बिजनेस स्टैंडर्ड - बैंक राष्ट्रीयकरण के 50 साल पर जश्न या विलाप
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बैंक राष्ट्रीयकरण के 50 साल पर जश्न या विलाप

तमाल बंद्योपाध्याय /  July 18, 2019

राष्ट्रीयकृत बैंकों ने सरकारों की तरफ से सौंपे गए दायित्वों का अच्छी तरह निर्वहन किया है लेकिन कारोबारी मोर्चे पर अधिकांश बैंक नाकाम रहे हैं। बता रहे हैं तमाल बंद्योपाध्याय

 
शुक्रवार को बैंकों के राष्ट्रीयकरण की 50वीं वर्षगांठ है। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के ऐलान के बाद 19 जुलाई, 1969 की मध्यरात्रि को 50 करोड़ रुपये से अधिक जमा वाले 14 बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया था। राष्ट्रीयकरण संबंधी अध्यादेश को चुनौती दी गई तो उच्चतम न्यायालय के 11 न्यायाधीशों के पीठ ने 34 दिनों तक चली सुनवाई के बाद सभी आपत्तियों को खारिज कर दिया। भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) और उसके सहायक बैंकों के साथ इन राष्ट्रीयकृत बैंकों के पास उस समय बैंकों में जमा 85 फीसदी राशि थी।
 
राष्ट्रीयकरण के दूसरे दौर में 1980 में 200-200 करोड़ रुपये की जमा वाले छह अन्य वाणिज्यिक बैंकों को राष्ट्रीयकृत किया गया। उस समय कुल जमा में सरकारी नियंत्रण वाले बैंकों की 91 फीसदी हिस्सेदारी थी। सबसे बड़े कर्जदाता बैंक एसबीआई की बहुलांश हिस्सेदारी सरकार के पास है लेकिन यह उस अधिनियम के दायरे में नहीं आता है जिसने ऋण बाजार बढ़ाने के लिए 20 निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया था। आज बहुत कम बैंकर ही इस वर्षगांठ पर जश्न के मूड में हैं। इस समय कई विश्लेषक राष्ट्रीयकरण से हासिल नतीजों को लेकर सवाल उठा रहे हैं और कुछ लोग दो बड़े निजी बैंकों की हालिया मुश्किलों को देखने के बावजूद निजीकरण की बात कर रहे हैं।
 
सघन निगरानी कक्ष (आईसीयू) में पहुंच गए कुछ सार्वजनिक बैंकों पर नजर डालने के पहले हम 1969 में बैंकिंग क्षेत्र के हालात पर एक बार गौर कर लेते हैं। उस समय क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों को छोड़कर देश भर में 73 वाणिज्यिक बैंक सक्रिय थे और आज यह संख्या 91 है। बैंक शाखाओं की संख्या में जबरदस्त तेजी आई है और यह 8,262 से बढ़कर 1.41 लाख से ऊपर हो चुकी है। ग्रामीण शाखाओं की संख्या में बढ़ोतरी खास तौर पर अहम है। वर्ष 1969 में केवल 22 फीसदी शाखाएं ग्रामीण क्षेत्रों में थीं। अब यह अनुपात बढ़कर 35 फीसदी से भी अधिक हो चुका है। संख्या के तौर पर यह 1,832 से बढ़कर 50,081 हो चुका है। इस दौरान कस्बों में खुली शाखाओं की हिस्सेदारी 40 फीसदी से घटकर 27.5 फीसदी हो गई है जबकि शहरी एवं महानगरीय इलाकों में बैंक शाखाओं का हिस्सा कमोबेश वही है।
 
बैंकिंग उद्योग गत पांच दशकों में कई गुना बढ़ गया है। बैंकों में जमा राशि 4,646 करोड़ रुपये के मामूली स्तर से बढ़कर 125 लाख करोड़ रुपये हो चुकी है और बैंक ऋण भी 3,599 करोड़ से बढ़कर 96.5 लाख करोड़ रुपये हो चुका है। सार्वजनिक बैंकों की परिसंपत्ति 1990 के दशक तक चार फीसदी दर से बढ़ी जो भारतीय अर्थव्यवस्था की औसत दर भी थी। लेकिन इस सदी के पहले दशक में इस दर में नाटकीय रूप से सुस्ती देखी गई। वर्ष 2015 के बाद फंसे कर्जों के बारे में खुलासे के लिए मजबूर किए जाने से कुछ बैंकों की बैलेंस शीट में गिरावट देखी जा रही है।
 
इंदिरा गांधी ने बैंकों के राष्ट्रीयकरण की घोषणा के ठीक एक सप्ताह पहले बेंगलूरु में हुए कांग्रेस अधिवेशन में इसकी जोरदार वकालत की थी। इंदिरा के अलावा इस पूरी कवायद में केवल तीन लोग ही शामिल थे- प्रधानमंत्री के प्रमुख सचिव पी एन हक्सर, रिजर्व बैंक के डिप्टी गवर्नर ए बख्शी और एक कनिष्ठ अधिकारी डी एन घोष। यहां तक कि रिजर्व बैंक के गवर्नर को भी इस बारे में नहीं पता था। असलियत यह है कि बैंकों के राष्ट्रीयकरण का कदम राजनीतिक भी था। दूसरे विश्व युद्ध के बाद कई बैंक धराशायी हो गए थे क्योंकि वे अटकलबाजी वाली वित्तीय गतिविधियों के लिए पैसे देते थे और उस समय बैंकिंग नियमन में अपेक्षाकृत नया होने से आरबीआई भी करीब 300 बैंकों के पर्यवेक्षण में कठिनाई महसूस कर रहा था।
 
