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व्यवहारात्मक अर्थशास्त्र और उसकी सफलता के उदाहरण

इंसानी पहलू
श्यामल मजूमदार /  July 17, 2019

इस माह के शुरू में जारी आर्थिक समीक्षा में जब पूरा एक हिस्सा व्यवहारात्मक अर्थशास्त्र को समर्पित किया गया तो यह विषय अचानक चर्चा में आ गया। समीक्षा में बताया गया कि कैसे लोगों की चयन की आजादी बरकरार रखते हुए भी उन्हें वांछित परिणाम की ओर ले जाया जा सकता है। समीक्षा के इस हिस्से में बताया गया कि कैसे स्वच्छ भारत अभियान और बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान व्यवहारात्मक अंतर्दृष्टि की सफलता के उदाहरण हैं। इस तकनीक का सबसे सफल इस्तेमाल ब्रिटेन में उस समय किया गया जब सरकार को कर भुगतान में अंतिम समय में हुए इजाफे से निपटना मुश्किल हो रहा था। सरकार द्वारा स्थापित व्यवहारात्मक अंतर्दृष्टि पर काम करने वाली एक टीम ने लोगों को बार-बार यह याद दिलाने वाले पत्र भेजने शुरू कर दिए कि उनके अधिकांश पड़ोसी पहले ही टैक्स अदा कर चुके हैं। इसके बाद कर चुकता होने के मामलों में अचानक तेजी आई। इस सफलता से उत्साहित ब्रिटेन की सरकार ने ऐसी गतिविधियों का दायरा बढ़ाया: कर भुगतान से लेकर इसे अस्पताल के उन अपॉइंटमेंट्स पर लागू किया गया जिन तक पहुंचने में लोग चूक गए थे।

 
व्यवहारात्मक अर्थशास्त्र कुछ और नहीं बल्कि लोगों के आर्थिक निर्णय लेने के तौर तरीकों का अध्ययन है। इस अध्ययन में मनोवैज्ञानिक, भावनात्मक, सामाजिक और संज्ञानात्मक कारकों की भूमिका का अध्ययन किया जाता है। कई बड़ी कंपनियों के मानव संसाधन व्यवहार में इसका इस्तेमाल किया जाता है। कुछ मामलों में मानव संसाधन क्षेत्र में काम करने वाले पेशेवर इन तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं और ये प्रभावी भी साबित हो रही हैं। उदाहरण के लिए गूगल ने येल विश्वविद्यालय के साथ मिलकर यह अध्ययन किया कि व्यवहारात्मक अर्थशास्त्र कैसे कर्मचारियों के स्वास्थ्य की बेहतरी में काम आ सकता है। यह अध्ययन तब किया गया जब पता चला कि खराब स्वास्थ्य और मोटापा आदि अमेरिकी कंपनियों पर हर वर्ष बहुत गहरा असर डालते हैं। ऐसे में कंपनी ने खानपान के दौरान कर्मचारियों का ध्यान इस ओर आकृष्ट करने की प्रक्रिया शुरू की कि खानेपीने के अधिक पौष्टिक और स्वास्थ्यवर्धक विकल्प कौन से हैं? उन्होंने स्वास्थ्यवर्धक भोजन को नुकसानदेह खाने से पहले रखना शुरू किया ताकि कर्मचारी पौष्टिक खाना खाने के लिए प्रेरित हों।
 
गूगल और येल के शोधकर्ताओं ने कम लोकप्रिय सब्जियों का प्रचार प्रसार करते हुए उन्हें बेहतर बताना शुरू किया। इन सब्जियों को रंगीन कागज में कुछ दिलचस्प तथ्यों के साथ रखना शुरू किया गया। इससे इन सब्जियों की खपत में 74 फीसदी तक इजाफा हुआ। अन्य कंपनियों ने भी इससे मिलते जुलते कदम उठाए और उन्होंने खाने के साथ उससे मिलने वाली कैलरी की जानकारी देना शुरू किया। इससे उन लोगों को मदद मिली जो अपने वजन पर ध्यान दे रहे थे या जो अधिक स्वास्थ्यवर्धक खाने की तलाश में थे।
 
