बिजनेस स्टैंडर्ड - सरकार का विदेशी ऋण: क्यों व कैसे?
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सरकार का विदेशी ऋण: क्यों व कैसे?

अजय शाह /  07 19, 2019

विदेशी निवेशकों के साथ बेहतर रिश्ते इसलिए भी मायने रखते हैं क्योंकि जब बात लंबी अवधि के ऋण संबंधी लक्ष्यों की आती है तो वे मददगार साबित हो सकते हैं। विस्तार से जानकारी दे रहे हैं अजय शाह

 
सरकार की विदेशी ऋण लेने की मंशा के पक्ष में तीन कारण हैं। कई बार यह सरकार को सस्ता ऋण सुनिश्चित करेगा। इसकी वजह से ऐसी संदर्भ दर तैयार होगी जो देश के कारोबारी घरानों की विदेशी ऋण मिलने की क्षमता को बेहतर बनाएगा। सबसे महत्त्वपूर्ण बात, जब भारत संकट में है, तो उस स्थिति में यह सस्ती दर पर भारी कर्ज सुनिश्चित करने का माध्यम है। यहां दो बातों का ध्यान रखना होगा। पहला, ऋण प्रबंधन के लिए बेहतर संस्थागत प्रावधानों की जरूरत है। दूसरा, हमें विदेशी निवेशकों को बनाए रखकर और उनका भरोसा जीतकर लंबी पारी खेलनी है।
 
मान लेते हैं भारत सरकार के पास ऋण के दो माध्यम हैं जो पूरी तरह सक्रिय और हर वक्त व्यवहार्य हैं: मुंबई में रुपये में उधारी लेने की और लंदन में डॉलर में उधारी लेने की। दोनों जगह कीमतों में उतार-चढ़ाव आता है। लंदन का मूल्य अधिक आकर्षक होगा और ऐसी उधारी को प्राथमिकता दी जाएगी। विदेशी ऋण कार्यक्रम की शुरुआत के साथ हम इसे वैकल्पिक बनाकर इसका लाभ ले सकते हैं। दूसरा लाभ विदेशों से ऋण लेने वाली तमाम कंपनियों की बाह्य सकारात्मकता से जुड़ा है। लंदन में सरकार द्वारा जारी डॉलर बॉन्ड में कारेाबार से नकदी का प्रतिफल तैयार हो सकता है। अगर ऐसा होता है तो यह एक ऐसी संदर्भ दर तैयार कर सकता है जिसके समक्ष सभी भारतीय कारोबारी कर्जदारों का मूल्यांकन होगा। विदेशी ऋण लेने की इच्छुक तमाम भारतीय कंपनियों को बेहतर दर मिलेगी।
 
तीसरी और सबसे अहम बात कठिन समय के लिए है। स्वस्थ सार्वजनिक वित्त में अधिकांश वर्ष मामूली ही सही लेकिन प्राथमिक अधिशेष रहता है। परंतु यदाकदा हर देश को दिक्कत का सामना करना ही पड़ता है। ऐसे दिनों में प्राथमिक घाटे में इजाफा होता है और उधारी बढ़ती है। बहरहाल, जब भारत ऐसी किसी आपदा का सामना करता है तो उसे घरेलू स्तर पर नकदी जुटा पाना मुश्किल होगा। ऐसे वक्त विदेशी ऋण का इस्तेमाल करना एकदम उपयुक्त कदम है। आमतौर पर विदेशों में रहने वाले कर्जदाता भारत में आई किसी भी विपत्ति से महफूज रहेंगे और इसलिए ऋण देने का बेहतर जरिया भी। घरेलू कर्जदाता तो उस हालत में खुद दिक्कत से जूझ रहे होंगे। 
 
इन लाभ को हासिल करने के क्रम में भी दो सावधानियां बरतनी होंगी। पहली समस्या सार्वजनिक ऋण प्रबंधन की संस्थागत व्यवस्था में आती है। फिलहाल, ऋण को लेकर सरकारी नीति के बारे में कोई एक राय नहीं है। ऐसे में पूरी तस्वीर सामने नहीं आती और ऋण के मौद्रिक घटक के बारे में निर्णय लेना आसान नहीं रहता। सरकार में ऐसी कोई जगह नहीं है जो यह समझने में सक्षम हो कि लंदन में भारत सरकार के डॉलर संदर्भित बॉन्ड को लेकर नकदी प्रतिफल कर्व कैसे बनता है। जरूरत इस बात की है कि सरकारी ऋण प्रबंधन एजेंसी गठित की जाए जो वित्त मंत्रालय के अधीन निवेश बैंकर की भूमिका में रहे। इससे सरकार की तमाम उधारी को लेकर एकीकृत नजरिया रहेगा और तमाम रास्ते नजर आएंगे।
 
