बिजनेस स्टैंडर्ड - जल संरक्षण की सदियों पुरानी परंपरा बहाल करने की जरूरत
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जल संरक्षण की सदियों पुरानी परंपरा बहाल करने की जरूरत

जमीनी हकीकत
सुनीता नारायण /  July 15, 2019

जब आपको यह लगने लगे कि आज की बातचीत पुरानी बात की पुनरावृत्ति है तो यह मान लेना चाहिए कि आप बूढ़े हो चले हैं। कुछ ऐसा ही अहसास मुझे हो रहा है जब मैं शहरों एवं गांवों में पानी की किल्लत दूर करने के लिए बारिश का पानी जमा करने से जुड़ी चर्चाएं सुनती हूं। घरों की छतों एवं पहाड़ों से गिरने वाले बारिश के पानी को व्यर्थ जाने से रोकना और उसे भूमिगत जलाशयों, पोखरों, झीलों एवं जलदायी भूमि स्तर में जमा करने को वाटर हार्वेस्टिंग कहा जाता है। हम काफी पहले से इसकी अहमियत के बारे में जानते रहे हैं। सवाल यह है कि जब हम इस तकनीक के बारे में पहले से ही जानते हैं तो हमने इसे सही ढंग से लागू क्यों नहीं किया? हम इस ज्ञान का इस्तेमाल करने में नाकाम क्यों रहे हैं? हमें यह सवाल जरूर पूछना चाहिए।

 
मैं आपको बताती हूं कि मुझे रेनवाटर हार्वेस्टिंग के बारे में कैसे पता चला? यह 1990 के दशक की बात है। सेंटर फॉर साइंस ऐंड एनवायरनमेंट (सीएसई) के तत्कालीन निदेशक अनिल अग्रवाल अपनी मारुति 800 चला रहे थे। हम बीकानेर में एक चरागाह को हरा-भरा किए जाने की पहल देखने जा रहे थे। अचानक रास्ते में अग्रवाल को कुछ अलग चीज नजर आई और उन्होंने कार रोक दी। वह उस अनूठी चीज के बारे में जानना चाहते थे।  वह जमीन पर उभरी हुई एक उडऩतश्तरी जैसी चीज थी। हमने लोगों से उसके बारे में पूछा। स्थानीय लोगों ने कहा था, 'यह हमारी जल प्रणाली कुंडी है।' जब हम नहीं समझ पाए तो उन्होंने फिर कहा, 'हम जमीन को चूना पत्थर से पक्का कर देते हैं और उसे एक नाली की शक्ल दे देते हैं। जब भी थोड़ी-बहुत बारिश होती है तो सारा पानी उस नाली के जरिये कुएं में पहुंचा दिया जाता है। कुएं के ऊपरी हिस्से को ढक दिया जाता है ताकि उसमें गंदगी न जाए।' उन लोगों के इस जवाब ने हमारी दुनिया ही बदल दी। 
 
अग्रवाल ने अंदाजा लगाया कि इस जल संरक्षण प्रणाली में काफी संभावनाएं हैं। रेगिस्तानी इलाके में अमूमन 100 मिलीमीटर बारिश ही होती है लेकिन उतनी बारिश से भी इस प्रणाली की मदद से एक हेक्टेयर जमीन में 10 लाख लीटर पानी बचाया जा सकता है। यह कोई छोटी मात्रा नहीं है। पांच लोगों के एक परिवार को खाना बनाने एवं पीने के लिए प्रतिदिन 10-15 लीटर से अधिक पानी की जरूरत नहीं होती है। इस तरह साल भर में एक परिवार को 4,000-5,000 लीटर पानी चाहिए होता है। इसका मतलब है कि एक हेक्टेयर जमीन में हुई बारिश के पानी को अगर जमा किया जाए तो उससे 200-300 परिवारों की जरूरत पूरी हो सकती है। 
 
