बिजनेस स्टैंडर्ड - सभी घरों को नल से जल आपूर्ति का काम जटिल
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सभी घरों को नल से जल आपूर्ति का काम जटिल

विनायक चटर्जी /  July 16, 2019

हर घर तक जलापूर्ति का लक्ष्य हासिल करने के लिए जलशक्ति मंत्रालय के सामने सबसे बड़ी चुनौती राज्यों को एक मंच पर लाने की होगी। इसकी चुनौतियों के बारे में बता रहे हैं विनायक चटर्जी

 
जल शक्ति मंत्रालय का गठन पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय के साथ जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा पुनरुद्धार मंत्रालय का विलय कर 31 मई, 2019 को किया गया था। सरकार ने आम आदमी से अपना सबसे बड़ा वादा भी किया है। वर्ष 2024 तक सभी घरों तक पाइप से पानी पहुंचाने का यह वादा जल शक्ति मंत्रालय को पूरा करना है। अपने पहले कार्यकाल में राजमार्ग, रेलवे और नवीकरणीय ऊर्जा पर जोर दे चुकी यह सरकार अपनी दूसरी पारी में ढांचागत प्राथमिकताओं खासकर पानी पर जोर देने का इशारा कर चुकी है।
 
'नल से जल' कार्यक्रम (बजट 2019-20 में 'हर घर जल' के तौर पर उल्लिखित) बेहद महत्त्वाकांक्षी है। भारत जैसे विशाल आकार और विभिन्नता वाले देश में सुदूर इलाकों तक ऐसी बुनियादी सुविधाएं मुहैया करा पाना सबसे मुश्किल काम माना जाता है। इसके पहले सौभाग्य योजना में करीब 2.5 करोड़ परिवारों को बिजली ग्रिड से जोडऩे का वादा किया गया था। इसकी तुलना में नीति आयोग की रिपोर्ट में कहा गया था कि करीब तीन-चौथाई घरों तक पेयजल की आपूर्ति नहीं हो पाई है। वर्ष 2011 की जनगणना के मुताबिक, देश में करीब 25 करोड़ परिवार थे और इस आंकड़े में कोई बदलाव न होने की धारणा रखें तो 'नल से जल' कार्यक्रम के दायरे में करीब 19 करोड़ घरों को लाना होगा। 
 
नीति आयोग की रिपोर्ट ने जल प्रबंधन का एक संयुक्त सूचकांक भी तैयार किया है जिसमें जल स्रोतों के पुनरुद्धार, भूमिगत जल का स्तर सुधारने, सिंचाई और शहरी एवं ग्रामीण पेयजल जैसे मानकों पर विभिन्न राज्यों की तुलना की गई है। राज्यों का आकलन 100 के पैमाने पर किया गया था लेकिन अधिकांश राज्य 50 अंक के नीचे ही रहे। उन राज्यों के जल प्रबंधन के तरीकों में 'खास सुधार' की जरूरत बताई गई। नीति आयोग की रिपोर्ट भूमिगत जल की वास्तविक उपलब्धता के बारे में सीमित आंकड़ों का जिक्र करते हुए कहती है कि देश के कुल 1.2 करोड़ कुओं में से केवल 55,000 कुओं में से लिए गए नमूने के ही आधार पर भूमिगत उपलब्धता का अनुमान लगाया गया है। पुराना कानूनी ढांचा जमीन के मालिक को वहां के भूमिगत जल का भी अधिकारी बताता है। इससे सार्वजनिक संसाधन होते हुए भी पानी की बेतरह निकासी की मंजूरी मिल जाती है लेकिन उसका नतीजा भूमिगत जल स्तर में भारी गिरावट के रूप में सामने आता है।
 
जल क्षेत्र का आकार काफी सीमित है। भारत के पास पूरी दुनिया की पेयजल उपलब्धता का महज चार फीसदी ही है और वह भूमिगत जल दोहन के मामले में सबसे आगे है। भारत का करीब 30 फीसदी हिस्सा रेगिस्तान बनने के मुहाने पर खड़ा है। योजना आयोग के पूर्व सदस्य मिहिर शाह ने बिज़नेस स्टैंडर्ड में प्रकाशित अपने एक लेख में कहा है कि करीब 2.4 करोड़ हेक्टेयर जमीन अभी तक असिंचित है जो पिछले कुछ दशकों में सिंचाई प्रबंधन की नाकामी को दर्शाता है। जल शक्ति मंत्रालय की कमान संभालने वाले मंत्री की सबसे बड़ी चुनौती कूटनीतिक मिजाज की होगी। पानी के राज्य सूची का विषय होने से जल शक्ति मंत्री को जल बंटवारा विवादों में उलझे राज्यों को साथ लाना होगा ताकि सबको पेयजल मुहैया कराने का लक्ष्य हासिल किया जा सके। केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय जल प्रारूप विधेयक 2016 लाने का प्रस्ताव रखा था लेकिन अब भी इस पर राज्यों के साथ विचार-विमर्श ही हो रहा है और क्रियान्वयन का जरूरी ढांचा तैयार करने के लिए इसे जल्द लागू करने की जरूरत है। 
 