व्यवहारात्मक अर्थशास्त्र 2008 में नज: इंप्रूविंग डिसीजंस अबाउट हेल्थ, वेल्थ ऐंड हैपिनेस नामक बेस्टसेलिंग किताब से अस्तित्व में आया। यह किताब रिचर्ड एच टालर और विधिक विद्वान कास आर सनस्टेन ने मिलकर लिखी थी। लेखक कहते हैं कि किसी व्यक्ति का किसी चीज का कार्य के प्रति व्यवहार इस बात पर भी निर्भर करता है कि उसके सामने चीजें किस प्रकार पेश की जाती हैं। शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि अगर कार्यालय की सीढिय़ां अच्छी दिखती हों और बीच में स्थित हों तो लोग कोने में लगे एलिवेटर की तुलना में उनका इस्तेमाल पसंद करते हैं। यह न केवल उत्साहवर्धक कवायद है बल्कि यह अधिक खुली कार्य संस्कृति पैदा करती है।
 
ऐसे में व्यवहारात्मक अर्थशास्त्र भी मानव संसाधन के लिए ऐसा अहम क्षेत्र है जिसका प्रयोग कई क्षेत्रों में किया जा सकता है। इससे कंपनी को लोगों की नियुक्ति में बेहतर निर्णय करने में मदद मिलेगी और लोग भी अपने काम से जुड़ाव महसूस करेंगे। कई प्रमुख कंपनियों ने इसके सिद्घांतों को अपने मानव संसाधन व्यवहार में अपनाया है।  व्यवहार विज्ञान ने कंपनियों को यह अंतर्दृष्टि भी प्रदान की है कि वे अपने कर्मचारियों के दिमाग को सही तरीके से कैसे पढ़ें? उदाहरण के लिए पाया गया कि किसी बात को बार-बार दोहराने से कर्मचारी बेहतर ढंग से सीखते हैं। ऐसे में उनके प्रशिक्षण कार्यक्रम तैयार करते समय कई कंपनियों ने हर आधे घंटे में या सत्र के अंत में या फिर कुछ महीने बाद याद दिलाने की कवायद को शामिल किया। कुछ कर्मचारियों को यह खिझाने वाला लग सकता है लेकिन कई अन्य के लिए यह उपयोगी है। इससे प्रबंधन को प्रशिक्षण कार्यक्रमों के प्रभाव के बारे में सटीक प्रतिपुष्टि मिलती है। 
 
इसमें यह बात बहुत महत्त्वपूर्ण है कि संदेश कैसे भेजा जाता है? उदाहरण के लिए दबाव डालने वाली बातों की जगह अगर छोटे और सहज संदेशों के माध्यम से कोई बात याद दिलाई जाए तो उसका प्रभाव काफी अधिक होता है। यानी अगर आप किसी हस्तक्षेप के बिना लोगों के दिमाग में कोई बात डालते हैं तो वह ज्यादा बेहतर तरीके से असर करती है।  टालर ने तीन सिद्घांत प्रस्तुत किए और कहा कि प्रेरित करने की यह पूरी प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिए और इसे भ्रामक नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा कि इससे बाहर निकलने का भी सहज विकल्प होना चाहिए और यह मानने की वजह होनी चाहिए कि व्यवहार को प्रोत्साहन देकर लोगों की स्थिति में सकारात्मक बदलाव लाया जा सकता है। उन्होंने अपने काम को तीन शब्दों में समेटा: इसे आसान बनाइए। दिग्गज कंपनियां इसका बाइबल की तरह अनुसरण करती हैं। 
Keyword: clean india mission, company, economy,,
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