कई पर्यवेक्षक इस बात को लेकर चिंतित रहे हैं कि विदेशी ऋण खतरनाक है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप कितना ऋण लेते हैं। देश के मौजूदा हालात को देखते हुए अगर 25 अरब डॉलर का विदेशी ऋण लिया जाता है तो वह जीडीपी के एक फीसदी के बराबर होगा। इतनी रकम कोई जोखिम नहीं होगी बल्कि यह सीखने का मौका होगा। इसके साथ ही इस ऋण के जोखिम और इसके प्रबंधन के लिए ऋण प्रबंधन एजेंसी की भी आवश्यकता होगी। खासतौर पर तब जबकि उधारी की राशि बहुत अधिक हो।
 
ऋण प्रबंधन एजेंसी की बात करें तो उसका लक्ष्य शंकालु निवेशकों के साथ दीर्घकालिक रिश्ते कायम करना है। हमें किसी बात को लेकर कोई भ्रम नहीं होना चाहिए। फिलहाल सरकारी बॉन्डों में से अधिकांश जबरन बेचे जा रहे हैं। बैंक, बीमा कंपनियां, ईपीएफओ, एनपीएस और अब म्युचुअल फंड तक को सरकारी बॉन्ड खरीदने के लिए मजबूर किया जा रहा है। जरूरत पडऩे पर भारत सरकार मनमाने बदलाव कर सकती है लेकिन विदेशी निवेशक इससे परे हैं और उन्हें लुभाना होगा। इसके लिए सरकार को एकदम अलग व्यवहार करना होगा। 
 
इसके लिए चार काम करने होंगे: निवेशकों के साथ रिश्ते कायम करना, कठिन प्रश्नों के जवाब देना, राजकोषीय स्थिति दुरुस्त करना और डेटा की गुणवत्ता में सुधार करना। जब हम इन चार समस्याओं में से एक या अधिक में गलती करते हैं तो विदेशी ऋण की लागत बढ़ेगी। एक बार स्वैच्छिक कर्जदाताओं के आगमन के बाद हमारा अपना हित इन समस्याओं के हल से जुड़ जाएगा। विदेशी निवेशकों के साथ रिश्ता मजबूत बनाना विदेशी ऋण के दीर्घकालिक लक्ष्य की दृष्टि से अहम है। इसके लिए पहले नियमित ऋण लेने का भरोसा तैयार करना होगा और कर्ज समय पर चुकाना होगा। जब ऐसा कई बार हो जाए तो हमें विदेशी निवेशकों का भरोसा और सम्मान दोनों हासिल हो जाएगा। विकसित अर्थव्यवस्था वाले देश आसानी से बड़ी राशि का ऋण ले लेते हैं वह भी कम ब्याज दर पर क्योंकि वे लंबे समय से ऋण ले रहे हैं और उसे सफलतापूर्वक चुका भी रहे हैं। ब्रिटेन ने पिछली बार 1688 में कर्ज पर डिफॉल्ट किया था। 
 
समय से पहले ऐसा रिकॉर्ड तैयार करना बेहतर होगा तभी हम संकट के समय निवेशकों का भरोसा जीत पाएंगे। अगर ऋण प्रबंधन एजेंसी विदेशी निवेशकों के साथ सतही संपर्क में रहेगी तो वे संकट के समय भारत सरकार को ऋण देने से हिचकिचाएंगी। जबकि उनके साथ गहन संपर्क, संकट के समय विदेशी कर्जदाताओं से बेहतर संसाधन मिलना सुनिश्चित करेगा भले ही ब्याज दर थोड़ा ज्यादा चुकानी पड़े। भारत सरकार स्वैच्छिक और विदेशी कर्जदाताओं से जिस हद तक बेहतर संबंध कायम करेगी, उतना ही बेहतर होगा। ऐसा करने से घरेलू ऋण परिदृश्य में भी बदलाव आएगा। एक बार फिर अहम अंतर्दृष्टि यही है कि किसी भी संकट की स्थिति में बढ़ी हुई उधारी का लक्ष्य स्वैच्छिक कर्जदाताओं से ही हासिल हो सकता है। 
 
(लेखक नई दिल्ली स्थित नैशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनैंस ऐंड पॉलिसी में प्रोफेसर हैं।)
Keyword: fund, dollar, economy,,
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