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राजनीति संग आर्थिक जरूरत से उपजा था बैंक राष्ट्रीयकरण

सम सामयिक
टीसीए श्रीनिवास-राघवन /  July 22, 2019

आजादी के बाद बैंकिंग समस्या हमेशा राजनीतिक रही है। बैंकिंग समस्या को एक आर्थिक या वाणिज्यिक समस्या के रूप में देखना गलत है। अगर भारत का आर्थिक इतिहास पढ़ें तो पता चलेगा कि 1950 के दशक में तकनीक और बेहतर तरीकों के बजाय ग्रामीण जमा और सिंचाई को अधिक अहम माना जाता था। सोच यह थी कि सिंचाई सुविधा मुहैया कराने का जिम्मा तो केंद्र एवं राज्य सरकारें ले सकती हैं लेकिन किसानों को ऋण दिलाने की समस्या दु:साध्य है। देश भर में आम सहमति थी कि वाणिज्यिक बैंक ऐसा नहीं ही करेंगे।

 
एक दशक तक सहकारी बैंक बनाए जाते रहे और सरकार उन्हें प्रोत्साहन देती रही। लेकिन जल्द ही उन बैंकों पर स्थानीय नेताओं एवं भूस्वामियों का नियंत्रण हो गया। नतीजतन 1950 का दशक खत्म होने तक साफ हो गया कि सहकारी बैंक नाकाम हो चुके हैं। विशेषज्ञता की कमी को भी इसके लिए जिम्मेदार ठहराया गया। वैसे सार्वजनिक बैंकों में विशेषज्ञता का अभाïव आज भी बड़ी समस्या है। साठ के दशक के मध्य तक भारतीय रिजर्व बैंक का भी इससे मोहभंग हो चुका था। कांग्रेस के वामपंथी नेताओं की तरह वह भी सोचने लगा था कि ग्रामीण सहकारी बैंकों का नया नेटवर्क खड़ा करने के बजाय वाणिज्यिक बैंकों को ही ग्रामीण इलाकों में जाने के लिए बाध्य करना बेहतर होगा। ऐसे हालात में बैंकों पर सामाजिक नियंत्रण बनाम पूर्ण राष्ट्रीयकरण की पुरानी बहस फिर से सामने आ गई। 1965 और 1966 में देश में आए दो भयंकर सूखों के चलते यह गंभीर विमर्श का मुद्दा बन गया।
 
असली बात यही थी कि बैंकों पर नियंत्रण कौन रखेगा? मुनाफा कमाने के इरादे से बैंकिंग कारोबार में उतरे निजी लोग जो कुछ हद तक समाज के प्रति दायित्व बोध भी रखते हैं या सामाजिक न्याय के लिए प्रयासरत सरकार जो कुछ हद तक लाभ कमाने की मंशा भी रखती है? उस समय किसी को भी साफ-साफ यह मालूम नहीं था कि इनमें से कोई भी विकल्प व्यवहार में कितना कारगर होगा। कर्ज की भारी मांग थी। करीब 15 फीसदी की बचत दर नाकाफी थी। शेयरधारकों के प्रति देनदारियां होने से बैंक भी इस पर अधिक ध्यान नहीं देते थे। अपनी बड़ी भूमिका को लेकर सजग सरकार हताश होने लगी थी। हालांकि यही पता नहीं था कि करना क्या है?
 
