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लंबी अवधि के फंडों में अधिक अनिश्चितता के प्रति निवेशकों को रहना चाहिए सतर्क

संजय कुमार सिंह /  July 22, 2019

पिछले एक साल के दौरान दीर्घ अवधि के फंडों (लॉन्ग ड्यूरेशन) ने 16.75 प्रतिशत से अधिक प्रतिफल दिया है। म्युचुअल फंड पर नजर रखने वाली कंपनी वैल्यू रिसर्च के आंकड़े कुछ ऐसा ही कह रहे हैं। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि चूंकि, इन फंडों में काफी हद तक तेजी दिख चुकी है, इसलिए निवेशकों को इस श्रेणी को लेकर थोड़ा सतर्क रहने की जरूरत है। भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) की परिभाषा के अनुसार लंबी अवधि के फंडों की अवधि सात साल से अधिक होती है। ये फंड ब्याज दरों में बदलाव के प्रति खासे संवेदनशील होते हैं। पिछले एक साल के दौरान 10 साल की अवधि के सरकारी बॉन्ड पर प्राप्ति 7.89 प्रतिशत से कम होकर 6.57 प्रतिशत रह गई है, यानी इसमें कुल 132 आधार अंक की कमी आई है। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) 2019 में रीपो रेट में अब तक 75 आधार अंक की कमी कर चुका है। इस तरह, 2010 के बाद रीपो रेट अब तक के सबसे निचले स्तर 5.75 प्रतिशत पर आ गई है। 

 
क्वांटम म्युचुअल फंड के फंड मैनेजर (फिक्स्ड इनकम) पंकज पाठक कहते हैं, 'ब्याज दरें जब कम होती हैं तो लंबी अवधि के फंडों को खासे फायदे में रहते हैं। यही वजह है कि ये फंड फिलहाल इतना अधिक प्रतिफल दे रहे हैं।' मध्यम से लंबी अवधि के फंड और डायनेमिक बॉन्ड फंड ने क्रमश: 1 साल में 9.67 प्रतिशत और 9.50 प्रतिशत दिए हैं। इन्हें ब्याज दरों में कमी से लाभ मिला है। हालांकि यह अपेक्षाकृत थोड़ा कम रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि ब्याज दरों में अब भी 25 से 50 आधार अंक कमी की गुंजाइश है और यह बात पूरी तरह इस पर निर्भर करता है कि आरबीआई विकास दर को लेकर क्या दृष्टिकोण अपनाता है। टाटा कैपिटल फाइनैंशियल सर्विसेस में प्रमुख (वेल्थ मैनेजमेंट) सौरभ बसु कहते हैं, 'जिन कारकों से ब्याज दरों में कटौती की राह आसान हो सकती है उनमें अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व का नरम रुख, देश में नियंत्रित महंंगाई, आरबीआई द्वारा खुला बाजार परिचालन जारी रखना और कच्चे तेल की कीमतों में कमी (80 डॉलर प्रति बैरल से कम होकर 64.5 डॉलर प्रति बैरल)  आदि शामिल हैं।' इन हालात से लॉन्ग ड्यूरेशन फंडों को लाभ मिल सकता है।
 
हालांकि इन तमाम बातों के बावजूद निवेशकों को फिलहाल इन फंडों पर दांव लगाने को लेकर सतर्क रहना चाहिए। पाठक कहते हैं,'इन फंडों में आई तेजी अब पीछे छूट गई है और अब बाजार दरों में एक या दो और कमी की उम्मीदें लगाए कारोबार कर रहा है।' महंगाई में कमी के कारण इन दिनों ब्याज दरें नीचे आई हैं। पाठक कहते हैं,'खाद्य महंगाई का अधिक समय तक कम रहना संभव नहीं दिख रहा है। खाद्य वस्तुओं की कीमतें निचले स्तर पर रहने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था चरमरा रही है। खाद्य महंगाई में अचानक तेजी से आने से लॉन्ग ड्यूरेशन फंडों के प्रदर्शन पर प्रतिकूल असर हो सकता है।'
 
बजट में सरकार ने राजकोषीय घाटा 3.3 प्रतिशत तक समेटने का लक्ष्य रखा है, लेकिन यह आंकड़ा ठोस बुनियाद पर नहीं, बल्कि उम्मीदों पर अधिक आधारित है। बजट में कर राजस्व में 18 प्रतिशत बढ़ोतरी की उम्मीद लगाकर राजकोषीय घाटा 3.3 प्रतिशत तक रखने की बात कही गई है, लेकिन धीमी पड़ती अर्थव्यवस्था के मद्देनजर ऐसा होता नहीं दिख रहा है। विकास की धीमी पड़ती आंच के बीच सरकार के लिए व्यय में कटौती करना संभव नहीं दिख रहा है। लिहाजा इसे बाजार से उधार लेना पड़ सकता है। इससे ब्याज दरें बढ़ाने का दबाव बढ़ता जाएगा। जो निवेशक लंबी अवधि के फंडों पर दांव लगाना चाहते हैं, उन्हें लॉन्ग ड्यूरेशन के बजाय डायनेमिक बॉन्ड फंड के जरिये निवेश करना चाहिए। डायनेमिक बॉन्ड फंड में फंड प्रबंधकों ब्याज दरें बढऩे की हालत में फंड की औसत अवधि कम कर देते हैं। लंबी अवधि के फंडों के साथ ऐसी बात नहीं होती है, इसलिए उन पर तगड़ा असर होता है। 
 
वित्तीय जानकार अर्णव पंड्या कहते हैं, 'जो लंबी अवधि का लक्ष्य लेकर चल रहे हैं और पोर्टफोलियो में डेट साधनों में निवेश करना चाहते हैं, वे लंबी अवधि के डेट फंड में निवेश कर सकते हैं। हालांकि उनका लक्ष्य कम से कम तीन से पांच साल का होना चाहिए।' पोर्टफोलियो का एक बड़े का निवेश तीन साल से कम अवधि के साथ छोटी अवधि के डेट फंडों में होना चाहिए। चूंकि, साख की हालत फिलहाल ठीक नहीं है, इसलिए निवेशकों को इस श्रेणी में कम गुणवत्ता वाले बॉन्ड रखने से परहेज करना चाहिए।
Keyword: long duration fund, mutual fund, SEBI,,
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