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अप्रत्याशित लाभ नहीं

संपादकीय /  July 22, 2019

ऐसा प्रतीत हो रहा है कि शायद सरकार को भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) से वैसा वित्तीय समर्थन न मिल पाए जैसी कि उसे अपेक्षा थी। कम से कम केंद्रीय बैंक के आर्थिक पूंजी ढांचे की समीक्षा के लिए गठित विशेषज्ञ समिति के सदस्यों की शुरुआती टिप्पणियों से तो ऐसा ही लग रहा है। बार-बार टलने के बाद आखिरकार समिति की बैठक गत सप्ताह आयोजित हुई। समिति को 8 जनवरी को आयोजित पहली बैठक के 90 दिन के भीतर आरबीआई को रिपोर्ट प्रस्तुत कर देनी थी लेकिन उसे तीन महीने का अवधि विस्तार दिया गया। आरबीआई के पूर्व गवर्नर विमल जालान की अध्यक्षता वाली समिति के बारे में कहा जा रहा है कि उसने अधिशेष पूंजी का सांकेतिक हस्तांतरण चरणबद्ध तरीके से करने का सुझाव दिया है। समिति अपनी अनुशंसाएं अगले कुछ दिन में वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग की असहमति की टिप्पणी के साथ प्रस्तुत करेगी। संभवत: यह असहमति हस्तांतरण की मात्रा और उसके लिए तय समय के कारण है। 

 
चरणबद्ध तरीके से अधिशेष हस्तांतरण का स्वागत किया जाना चाहिए। हालांकि रिपोर्ट की विषयवस्तु सार्वजनिक नहीं है लेकिन केंद्रीय बैंक से होने वाला हस्तांतरण देश की राजकोषीय स्थिति में कोई महत्त्वपूर्ण बदलाव ला पाएगा, ऐसा लगता नहीं। वर्ष 2016 की आर्थिक समीक्षा में यह सुझाव दिया गया था कि केंद्रीय बैंक की अधिशेष पूंजी का इस्तेमाल सरकारी बैंकों के पुनर्पूंजीकरण में किया जा सकता है। यह मुद्दा गत वर्ष सरकार और आरबीआई के बीच विवाद का विषय बन गया था। इसके बाद ही दिसंबर 2018 में जालान समिति का गठन किया गया। स्वाभाविक बात है कि सरकार उच्च हस्तांतरण चाहेगी क्योंकि इससे उसे राजकोषीय दबाव कम करने में मदद मिलेगी और अल्पावधि में व्यय का दबाव कम होगा। सरकार चालू वर्ष में केंद्रीय बैंक से 90,000 करोड़ रुपये के लाभांश की अपेक्षा कर रही है। समूचे ढांचे पर समिति की टिप्पणी को देखना दिलचस्प होगा। वहीं आरबीआई के पूर्व डिप्टी गवर्नर और समिति के उपाध्यक्ष राकेश मोहन ने केंद्रीय बैंक की बैलेंस शीट को लेकर कई अहम मुद्दे इस समाचार पत्र में प्रकाशित एक आलेख में उठाए थे। उक्त आलेख अक्टूबर 2018 में प्रकाशित हुआ था। 
 
पहली बात, विशुद्ध रूप से देखा जाए तो पूंजी हस्तांतरण से कोई नया राजस्व नहीं तैयार होता। यह आरबीआई की बैलेंस शीट के आकार को कम करेगा। परिणामस्वरूप केंद्रीय बैंक के पास कम प्रतिभूतियां और कम ब्याज रह जाएगा। इसका असर भविष्य की आय पर पड़ेगा। मोहन ने आगे कहा, 'लंबी अवधि के राजकोषीय परिणाम वही होंगे जो तब होते जबकि सरकार ने उसी व्यय की पूर्ति के लिए नई प्रतिभूतियां जारी की होतीं।' दूसरी बात, इस तरह के हस्तांतरण से राजकोषीय प्रबंधन पर से भरोसा उठ सकता है। तीसरा, यह अहम है कि केंद्रीय बैंक के पास इतनी पूंजी है कि वह मौद्रिक नीति का क्रियान्वयन कर सके और विदेशी मुद्रा के लेनदेन का समायोजन कर सके। चूंकि केंद्रीय बैंक से होने वाला हस्तांतरण अधिक अल्पकालिक राहत दे सकता है। ऐसे में इसका समुचित इस्तेमाल अर्थव्यवस्था की उत्पादक क्षमता में सुधार के लिए करना चाहिए। पूंजी का चरणबद्ध हस्तांतरण सरकार को फंड के किफायती इस्तेमाल का अवसर देगा। अगर सरकार इस पूंजी का रोजमर्रा के व्यय या राजकोषीय व्यय के लिए इस्तेमाल करती है तो यह सही नहीं होगा क्योंकि यह भविष्य की आय को प्रभावित करेगा। व्यापक स्तर पर देखें केंद्रीय बैंक से उच्च हस्तांतरण की मांग और इससे निपटने के लिए समिति का गठन स्वयं राजकोषीय तनाव को जाहिर करते हैं। बेहतर नतीजों के लिए सरकार को राजस्व बढ़ाना होगा और व्यय को तार्किक बनाना होगा। केंद्रीय बैंक या अन्य नियामकों के हस्तांतरण, आयात पर उच्च शुल्क या आयकरदाताओं के छोटे से समूह के लिए दर बढ़ाना फायदा कम और नुकसान ज्यादा करेगा।
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