बाद के कुछ अनुभवों से रेनवाटर हार्वेस्टिंग की संभावनाओं और हमारे जीवन पर उसके असर को लेकर मेरी समझ बढ़ी। हम दुनिया में सबसे ज्यादा बारिश वाली जगहों में शुमार चेरापूंजी के एक गेस्ट हाउस में रुके थे। वहां पर हमने 'पानी मूल्यवान है, कृपया इसका सावधानी से इस्तेमाल करें' का संदेश देखा था। यह अपने आप में अद्भुत बात थी। साल भर में 14,000 मिलीमीटर बारिश वाली जगह में भी क्या पानी की कमी का खतरा है? अनिल और मैं कुछ दिन पहले जैसलमेर से लौटे थे। जैसलमेर में सालाना 50-100 मिलीमीटर बारिश होने के बावजूद वहां एक मुकम्मल शहर आबाद है। हमें जैसलमेर में बारिश का पानी बचाने के तरीके के रूप में इसका जवाब मिला। उस जगह छतों से लेकर टैंकों तक का निर्माण इस तरह किया गया है कि पानी बचाकर रखा जाए।
 
अनिल अग्रवाल को यह बात इतनी पसंद आई कि वह अगले कुछ वर्षों तक बारिश की हर बूंद की अहमियत समझाते रहे। हमने 1997 में प्रकाशित किताब 'डाइंग विज्डम: राइज, फॉल ऐंड पोटेंशियल ऑफ इंडियाज ट्रेडिशनल वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम्स' में अपने इस सबक को संकलित किया। यह किताब इस ज्ञान से जुड़ी जटिलता, नवाचार और चतुराई बयां करती है। देश के हरेक इलाके में बारिश के पानी को जमा करने और उसके इस्तेमाल के अपने अलग तरीके थे। हरेक जल संचय प्रणाली को अलग-अलग पारिस्थितिकीय जरूरतों के हिसाब से ढाला गया था लेकिन हर प्रणाली अपने-आप में इंजीनियरिंग का नमूना थी। उसे अपने इलाके की बारिश के बेहतर इस्तेमाल के लिए बनाया गया था।
 
सवाल है कि यह परंपरागत समझ खत्म कैसे हो गई? पहली बात, पानी पहुंचाने का जिम्मा सरकार ने स्थानीय समुदाय या परिवारों से छीनकर खुद पर ले लिया। इससे बारिश का पानी जमा करना किसी समुदाय के लिए प्राथमिकता नहीं रह गया। दूसरी बात, बारिश के पानी से रिचार्ज होने वाले भूमिगत जल की जगह दूर से नहरों के जरिये लाए जाने वाले भूजल ने ले ली।  यही वजह है कि बारिश का पानी बचाना अब भी एक ऐसा विचार है जिसका वक्त अभी नहीं आया है। सरकार इस पानी को जमा कर नहीं कर सकती है, इसमें लोगों को भी शामिल होना पड़ेगा। हरेक घर, कॉलोनी, गांव और बस्ती में इस पानी को बचाकर रखना होगा। इसके लिए हम तभी प्रोत्साहित होंगे जब हम अपनी जरूरतों की पूर्ति के लिए भूमिगत जल पर निर्भर होंगे। अगर शहरों और गांवों में भी लोगों को दूरदराज से पाइप से लाया गया पानी मिलता रहेगा तो लोग बारिश के पानी को क्यों बचाएंगे और जमा करेंगे?
 
दूसरी समस्या यह है कि हमने जमीन पर गिरने वाली बारिश का पानी सहेजने के विज्ञान एवं कला को नहीं समझा है। बारिश का पानी जिस जमीन पर गिरता है वह या तो कब्जे में है या उसे भूमि-सुधार के क्रम में बांट दिया गया है। इस पानी को भूमिगत भंडार तक ले जाने के लिए जरूरी नालियां भी बरबाद हो चुकी हैं। फिर हम बारिश की बूंदों को कैसे बचा पाएंगे?  हम ऐसा नहीं कर सकते हैं और न ही करेंगे। यही कारण है कि सूखे एवं बाढ़ का दुष्चक्र चलता रहेगा और उसमें तेजी ही आएगी। ऐसे में हमें जल संरक्षण की उस परंपरागत समझ से सीखना चाहिए जिसे हम अब तक नजरअंदाज करते आए हैं। 
Keyword: water, crises, drought,,
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