बिजनेस स्टैंडर्ड - बैंक राष्ट्रीयकरण के 50 वर्ष
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बैंक राष्ट्रीयकरण के 50 वर्ष

संपादकीय /  July 18, 2019

पचास वर्ष पूर्व आज ही के दिन इंदिरा गांधी की सरकार ने 14 वाणिज्यिक बैंकों का राष्ट्रीयकरण करने का निर्णय लिया था। उस घटना को आजाद भारत की सबसे बड़ी आर्थिक गतिविधि कहा जाता है। हालांकि निर्णय के पीछे आर्थिक आधार दिया गया था लेकिन इसकी वजह राजनीतिक ज्यादा थी। सन 1980 में सरकार ने छह अन्य बैंकों का नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया। बैंक राष्ट्रीयकरण का विचार नया नहीं था। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की एक आंतरिक समिति ने सन 1948 में ही बैंकिंग और बीमा क्षेत्र के राष्ट्रीयकरण की अनुशंसा की थी जिसे आगे चलकर समर्थन भी मिला। स्वतंत्रता के पश्चात बैंकिंग व्यवस्था की अपनी दिक्कतें थीं और अहम क्षेत्रों तक ऋण की पहुंच और प्रवाह को लेकर कुछ मसले भी थे। उदाहरण के लिए टुकड़ों में बंटे होने की समस्या को समावेशन से दूर किया गया। बैंकों की तादाद 1951 में 566 से घटाकर 1967 में 91 कर दी गई। राष्ट्रीयकरण के पहले सरकार ने कुछ मसलों को सामाजिक नियंत्रण के जरिये हल करने का प्रयास किया था। मूल विचार था ऋण की व्यापक पहुंच सुनिश्चित करना और प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में आवक बढ़ाना।

 
राष्ट्रीयकरण का मुद्दा समय-समय पर सर उठाता रहा लेकिन सन 1960 के दशक में बढ़ती आर्थिक कठिनाइयों और कुछ चुनावी झटकों के बाद पार्टी पर नियंत्रण बनाए रखने की आवश्यकता ने इंदिरा गांधी को बैंक राष्ट्रीयकरण के लिए मजबूर किया। इसके परिणामस्वरूप बैंक जमा में इजाफा हुआ और वित्तीय बचत बढ़ी। बढ़ते राजकोषीय घाटे ने बैंकिंग क्षेत्र को फाइनैंसिंग का एक अहम जरिया बना दिया। निरंतर राजनीतिक हस्तक्षेप के बीच मुनाफे पर असर पड़ा। आगे चलकर बैंकों के परिचालन पर भी असर पडऩे लगा और सन 2014 में प्रधानमंत्री जन धन योजना के आगमन के पूर्व तक देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा औपचारिक बैंकिंग से दूर बना रहा। राष्ट्रीयकरण के 50 वर्ष बाद अधिकांश सरकारी बैंक उस स्थिति में नहीं हैं जैसा सोचा गया था। बीते कुछ वर्ष में सरकार ने बैंकों में 2.5 लाख करोड़ रुपये की राशि डाली है। चालू वर्ष में भी 70,000 करोड़ रुपये की राशि बैंकिंग में डाली जा रही है और शायद अभी और राशि की आवश्यकता होगी। सरकारी बैंक फंसे हुए कर्ज की समस्या से भी जूझ रहे हैं।
 
कई ऐसी बात हैं जिन पर ध्यान देना आवश्यक है। पहली बात, सरकार के पास इन बैंकों में निरंतर पूंजी डालने की राजकोषीय गुंजाइश नहीं है। पुनर्पूंजीकरण बॉन्ड के प्रयोग की अपनी सीमाएं हैं क्योंकि इससे सरकार की जवाबदेही बढ़ती है। दूसरी बात, बैंकिंग और फाइनैंस में तकनीक की भूमिका तेजी से बढ़ रही है और कमजोर बैलेंस शीट वाले सरकारी बैंक इस स्थिति में नहीं हैं कि वे इस क्षेत्र में प्रतिस्पर्धी रह पाएं। जाहिर है निजी बैंक बढ़त बना रहे हैं। तीसरा, सरकारी बैंकों में मौजूदा स्थिति में जरूरी सुधार लागू करना भी मुश्किल है। कुल बकाया ऋण का 66 फीसदी इन बैंकों के पास है और कुल जमा का 65.7 फीसदी इन बैंकों के पास है। ऐसे में इन्हें परिचालन और कार्य के स्तर पर स्वायत्तता की आवश्यकता है। सरकार के बहुलांश हिस्सेदार रहते ऐसा होना मुश्किल है। ऐसे में सरकार को व्यवस्थित ढंग से अपनी हिस्सेदारी कम करनी चाहिए। सरकार नरसिम्हन समिति की अनुशंसाओं पर पुनर्विचार कर सकती है। सरकारी हिस्सेदारी को 33 फीसदी करने से न केवल बैंकों को अधिक स्वायत्तता मिलेगी बल्कि वे पूंजी जुटाकर बाजार में प्रतिस्पर्धी भी बन सकेंगे। पचासवीं वर्षगांठ सरकारी बैंकों के राष्ट्रीयकरण के बाद के प्रदर्शन के आकलन के लिए उचित अवसर है। इसके आधार पर सुधार के उपाय किए जा सकते हैं। यथास्थिति बरकरार रखने से न केवल सरकारी खजाने पर बोझ बढ़ेगा बल्कि संभावित वृद्धि पर भी बुरा असर होगा।
Keyword: bank, national, 50 years, indira gandhi,,
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