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मोदी सरकार में कर्मी संख्या और लोक उपक्रमों को धनराशि बढ़ी

दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  July 18, 2019

वर्ष 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपने पूर्ववर्ती प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से एक ऐसी सरकार मिली थी जिसमें कर्मचारियों की कुल तादाद 34.5 लाख थी। यह तथ्य कम ही लोगों को पता होगा कि मोदी ने अपने कार्यकाल के शुरुआती तीन वर्ष में विभिन्न केंद्रीय मंत्रालयों में सरकारी कर्मचारियों की तादाद घटाकर 32.3 लाख कर दी। बाद के वर्षों में इस कमी की दर घटती गई। 2014-15 में कर्मचारियों की तादाद 4 फीसदी घटाकर 33.1 लाख करने के बाद 2015-16 में यह दर 1.6 फीसदी रही और कर्मचारी घटकर 32.5 लाख हुए। अगले वर्ष 0.44 फीसदी की कमी के साथ यह आंकड़ा 32.3 लाख का रहा।

 
इसके बावजूद महज तीन वर्ष में कर्मचारियों की तादाद में तकरीबन 2.5 लाख की कमी उल्लेखनीय थी। हालांकि इस कमी का आकार वर्ष 2000-01 में अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा की गई 13 फीसदी की कमी या 2011-12 में मनमोहन सिंह द्वारा की गई 6.5 फीसदी कमी से कम था लेकिन फिर भी यह प्रदर्शन प्रभावी था। चिंता की बात यह है कि मोदी सरकार ने शुरुआती तीन वर्ष में कर्मचारियों में कमी से जो लाभ हासिल किया था, वह अगले दो साल में इसमें इजाफे के साथ गंवा दिया गया। वर्ष 2016-17 के 32.3 लाख से बढ़कर 2017-18 में इनकी तादाद 34.9 लाख हो गई यानी 7.8 फीसदी का इजाफा। 2018-19 में 3.7 फीसदी की बढ़ोतरी के साथ यह आंकड़ा बढ़कर 36.1 लाख हो गया। 
 
सन 2017-18 में जो 2.50 लाख कर्मचारियों का इजाफा हुआ उसका बहुत बड़ा हिस्सा सरकार के कर विभाग में बढ़े 70,000, असैन्य रक्षा कर्मचारियों में बढ़े 45,000 और गृह मंत्रालय के पुलिस विभाग में बढ़े 61,000 कर्मचारियों के रूप में था। वर्ष 2018-19 में हुई 1.28 लाख की बढ़ोतरी में भारतीय रेल में शामिल किए गए 99,000 नए कर्मचारियों की प्रमुख हिस्सेदारी थी। भारतीय रेल के कुल कर्मचारियों की तादद बढ़कर 13.7 लाख हो गई है। यह संयोग हो सकता है कि कर्मचारियों की तादाद में कमी सरकार बनने के शुरुआती दो वर्ष में आई जबकि आखिरी दो वर्ष में आम चुनाव करीब आने पर यह रुख उलट गया। क्या कर्मचारियों की तादाद बढऩे का चुनावों से संबंध है?
 
कारण चाहे जो भी हो लेकिन यह स्पष्ट है कि मोदी सरकार को ज्यादा कर्मचारियों वाली सरकार से दिक्कत नहीं है। दूसरे शब्दों में कहें तो वह न्यूनतम सरकार, अधिकतम शासन की बात करती जरूर है लेकिन इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए काम नहीं करती। सरकार के इस रुख का एक संकेत इस बात से भी मिलता है कि पिछले दो वर्ष में जहां मोदी सरकार के कर्मचारी बढ़े, वहीं सरकारी क्षेत्र के साथ सरकार की संबद्धता भी बढ़ी। बीते पांच वर्ष में मोदी सरकार ने सरकारी उपक्रमों में करीब 6.26 लाख करोड़ रुपये की पूंजी डाली। मनमोहन सिंह सरकार ने 2009 से 2014 के बीच करीब 2.33 लाख करोड़ रुपये की राशि इनमें डाली थी। मोदी सरकार द्वारा डाली गई नई पूंजी का बड़ा हिस्सा सरकारी बैंकों को दिया गया है। यह राशि करीब 2.52 लाख करोड़ रुपये के बराबर है। इसके अलावा मोदी सरकार ने भारतीय रेल में 2 लाख करोड़ रुपये, राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण में 1.14 लाख करोड़ रुपये और एयर इंडिया में 17,320 करोड़ रुपये का निवेश किया है।
 
यह दलील सही है कि निजी निवेश में आए धीमेपन के बीच वृद्धि की गति बरकरार रखने के लिए यह जरूरी था कि सरकार सार्वजनिक उपक्रमों में पूंजी निवेश करे। भारतीय रेल और राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण में किए गए 3.14 लाख करोड़ रुपये को इस आधार पर उचित ठहराया जा सकता है। यहां तक कि सरकारी बैंकों में 2.52 लाख करोड़ रुपये के निवेश को भी उचित ठहराया जा सकता है क्योंकि ये बैंक फंसे हुए कर्ज के दबाव में थे और इन्हें उबारना जरूरी था ताकि ये बेहतर कामकाज करके आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा दे सकें।
 
सरकारी क्षेत्र का पूंजीगत आवंटन जिसमें आंतरिक संसाधन, ऋण और सरकारी प्रतिभूति शामिल है, वह 2014-15 के 2.96 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर मोदी सरकार के कार्यकाल के अंतिम वर्ष यानी 2018-19 में 8.43 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया। यह बढ़ोतरी कितनी ज्यादा है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि सरकार के कुल व्यय में सरकारी आवंटन की हिस्सेदारी 2014-15 के 18 फीसदी से बढ़कर 2018-19 में 34 फीसदी हो गई। सरकारी क्षेत्र के आवंटन में लगातार इजाफे के बीच सरकार ने इन सरकारी उपक्रमों के आरक्षित भंडार पर भी हाथ डालना शुरू कर दिया। 2014-15 में सरकार ने इन कंपनियों से लाभांश के रूप में 31,692 करोड़ रुपये की राशि ली। बाद के वर्षों में भी लाभांश प्राप्ति बढ़ती रही और 2018-19 में इसके 45,124 करोड़ रुपये रहने का अनुमान है। यह तब है जबकि इन सरकारी उपक्रमों की वित्तीय स्थिति या मुनाफे में कोई बड़ा सुधार होने की खबर नहीं है।
 
मोदी सरकार की सार्वजनिक क्षेत्र के साथ बढ़ती संबद्धता के अन्य पहलू भी हैं। वर्ष 2014-15 से 2018-19 के बीच पांच वर्षों में मोदी सरकार ने कई तरीकों से इन उपक्रमों की हिस्सेदारी बेची और इससे 2.88 लाख करोड़ रुपये की राशि जुटाई। परंतु इसमें एक भी घटना निजीकरण की नहीं थी। मनमोहन सिंह की सरकार ने 2009-10 से 2013-14 तक के पांच साल में केवल 99,367 करोड़ रुपये जुटाए थे। उसने भी निजीकरण नहीं किया था। मोदी सरकार ने जिस प्रकार कर्मचारियों की तादाद में इजाफा किया या आवंटन, लाभांश अथवा राजस्व के मामले में सार्वजनिक क्षेत्र के साथ संबद्धता बढ़ाई, उसकी कई वजह हो सकती हैं। परंतु यह भी मोदी सरकार का एक ऐसा पहलू है जहां यह अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार से अलग है। अक्सर इस बारे में बात नहीं होती। 
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