वर्ष 1960 में पलई सेंट्रल बैंक और लक्ष्मी कॉमर्शियल बैंक धराशायी हो गए तो वित्त मंत्री मोरारजी देसाई के कहने पर आरबीआई ने बैंकों की संख्या को 328 से घटाकर 1965 तक 94 पर लाने का फैसला किया। इसके लिए कुछ बैंकों को बंद करने और कुछ के विलय का रास्ता तय किया गया। राष्ट्रीयकरण के बाद सरकार ने केवल एक बार विलय के लिए मजबूर किया- 1993 में न्यू बैंक ऑफ इंडिया का पंजाब नैशनल बैंक में विलय हुआ था। आज के समय बैंकों के एकीकरण की कवायद पूरे शबाब पर है। एसबीआई के सहायक बैंकों का मूल बैंक में विलय होने के बाद सरकार ने दो छोटे बैंकों का बैंक ऑफ बड़ौदा में विलय कर दिया। इस तरह के कई और विलय भी किए जाने की तैयारी चल रही है। क्या बैंकों का एकीकरण ही जवाब है? क्या इससे सार्वजनिक बैंक अधिक सक्षम हो पाएंगे? एकीकरण योजना के साथ शाखाओं के दोहराव, विभिन्न तकनीकी प्लेटफॉर्म की मौजूदगी और कर्मचारियों के समायोजन जैसी चुनौतियां भी हैं। अगर बैंकिंग क्षेत्र इन बाधाओं को सफलतापूर्वक पार कर लेता है तो भी समग्र बैंकिंग उद्योग में सरकारी स्वामित्व वाले बैंकों की हिस्सेदारी तो कम नहीं होगी। आज यह हिस्सेदारी 70 फीसदी से थोड़ा ही कम है जो अधिकांश बाजारों से काफी अधिक है।
 
सार्वजनिक बैंकों की मौजूदा हालत के लिए किसे जिम्मेदार ठहराया जाए? इसका जवाब खुद बैंक और उनमें बहुलांश हिस्सेदारी रखने वाली सरकार है। नब्बे के दशक में नए निजी बैंकों के आने के बाद सार्वजनिक बैंकों को पहली बार प्रतिस्पद्र्धा का सामना करना पड़ा। इन बैंकों को लोगों से पैसे जुटाने की मंजूरी देकर सरकार ने उन्हें प्रतिस्पद्र्धी एवं तकनीकी दक्ष बनाने की कोशिश की थी। वह एक अच्छी पहल थी लेकिन दो नाजुक वजहों से बैंक पंगु हो गए। पहली, परियोजनाओं को वित्त मुहैया कराने वाले संस्थानों को समेट दिया गया और कार्यशील पूंजी देने से अधिक ज्ञान नहीं रखने वाले सार्वजनिक बैंकों के पास भारतीय कंपनियों को दीर्घावधि कर्ज देने के सिवाय कोई चारा नहीं था। उससे ही कर्ज फंसने की समस्या शुरू हुई। दूसरी, सरकार ने अपनी बहुलांश हिस्सेदारी कम करने के बाद भी बैंकों पर नियंत्रण बनाए रखा। वह अब भी इन बैंकों के मुख्य कार्याधिकारियों (सीईओ) को नियुक्त करती है, उनके बोर्ड गठन में अहम भूमिका निभाती है और जरूरत पडऩे पर गैर-बैंकिंग कार्यों के लिए भी उनके आधारभूत ढांचे का इस्तेमाल करती है। वह बैंकरों को बाजार के अनुरूप वेतन-भत्ते भी नहीं देती है। और अब तो बैंकर लगातार जांच एजेंसियों के भी रडार पर हैं। उनके दोनों हाथ बांधकर आप उनसे किसी करिश्मे की उम्मीद नहीं कर सकते हैं। 
 
प्रधानमंत्री जनधन योजना के तहत 36.06 करोड़ नए बैंक खाते खुले हैं। इनमें सार्वजनिक बैंकों का अंशदान 28.65 करोड़ है जबकि निजी बैंकों ने केवल 1.25 करोड़ जनधन खाते खोले हैं। बाकी खाते क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों में हैं। सरकारी-नियंत्रण वाले बैंकों को जो भी काम दिया जाता है वे उसे अच्छी तरह पूरा करते हैं लेकिन कारोबार के मामले में अधिकतर बैंक नाकाम हैं। बैंक राष्ट्रीयकरण की 50वीं वर्षगांठ भविष्य के बारे में फैसले का इन्हें अधिकार देने का उपयुक्त अवसर है। क्या उन्हें ढांचागत आधार के लिए कर्ज देने और तथाकथित राष्ट्र-निर्माण में योगदान देकर फंसे कर्जों की समस्या पैदा करने के लिए पूंजी देते रहना चाहिए या कुछ बैंकों को खत्म हो जाने देना चाहिए या उन्हें निजी हाथों में सौंप दिया जाए? उन्हें अतीत की याद में कब तक सोते रहने देना चाहिए? यह वक्त जश्न मनाने का है या विलाप करने का?
 
(लेखक बिज़नेस स्टैंडर्ड के सलाहकार संपादक, लेखक एवं जन स्मॉल फाइनैंस बैंक लिमिटेड के वरिष्ठ परामर्शदाता हैं) 
Keyword: bank, national, 50 years, indira gandhi,,
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