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मीडिया के स्वामित्व ढांचे में सुधार से ही आएगी स्वतंत्रता

मीडिया मंत्र
वनिता कोहली-खांडेकर /  07 19, 2019

भय एकदम साफ झलक रहा था। घाना के एक पत्रकार ने अपना चेहरा छिपाते हुए अपनी बात रखी। कई दूसरे पत्रकारों ने भी अपनी चिंता, डर और कुंठा को उजागर किया। लंदन में पिछले हफ्ते आयोजित वैश्विक मीडिया स्वतंत्रता सम्मेलन में कुछ ऐसी ही तस्वीर दिखी। ब्रिटेन और कनाडा की सरकारों के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस सम्मेलन में पत्रकारों के अलावा वकील, नेता, मंत्री और राजनयिक भी ऐसी बातें कर रहे थे। सबका यही कहना था कि यह दुनिया अब पत्रकारों के लिए अधिक प्रतिकूल हो चुकी है।

 
पत्रकारों की अंतरराष्ट्रीय संस्था 'रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स' ने वर्ष 2018 को पत्रकारों के लिए सबसे खतरनाक साल करार दिया है। ब्रिटिश सरकार की एक वेबसाइट के मुताबिक यूनेस्को ने भी पिछले साल 99 पत्रकारों की हत्या, 348 को जेल में डालने और 60 अन्य को बंधक बनाए जाने की पुष्टि की है। इन घटनाओं के पीछे तानाशाही प्रवृत्ति वाली सरकारों से लेकर संस्थागत सहयोग की कमी भी वजह है। अमेरिका जैसे मजबूत संस्थागत आधार वाले लोकतांत्रिक देशों में भी अब पत्रकारों को नियमित रूप से डराया-धमकाया और जलील किया जाता है। महिला पत्रकारों के साथ दुव्र्यवहार की घटनाओं पर भारत का भी जिक्र किया गया। व्हाट्सऐप के जरिये फैलाई जाने वाली अफवाहों के चलते भीड़ द्वारा पीट-पीटकर मार डाले जाने की घटनाओं और वर्ष 2017 में महिला पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या का भी मुद्दा उठा। समाज में नफरत बढ़ाने, फर्जी खबरें फैलाने और ध्रुवीकरण में सोशल मीडिया की भूमिका भी चर्चा का विषय बनी। मीडिया की आजादी बचाए रखने के तरीके सुझाना भी इस सम्मेलन का एक मकसद था। एक अहम सुझाव वैश्विक कानूनी पैनल बनाने को लेकर आया। ब्रिटेन के विदेश मंत्री जेरमी हंट ने कहा, 'पत्रकारों के खिलाफ बढ़ती हिंसा पर काबू करने के लिए राजनीतिक इच्छा, राजनयिक दबाव और हालात सुधारने में देशों की मदद के लिए एक कानूनी ढांचा बनाने की भी जरूरत है। उच्च स्तर के इस स्वतंत्र पैनल में दुनिया के बेहतरीन कानूनी विशेषज्ञों को जगह मिले और वे मीडिया के साथ दुव्र्यवहार रोकने वाला ढांचा तैयार करेंगे।'
 
ऑक्सफर्ड स्थित रॉयटर्स पत्रकारिता अध्ययन संस्थान के शोध निदेशक रेस्मस क्लीस नील्सन ने मीडिया के कारोबारी परिप्रेक्ष्य पर विस्तार से अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि गुणवत्ता से भरपूर खबर की मांग एवं उसकी आपूर्ति का मुद्दा काफी अहम है। उनका कहना एकदम सही है। अच्छी गुणवत्ता वाली पत्रकारिता के लिए ढेर सारे पैसों की जरूरत होती है लेकिन पाठक हमेशा उसका भुगतान करने को तैयार नहीं होते हैं। द फाइनैंशियल टाइम्स या द इकनॉमिस्ट जैसे अखबार जरूर इसके अपवाद हैं।
 
