस्ट के तौर पर संगठित हैं क्योंकि वे छोटे निवेशकों के हितों का प्रतिनिधित्व करते हैं और लंबी अवधि के हिसाब से निवेश करते हैं। 
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