देश भर में परिवारों की संख्या को ध्यान में रखें तो लगता है कि नल से जल कार्यक्रम सौभाग्य योजना से आठ गुना अधिक बड़ा है। सौभाग्य में जहां 2.5 करोड़ परिवारों को बिजली कनेक्शन दिया जाना था, वहीं नल से जल में 19 करोड़ परिवारों तक पाइपबंद पानी पहुंचाना है। यह आंकड़ा भी हालात का सरलीकरण ही करता है। असल में, 100 फीसदी परिवारों को पाइप जलापूर्ति कर पाना कई गुना अधिक जटिल काम है। इन बिंदुओं पर गौर कीजिए: 
 
देश भर में और हर घर तक पाइपलाइन बिछाने के दौरान खुदाई, पाइप डालने और रास्ता मिलने जैसे मसले सामने आएंगे। बिजली कनेक्शन देने के लिए तो खंभे गाडऩे और मीटर लगाने की ही जरूरत थी।
 
बड़े पैमाने पर पंप, वॉल्व और फिल्टर जैसे उपकरणों की जरूरत होगी जिससे पाइप बिछाने की जटिलताएं भी बढ़ेंगी।
 
बिजली की आपूर्ति कभी भी कोई मसला नहीं थी लेकिन यहां आपूर्ति के लिए पानी जुटाने की समस्या होगी।
 
बिजली वितरण बाजार में कीमत-निर्धारण, मीटर लगाने, बिल तैयार करने और राजस्व संग्रह का एक स्थापित आर्थिक मॉडल है लेकिन जल क्षेत्र इस मामले में अपरिपक्व है।
 
महाराष्ट्र इकलौता ऐसा राज्य है जहां एक सक्रिय जल नियामक मौजूद है। गुणवत्ता मानक, शुल्क, लक्षित सब्सिडी प्रणाली, विवादों का अधिनिर्णयन और क्रॉस शेयरधारिता के मसलों के समाधान के लिए निष्पक्ष एवं सक्रिय नियामकों की जरूरत है।
 
जलापूर्ति परियोजनाओं के परिचालन एवं रखरखाव के लिए एक दीर्घकालिक टिकाऊ मॉडल अपनाने की जरूरत है। बिजली वितरण कंपनियों की समस्या दिखाती है कि ऐसा कर पाना कितना मुश्किल है?
 
आखिरकार, इतनी विशाल योजना के लिए फंड जुटाने का सवाल है। हालांकि जरूरी फंड के बारे में फिलहाल कोई भी स्पष्ट अनुमान उपलब्ध नहीं है लेकिन यह साफ है कि इस कार्यक्रम पर व्यय एक लाख करोड़ रुपये से अधिक की बुलेट ट्रेन परियोजना से कई गुना अधिक होगा। अगर बुलेट परियोजना के लिए सरकार को जापान से बहुत ही उदार शर्तों पर 90,000 करोड़ रुपये का विकास फंड लेना पड़ा तो नल से जल कार्यक्रम के लिए भी सरकार को केंद्रीय एवं राज्यों के बजट प्रावधानों से कोई अलग रास्ता ही निकालना होगा। इक्कीसवीं सदी में भी बुनियादी जरूरत वाले इस विकास कार्यक्रम को बेहद उदार शर्तों पर लंबी अवधि का फंड मुहैया कराने के लिए बहुआयामी एवं द्विपक्षीय विकास वित्त संस्थानों को प्रेरित होकर आगे आना चाहिए। जल क्षेत्र के लिए समर्पित एक वित्तीय संस्थान की जरूरत महसूस होती है और वर्ष 2008-09 के बजट में सिंचाई एवं जल संसाधन वित्त निगम बनाने के प्रस्ताव पर अमल में लाने का यह बढिय़ा मौका है।
 
इन तमाम बातों के साथ ही जल शक्ति मंत्रालय को समय के साथ भी जंग लडऩी होगी। बहुत आशावादी ढंग से भी देखें तो नेटवर्क इंजीनियरिंग एवं ठेके देने में ही एक साल बीत जाएगा और सरकार को जमीनी स्तर पर काम करने के लिए महज चार साल ही मिलेंगे। इस हिसाब से देश अगर वर्ष 2024 तक लक्ष्य का 50 फीसदी भी हासिल कर लेता है तो भी उसकी गिनती उल्लेखनीय उपलब्धि के तौर पर की जाएगी।
 
(लेखक ढांचागत सलाहकार फर्म फीडबैक इन्फ्रा के चेयरमैन हैं)
Keyword: water, crises, drought, supply.,
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