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हवाईअड्डा नियामक की भूमिका में बदलाव से उठे गंभीर सवाल

दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  July 23, 2019

मोदी सरकार आर्थिक क्षेत्रों के नियमन की राह में एक अस्वस्थ मिसाल पेश करती दिख रही है। अगर कोई क्षेत्र बहुत तेजी से बढ़ा है और उसमें कई निजी कंपनियां सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों के साथ भागीदारी में आ रही हैं तो उसके स्वतंत्र नियामक का कार्यक्षेत्र एवं शक्तियां इस सत्याभासी आधार पर सीमित की जा सकती हैं कि उस पर पड़ रहे बोझ को कम किया जा सके। पिछले हफ्ते संसद में पारित भारतीय हवाईअड्डा आर्थिक नियमन प्राधिकरण संशोधन अधिनियम में भी ऐसा ही कुछ होता हुआ नजर आया। इस संशोधन विधेयक के जरिये वर्ष 2008 में बने मूल कानून के दो खास प्रावधानों में बदलाव कर दिया गया है। पहला बदलाव बड़े हवाईअड्डों के निर्धारण से जुड़ी सीमा बढ़ाने से संबंधित है। यह कार्य हवाईअड्डा आर्थिक नियमन प्राधिकरण (एईआरए) के दायरे में आता रहा है। दूसरा बदलाव इस प्राधिकरण के दायरे से उन सभी हवाईअड्डों को बाहर कर देता है जिन्हें ऑपरेटरों ने शुल्क-आधारित निविदा या पूर्व-निर्धारित शुल्कों के आधार पर हासिल किया है।

 
भारत में कुल 102 हवाईअड्डे मौजूद हैं जिनमें से दिल्ली एवं मुंबई जैसे सात संयुक्त रूप से संचालित अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे हैं, 20 अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे हैं, आठ कस्टम हवाईअड्डे हैं और सात हवाईअड्डे राज्य सरकारों या निजी क्षेत्र के हैं। इनमें से केवल 33 हवाईअड्डे ही आर्थिक नियमन प्राधिकरण के दायरे में आते हैं जिनके यहां से साल भर में 15 लाख यात्री आवागमन करते हैं। लेकिन यह व्यवस्था एईआरए अधिनियम में पिछले हफ्ते हुए संशोधन तक ही लागू थी। संशोधित कानून में कहा गया है कि प्राधिकरण केवल उन्हीं हवाईअड्डों का नियमन करेगा जहां पर सालाना आवाजाही 35 लाख यात्रियों से अधिक है। वर्ष 2018-19 के विमानन आंकड़ों के आधार पर प्राधिकरण के दायरे में महज 16 हवाईअड्डे ही रह जाएंगे।
 
दरअसल सरकार ने संसद में यह दलील दी कि कानून में ये बदलाव किए जाने से हवाईअड्डों के नियमन में प्राधिकरण की भूमिका कम नहीं होगी। वर्ष 2008 में जब यह कानून बना था तो उस समय के हिसाब से 15 लाख यात्रियों की संचालन क्षमता को बड़ा हवाईअड्डा तय करने का मानक बनाया गया था। उस समय यह कुल हवाईअड्डा क्षमता का महज 1.3 फीसदी था। लेकिन उसके बाद से विमान यात्रा करने वाले लोगों की संख्या काफी तेजी से बढ़ी है और नए कानून में रखी गई 35 लाख यात्रियों की नई सीमा कुल आवाजाही के 1.3 फीसदी से बहुत अधिक है। इस तरह सरकारी दलील को मानें तो हवाईअड्डा नियामक के कार्यक्षेत्र में कोई कटौती नहीं की गई है।
 
