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आईपीएबी से तकनीकी सदस्य नदारद

अदालत से
एम जे एंटनी /  July 22, 2019

बौद्घिक संपदा अपील बोर्ड (आईपीएबी) की स्थापना 2003 में हुई थी लेकिन पिछले कुछ समय से यह काम नहीं कर रहा है। यह बोर्ड पेटेंट कानून, ट्रेड मार्क कानून, कॉपीराइट कानून और पौधा किस्म संरक्षण कानून से संबंधित मामलों को देखता है। इनमें से हर मामले में बोर्ड में एक न्यायिक सदस्य के अलावा एक तकनीकी सदस्य की भी जरूरत होती है। लेकिन सरकार की तकनीकी सदस्यों की नियुक्ति में कोई दिलचस्पी नहीं है। दिल्ली उच्च न्यायालय में इस महीने दाखिल यथास्थिति रिपोर्ट के मुताबिक आज तक तकनीकी सदस्य (कॉपीराइट) की नियुक्ति नहीं की गई है। पेटेंट के मामले में यह पद मई 2016 से खाली है। इसी तरह ट्रेड मार्क के मामले में तकनीकी सदस्य का पद दिसंबर 2018 से रिक्त है। बोर्ड को 2009 से भौगोलिक संकेतक (जीआई) के मामले में अपीलें मिल रही हैं लेकिन आज तक केवल 12 अपीलों का ही निपटारा किया गया है।  माइलन लैबोरेटरीज लिमिटेड बनाम भारत संघ वाद में एक पेटेंट अपील में उच्च न्यायालय के फैसले में ये तथ्य सामने आए हैं। यथास्थिति रिपोर्ट पर अदालत ने कहा, 'रिक्तियों को भरने में सरकार की निष्क्रियता साफ झलक रही है। इस कारण बड़ी संख्या में वादी तुरंत सुनवाई के लिए उच्च न्यायालय में आ रहे हैं। कई मामलों में तो अपील को संख्या भी नहीं दी जा रही है। यह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गारंटी के रूप में न्याय तक पहुंच के अधिकार का उल्लंघन है।' न्यायालय ने कहा कि पंचाटों में यह बार-बार ऐसी समस्या आ रही है। इसकी वजह से बोर्ड के समक्ष करीब 4,000 मामले लंबित हैं। पेटेंट के मामलों में कुछ विवादित पेटेंटों की अवधि देरी के कारण समाप्त हो गई है। न्यायालय ने रिक्त पदों को भरे जाने तक आईपीएबी और तकनीकी सदस्य (पौधा किस्म संरक्षण) को पेटेंट, ट्रेड मार्क और कॉपीराइट से जुड़े तत्काल मुद्दों पर सुनवाई करने की अनुमति दे दी। उनके आदेश कोरम की कमी के आधार पर अमान्य नहीं होंगे।

 
सरकार को नहीं मिल सकती खास तवज्जो
 
उच्चतम न्यायालय ने जोर देकर कहा है कि मध्यस्थता एवं सुलह कानून के मुताबिक सरकार को एक पक्ष के रूप में कोई खास तवज्जो नहीं दी जा सकती है। न्यायालय ने पाम डेवलपमेंट्स लिमिटेड बनाम पश्चिम बंगाल राज्य वाद में अपने फैसले में कहा कि मध्यस्थता कानून के तहत पैसों के भुगतान के आदेश पर रोक लगाने के आवेदन पर विचार करते समय कोई भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए और न ही सरकार को कोई खास तवज्जो दी जानी चाहिए। सरकार ने कुछ राजमार्ग परियोजनाएं कंपनी को दी थीं। इसमें विवाद हो गया और इन्हें मध्यस्थता के लिए भेज दिया गया। मध्यस्थ पंचाट ने राज्य सरकार को कुछ राशि कंपनी को देने को कहा। राज्य सरकार ने सिविल प्रक्रिया संहिता सीपीसी का सहारा लेते हुए मध्यस्थता पंचाट के फैसले पर रोक लगाने के लिए कलकत्ता उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। उच्च न्यायालय ने बिना शर्त रोक लगा दी। उच्चतम न्यायालय ने इसे खारिज करते हुए कहा कि मध्यस्थता कानून में सभी पक्षों को एक समान माना गया है और सरकार को खास तवज्जो देने के लिए अंग्रेजों के जमाने में सीपीसी में किए गए प्रावधान को आज के दौर में लागू नहीं किया जाएगा जब देश में लोकतांत्रिक सरकार है। 
 
स्पिरिट पर कर लगाने का फैसला सही 
 
झारखंड सरकार को परिशोधित स्पिरिट के आयात पर कर या फीस लगाने का वैधानिक अधिकार है क्योंकि यह पीने योग्य शराब नहीं है। उच्चतम न्यायालय ने झारखंड राज्य बनाम अजंता बॉटलर्स ऐंड ब्लेंडर्स वाद में अपने फैसले में यह बात कही। न्यायालय ने इस मामले में उच्च न्यायालय के फैसले को खारिज कर दिया जिसने राज्य की एक अधिसूचना के खिलाफ शराब निर्माताओं की चुनौती को सही ठहराया था। उच्च न्यायालय की राय थी कि राज्य सरकार परिशोधित स्पिरिट पर कर लगाने के फैसले को न्यायोचित ठहराने में नाकाम रही। उच्चतम न्यायालय ने भी इसे पलट दिया। 
 
