बिजनेस स्टैंडर्ड - किसानों को नहीं भा रही अरंडी
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किसानों को नहीं भा रही अरंडी

सुशील मिश्र / मुंबई July 22, 2019

दामों में अनिश्चितता और पानी की कमी के कारण अरंडी की बुआई बेहद सुस्त है। कृषि मंत्रालय के ताजा आंकड़ों में अरंडी की बुआई में रिकॉर्ड गिरावट देखने को मिल रही है। अरंडी के भावों में निरंतर अनिश्चितता के कारण गुजरात और राजस्थान के किसान इस बार अरंडी की जगह दूसरी फसलों को प्राथमिकता दे रहे हैं। जल बचत को लेकर कृषि विशेषज्ञ फसलों में बदलाव की सलाह दे रहे हैं। इसे भी अरंडी की सुस्त बुआई की वजह माना जा रहा है। कृषि सहकारिता एवं किसान कल्याण विभाग द्वारा जारी किए गए खरीफ फसलों की बुआई के ताजा आंकड़ों के मुताबिक चालू सीजन में 18 जुलाई तक देश भर में 0.481 लाख हेक्टेयर में अरंडी की बुआई हुई है जो अब तक का सबसे कम बुआई क्षेत्र है। हालांकि अरंडी का सबसे ज्यादा उत्पादन करने वाले राज्य गुजरात में इस साल अरंडी की बुआई पिछले साल के 0.055 लाख हेक्टेयर से अधिक 0.184 लाख हेक्टेयर हुई है। खरीफ सीजन में अरंडी का कुल औसत रकबा 9.656 लाख हेक्टेयर है। सरकारी अनुमान के मुताबिक अब तक देश में 0.842 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में अरंडी की बुआई होनी चाहिए थी।
 
अरंडी कारोबार से जुड़ी बीवी पटेल कंपनी के निदेशक बबनदास काका कहते हैं कि गुजरात में इस साल बुआई फिलहाल कम दिख रही है क्योंकि बारिश देर से शुरू हुई है। किसान उन फसलों को प्राथमिकता दे रहे हैं जिनसे उनके पशुओं के लिए चारा भी मिल जाए। हालांकि वह विश्वास केसाथ कह रहे हैं कि इस बार गुजरात में अरंडी की बुआई पिछले तीन साल के औसत से ज्यादा होगी। गुजरात में अरंडी का तीन साल का औसत रकबा 5.90 लाख है, जबकि इस साल यह 6.20 लाख हेक्टेयर तक पहुंच सकता है। वह कहते हैं कि अरंडी की 20 फीसदी बुआई जुलाई में, 70 फीसदी अगस्त में और करीब 10 फीसदी सितंबर में होती है। गुजरात के अलावा देश के दूसरे हिस्सों में अरंडी की बुआई सुस्त है। इसकी वजह किसानों का अरंडी से मोहभंग होना माना जा रहा है। 
 
वायदा कारोबारी अरंडी की बुआई कम होने की वजह कीमतों में व्यापाक घट-बढ़ को मानते हैं। दरअसल अरंडी की कीमतें बुआई के दौरान ऊंची रहती है, लेकिन कटाई शुरू होते ही अरंडी की कीमतों में गिरावट आने लगती है। इस बार भी अरंडी की कीमतों में काफी उतार-चढ़ाव देखा गया है। इसलिए किसान अरंडी की जगह नकदी फसलों जैसे मूंग, अरहर, कपास, मूंगफली आदि की बुआई का फैसला ले सकते हैं क्योंकि इन फसलों का भाव फिलहाल काफी आकर्षक है और इन्हें सरकार का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) भी प्राप्त है, जबकि अरंडी को एमएसपी प्राप्त नहीं है।
 
मौजूदा सीजन में अरंडी का भाव 6,300 रुपये प्रति क्विंटल तक चला गया था, जबकि वर्तमान दर 5,500 रुपये प्रति क्विंटल है। इसमें 4-5 साल से लगातार गिरावट थी। इस साल इसकी कीमतें अच्छी हैं। इस वर्ष अरंडी का उत्पादन 10 लाख टन से भी कम है, जबकि वार्षिक आधार पर इसमें 30-40 प्रतिशत गिरावट आ रही है। अरंडी की कीमतों में निरंतर गिरावट का असर उसके उत्पादन पर भी पड़ा है। पानी की कमी को देखते हुए कृषि विशेषज्ञ किसानों को कम अवधि वाली फसलों की बुआई करने की सलाह दे रहे हैं। कृषि विशेषज्ञों द्वारा किसानों को दी गई सलाह के मुताबिक व्यावसायिक फसलों के बजाय जीरा, दाल और मूंगफली जैसी खाद्य फसलें उगाई जानी चाहिए क्योंकि इन फसलों में कपास और अरंडी की तुलना में पानी कम लगता है। किसान को अपनी आधी जमीन ही व्यावसायिक फसल के लिए उपयोग करनी चाहिए। बाकी जमीन में वे दलहन, मूंगफली, सरसों या जीरा उगा सकते हैं। इससे अल्पकालिक राजस्व लाभ के साथ-साथ दीर्घकालिक आय भी होगी।
 
भारत में अरंडी का लगभग तीन लाख टन पिछला बचा हुआ स्टॉक है। हर साल यह तकरीबन पांच लाख टन से अधिक रहता है। कुल मिलाकर इस वर्ष 20 लाख टन की सामान्य आपूर्ति के मुकाबले केवल 13-14 लाख टन आपूर्ति रही है। इस वर्ष अरंडी में तीव्र कमी आई है। भारत घरेलू उत्पादन का 90 प्रतिशत से अधिक अरंडी तेल निर्यात मुख्य रूप से चीन, यूरोप और अमेरिका को करता है। विश्व के कुल अरंडी उत्पादन का 95 प्रतिशत उत्पादन भारत करता है।
Keyword: castor oil, agri, farmer, pulses,,
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