यह जताना व्यर्थ है कि निजी बैंकों की कोई गलती नहीं थी। औद्योगीकरण में मदद और बैंकिंग सेवाओं के प्रसार दोनों ही मामलों में निजी बैंक उम्मीदों पर खरा नहीं उतर पाए थे। आरबीआई और सरकार को अहसास हो चुका था कि निजी बैंक शहरी इलाकों के अलावा अन्य जगहों पर बैंकिंग सेवाएं देने में रुचि नहीं ले रहे हैं। मसलन, 1961 में भारत की कुल 51,00 बैंक शाखाओं में करीब 99 फीसदी शाखाएं शहरी इलाकों में ही मौजूद थीं। आरबीआई के दबाव में 1964 के अंत तक करीब 700 अन्य शाखाएं भी खोली गईं लेकिन उनमें से शायद ही कोई शाखा ग्रामीण इलाके में थी। आरबीआई ने 1965 में बैंक शाखाओं को लाइसेंस देने की अपनी नीति में ढील देने के साथ ही यह शर्त रखी कि नई शाखाओं में बड़ा अनुपात ग्रामीण क्षेत्रों का होना चाहिए। नई नीति आने के बाद 450 नई शाखाएं खोली गईं लेकिन ग्रामीण इलाके अब भी बैंकिंग सुविधा से लगभग वंचित थे।
 
इससे व्यथित होकर एल के झा ने 1967 में बैंकरों की एक बैठक में कहा था कि वह शहरी इलाकों में बैंकों का प्रसार कम करने के पक्ष में हैं। बैंकरों ने उनसे पूछा कि क्या वह इसी तरह की पाबंदी विदेशी बैंकों पर भी लगाएंगे? झा ने इसके जवाब में कहा कि विदेशी बैंक अपना मुनाफा बचाने के लिए शहरों तक सिमटे रहने के लिए मजबूर हैं। विदेशी बैंकों की वजह से एक खास समस्या पैदा हुई थी। उन्हें 1962 के बाद तीन मुख्य बंदरगाह शहरों तक सीमित कर दिया गया था। इसके अलावा वे खुद भी कहीं और जाना नहीं चाहते थे। लेकिन भारतीय बैंक शिकायत कर रहे थे कि उनके साथ भेदभाव हो रहा है और विदेशी बैंकों पर या तो पाबंदी लगाई जाए या उन्हें भी शहरों एवं कस्बों से बाहर निकलने के लिए मजबूर किया जाए। वहीं विदेशी बैंकों का कहना था कि भेदभाव के शिकार वे हैं और उन्हें ही महानगरों के बाहर शाखाएं खोलने की मंजूरी नहीं दी जा रही है। उस बहस का समापन एल के झा ने यह कहते हुए किया था कि न केवल विदेशी बैंकों के आने से विदेशी मुद्रा विनिमय में मदद मिली बल्कि उन्हें केवल 43 शाखाएं खोलने की ही मंजूरी दी गई है।
 
साठ के दशक में देश में आपदाओं का सिलसिला खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा था। ऐसी स्थिति में जनता, राजनीतिक एवं बौद्धिक जगत की राय राष्ट्रीयकरण के पक्ष में होने लगी। यह सोच बड़ी तेजी से मजबूत होने लगी। खास बात यह है कि इस सोच का जन्म वामपंथी विचारधारा के चलते नहीं हुआ था। उस समय यही माना गया था कि यह कदम देश में विचलन की भावना को खत्म करेगा। लोग एक निर्णायक नेता का इंतजार कुछ उसी तरह कर रहे थे जैसा 2014 के आम चुनाव में नरेंद्र मोदी के लिए भाव था। लोग चाहते थे कि देश की बागडोर संभालने वाला नेता सही मायनों में अगुआई करे। प्रधानमंत्री के तौर पर इंदिरा गांधी के शुरुआती साढ़े तीन साल हिचकिचाहट भरे थे लेकिन जुलाई 1969 में 14 बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर वह अचानक ही राजनीतिक क्षितिज पर छा गईं। एक झटके में ही देश का ऑपरेटिंग सिस्टम बदल गया था। ऐसा केवल राजनीति में ही नहीं हुआ जहां अब पार्टी के बजाय व्यक्ति अहम हो गया बल्कि अर्थव्यवस्था भी निजी हाथों से निकलकर राज्य के पास आ गई।
 
(मेरी पुस्तक 'डॉयलॉग ऑफ द डीफ: आरबीआई ऐंड द गवर्नमेंट' के अंश) 
Keyword: bank, loan, debt, RBI, NPA,,
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