हालांकि इस फैसले के पीछे का परेशान करने वाला पहलू तब नजर आता है जब कोई व्यक्ति संशोधन विधेयक से संलग्न 'प्रयोजन एवं कारण बयान' को पढ़े। इस बयान के मुताबिक, विमानन क्षेत्र की तीव्र वृद्धि ने एक तरफ प्राधिकरण पर जबरदस्त दबाव डाला है वहीं दूसरी तरफ सार्वजनिक-निजी भागीदारी के तहत कई निजी ऑपरेटर इस क्षेत्र में प्रवेश कर रहे हैं। इसके लिए लंबी पूर्णता अवधि को देखते हुए नियामकीय निश्चितता की जरूरत होती है। इस जटिलता को दूर करने के लिए यह महसूस किया गया है कि अगर बहुतेरे हवाईअड्डे इस प्राधिकरण की निगरानी में रहेंगे तो सीमित संसाधन होने के नाते प्राधिकरण के लिए प्रभावी ढंग से शुल्क निर्धारण कर पाना और बड़े हवाईअड्डों पर सेवा के स्तर पर नजर रखना मुश्किल हो जाएगा।
 
इसी तरह पूर्व-निर्धारित शुल्कों या शुल्क-आधारित निविदा के आधार पर ऑपरेटरों को सौंपे गए हवाईअड्डों का नियमन अब प्राधिकरण के हाथों नहीं होगा। निश्चित रूप से इन शुल्कों के स्तर को लेकर प्राधिकरण से अग्रिम सलाह ली जाएगी लेकिन अब बड़े हवाईअड्डों पर हरेक पांच साल पर शुल्क निर्धारित करने में नियामक की प्रभावी भूमिका नहीं रह जाएगी। सरकार ने तर्क दिया है कि 'ऐसे शुल्क-आधारित मॉडल में बाजार अपने-आप शुल्क दरें तय करता है और परियोजना आवंटित कर दिए जाने के बाद शुल्क तय करने में नियामक की कोई जरूरत नहीं है'। बाजार भले ही शुल्क के बारे में फैसला कर सकता है लेकिन उन शुल्क दरों पर निगरानी एवं समय-समय पर नियमन की भी जरूरत होती है। प्रस्तावित व्यवस्था में ऐसे किसी भी नियमन की स्थिति बनती नहीं दिख रही है।
 
एईआरए को दीवार पर लिखी इबारत पढऩी चाहिए क्योंकि आगे चलकर इसकी भूमिका में और कम हो जाएगी। संशोधन विधेयक के साथ संलग्न बयान इस आशंका को पूरी तरह साफ कर देता है। हवाईअड्डा विकास के लिए शुल्क-आधारित मॉडल की भूमिका का जिक्र करते हुए कहा गया है, 'यह मॉडल हवाईअड्डों पर लगने वाले शुल्क को कम करने के लिए लाया गया है लिहाजा भविष्य में हवाईअड्डों को इसी मॉडल पर विकसित किया जाएगा।' इस घटनाक्रम से कई गंभीर सवाल खड़े होते हैं। अगर 33 हवाईअड्डों के नियमन से ही एईआरए पर काम का बोझ था तो सरकार ने नियामक की ताकत बढ़ाने के लिए अधिक सरल विकल्प क्यों नहीं तलाशे? देश के 17 हवाईअड्डों (कालीकट, श्रीनगर, कोयंबत्तूर, अमृतसर, मंगलूरु, वाराणसी, पोर्ट ब्लेयर, तिरुचिरापल्ली, नागपुर, कन्नूर, विशाखापत्तनम, बागडोगरा, चंडीगढ़, मदुरै, इंदौर, रांची और रायपुर) का नियमन एईआरए के दायरे से बाहर रखकर क्या सरकार ने खुद अपनी भूमिका का विस्तार किया है? आखिर, अब इन 17 हवाईअड्डों की निगरानी का जिम्मा संभालने वाले भारतीय हवाईअड्डा प्राधिकरण (एएआई) का नियंत्रण सरकार के ही पास होता है। क्या एएआई के पास इस अतिरिक्त जिम्मेदारी का बोझ उठाने की क्षमता है? या फिर इस कानून में बदलाव निजी क्षेत्र के हवाईअड्डा संचालकों को ध्यान में रखते हुए किए गए हैं? अंत में, क्या विमानन क्षेत्र में नियमन को लेकर अपनाया गया यह सिद्धांत अन्य क्षेत्रों में भी लागू किया जाएगा? 
Keyword: aviation, flight, airport, AAI,,
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