भले ही भारत में अखबार संपादकीय रूप से एक हद तक अच्छा काम कर रहे हैं और वे मुनाफे में भी चल रहे हैं लेकिन विज्ञापनों पर उनकी अतिशय निर्भरता का नतीजा यह होता है कि वे विज्ञापनदाता से दबाव आने का पहला संकेत मिलते ही झुक जाते हैं। भारत के करीब 400 समाचार चैनलों में से आधे चैनलों का स्वामित्व ऐसे लोगों के हाथ में है जो मीडिया स्वामित्व को प्रभाव, उगाही या अनुचित लाभ का जरिया मानते हैं। ये चैनल सनसनी पैदा करने वाली रिपोर्ट दिखाते हैं, उनके स्टूडियो में बैठे ऐंकर तीखी बहस करते हैं और फालतू मुद्दों पर चीख-चीखकर बोलते हैं।
 
वैश्विक स्तर पर मीडिया स्वामित्व का ढांचा एक सशक्त समाचार परिवेश बनाने में बड़ी भूमिका निभाता है। द इकनॉमिस्ट और द गॉर्डियन का स्वामित्व आंशिक रूप से ट्रस्ट के पास है। बीबीसी की फंडिंग ब्रिटेन के टीवी उपभोक्ताओं द्वारा दी जाने वाली लाइसेंस फीस से होती है। इस तरह दुनिया के बेहतरीन मीडिया ब्रांड में ऐसा स्वामित्व ढांचा है जो उन्हें आर्थिक रूप से स्वतंत्र बनाता है। हम जब तक मीडिया में स्वामित्व का बढिय़ा ढांचा प्रोत्साहित नहीं करेंगे और बुरे ढांचे को हतोत्साहित नहीं करेंगे तब तक यह समस्या जारी रहेगी। मसलन, मीडिया संस्थानों पर नेताओं, सरकारी निकायों, धार्मिक संगठनों या सरकार के स्वामित्व पर सख्ती बरतने से मदद मिलेगी। राजस्व, लागत, स्वामित्व और शेयरधारिता पैटर्न संबंधी विवरणों के बारे में पारदर्शिता पर बल देना भी फायदेमंद होगा। जमीनी हकीकत दिखाने वाली रिपोर्टिंग में अखबारों, वेबसाइट और समाचार चैनलों के लिए निवेश को सहज बनाया जाए- चाहे वह कर अवकाश हो या बेहतरीन पत्रकारिता संस्थानों को अनुदान देना हो। मीडिया साक्षरता देने वाले स्कूलों एवं संस्थानों को विशेष प्रोत्साहन भी दिए जा सकते हैं। मेरे हिसाब से विज्ञापनदाता साक्षरता के लिए पाठ्यक्रम चलाने पर अलग प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए। अगर विज्ञापनदाता फर्जी खबरों एवं असली खबरों में फर्क कर सकें और फर्जी खबरों से पैसे निकालने लगें तो ऐसी गलत खबरें परोसने वाले मीडिया समूह अगर खत्म नहीं तो कम जरूर हो जाएंगे। भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण ने भी 2014 की एक रिपोर्ट में ऐसी अनुशंसाएं की थीं। 
 
हालांकि इनमें से कोई भी कदम किसी भी सरकार द्वारा नहीं उठाया जा सकता है। भारत के लिए ब्रिटेन के संचार नियामक ऑफकॉम की तरह की व्यवस्था कारगर हो सकती है जो एक संसद-समर्थित स्वतंत्र मीडिया नियामक होगा। मीडिया की स्वतंत्रता एवं अच्छी पत्रकारिता के प्रोत्साहन के लिए मीडिया कंपनियों के मालिकों को यह स्वीकार करना होगा कि स्व-नियमन का अब तक अपनाया गया तरीका नाकाम हो चुका है। उन्हें जल्द ही इसके विकल्पों के बारे में सोचना शुरू कर देना चाहिए। अगर भौतिक ढांचे का किसी देश की आर्थिक प्रगति पर कई गुना असर होता है तो सूचना एवं समाचार ढांचे का भी उसकी बौद्धिक पूंजी यानी लोगों पर ऐसा ही असर होता है। अगर हमारे लोकतंत्र की गुणवत्ता गलत जानकारियों की चपेट में है तो मीडिया को इसका मुकाबला करने के लिए अच्छी पत्रकारिता को भी सशक्त बनाना होगा।
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