गलत गणना के कारण फैसला खारिज
 
दिल्ली उच्च न्यायालय ने शील ट्रेड वेंचर लिमिटेड और सैमसंग इंडिया इलेक्ट्रॉनिक्स के बीच विवाद में मध्यस्थता पंचाट के फैसले को पिछले सप्ताह खारिज कर दिया। न्यायालय ने कहा कि मध्यस्थ ने शील द्वारा सैमसंग को दी जाने वाली रकम की गणना करते समय उसके सामने रखी गई प्रासंगिक और अहम सामग्री की घोर अनेदखी की। उच्च न्यायालय ने कहा कि दोनों पक्ष फिर से मध्यस्थता में जाने के लिए स्वतंत्र हैं। इलेक्ट्रॉनिक और घरेलू सामान बनाने वाली कंपनी सैमसंग ने पूर्वी उत्तर प्रदेश में शील को अपना वितरक नियुक्त किया था। एक साल बाद दोनों के बीच विवाद पैदा हो गया और दोनों मध्यस्थता पंचाट में पहुंचे। पंचाट के फैसले के मुताबिक शील को 94,38,327.13 रुपये का भुगतान वर्ष 2010 से 7 फीसदी सालाना ब्याज के साथ करना था और साथ ही लागत के रूप में 7.5 लाख रुपये भी चुकाने थे।
 
नेस्ले को ए+ दही बेचने की अनुमति
 
नेस्ले और खेड़ा जिला सहकारी दुग्ध उत्पादक संघ के बीच ट्रेड मार्क विवाद मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय ने नेस्ले के फायदे के लिए अपने पुराने आदेश को बदल दिया। यह मामला दोनों पक्षों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले ट्रेड मार्क ए+ से जुड़ा है। इसमें केवल इतना अंतर है कि खेड़ा संघ अपने ब्रांड अमूल के उत्पाद अंग्रेजी के कैपिटल ए ट्रेड मार्क के साथ बेचना चाहती है जबकि नेस्ले अंग्रेजी के स्मॉल ए ट्रेडमार्क के साथ दूध और दही (योगर्ट) बेचती है। अमूल ने अपने चीज स्लाइस को ए+ नाम से बेचने के लिए आवेदन किया था। नेस्ले का कहना है कि उसने 2011 में ए+ ट्रेड मार्क के साथ अपने दुग्ध उत्पाद उतारे थे। जल्दी ही उसे नेस्ले से नोटिस मिला कि ए+ ब्रांड पर उसका अधिकार है। इस दावे के कारण नेस्ले ने उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की और स्थायी रोक की मांग की। एकल पीठ ने दोनों पक्षों को ए+ के इस्तेमाल के बारे में यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया। एक नए आवेदन में नेस्ले ने दलील दी कि उसने न केवल ए+ ट्रेड मार्क का पंजीकरण कराया है बल्कि वह पहले से ही इसका इस्तेमाल कर रही है। उच्च न्यायालय ने अपने आदेश को बदल दिया और नेस्ले को अपने ट्रेड मार्क का इस्तेमाल करने की अनुमति दे दी जबकि अमूल के खिलाफ यथास्थिति का आदेश जारी रहेगा। न्यायालय ने कहा कि पिछले न्यायाधीश ने यथास्थिति का आदेश देते समय सुविधा संतुलन और अपूरणीय क्षति के परीक्षणों को गलत तरीके से लागू किया था।
 
झींगा किसानों को मुआवजा
 
केरल में झींगा पालन में लगे किसानों के एक समूह ने झींगे का बीज बेचने वाले विक्रेताओं से मुआवजे का मामला जीता है। गलत बीजों के कारण इन किसानों को अपने निवेश पर नुकसान उठाना पड़ा था। इन बीजों की आपूर्ति सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त निजी हैचरियों से होनी थी। इन गरीब किसानों ने बीज खरीदा और उन्हें ऊंची लागत से खासतौर पर तैयार किए गए तालाबों में डाल दिया। लेकिन उन्होंने पाया कि ये बीज उनके तालाबों के अनुकूल नहीं थे। बड़ी मात्रा में बीज बर्बाद हो गए। हैचरी की दलील थी कि इस बात का कोई सबूत नहीं है कि किसानों ने अपने तालाबों का उचित रखरखाव किया था। इन दलीलों को खारिज करते हए कन्नूर जिले के उपभोक्ता फोरम ने अनुचित व्यवहार और सेवा में कमी के लिए किसानों को मुआवजा देने का आदेश दिया। सी व्यू प्रॉन हैचरीज लिमिटेड बनाम के कार्तयानी वाद में राज्य आयोग और राष्ट्रीय आयोग ने अपने फैसलों में अपील को खारिज कर दिया। 
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