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इसरो और संसाधन

संपादकीय /  July 15, 2019

चंद्रयान-2 को उसकी उड़ान के बमुश्किल एक घंटे पहले स्थगित किए जाने का अर्थ यही है कि भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) की चंद्रमा पर खोज की योजना में और देरी होगी। यह सातवां अवसर है जब इस अभियान को टाला गया है और अब यह अपने निर्धारित समय से छह वर्ष पीछे हो चुका है।  इस देरी तथा इससे पूर्व जीएसएलवी शृंखला के लिए क्रायोजेनिक इंजन जैसे अहम तकनीकी विकास में होने वाली देरी की वजह संसाधनों की कमी है। इससे पता चलता है कि हमारे  नीति निर्माताओं की प्राथमिकता कितनी अलग है। अक्सर गर्व के साथ यह दावा किया जाता है कि इसरो सबसे मितव्ययी अंतरिक्ष एजेंसी है जो अपने प्रतिस्पर्धियों की तुलना में अत्यंत कम बजट से काम चलाती है। देश के नीति निर्माता इसे ऐसे केंद्र के रूप में देखते हैं जो देश की सॉफ्ट पावर की कमी पूरी करती है। इसे उसी मुताबिक बजट आवंटित किया जाता है। वर्ष 2019-20 में इस एजेंसी को 11,538 करोड़ रुपये का बजट मिलेगा। 

 
चंद्रयान-2 अभियान की लागत 1,000 करोड़ रुपये से कुछ कम होगी। यह राशि इजरायल के विफल अभियान के सातवें हिस्से के बराबर है। इजरायली अभियान के लक्ष्य भी लगभग समान थे। इस रुख की समीक्षा करने की आवश्यकता है। इसरो ने देश के संचार और नेविगेशन तंत्र तथा मौसम के पूर्वानुमान में बहुत अहम योगदान किया है। यह न केवल नवीकरणीय ऊर्जा, सड़क डिजाइन और जल संरक्षण में योगदान कर सकता है बल्कि यह वैश्विक उपग्रह बाजार में अधिक आक्रामक प्रतिस्पर्धा के साथ भारी मात्रा में राजस्व अर्जित करने का माध्यम भी बन सकता है। इसरो को संभावित मुनाफे के केंद्र के रूप में देखा जाना चाहिए जो अपनी लागत के अलावा आय भी अर्जित कर सकता है। उस लिहाज से देखें तो इसे न केवल ज्यादा बजट संसाधन मिलने चाहिए बल्कि इसे अन्य सरकारी इकाइयों की तरह बाजार से फंड जुटाने की भी अनुमति मिलनी चाहिए। पूर्व में इसरो वाणिज्यिक शाखा एंट्रिक्स की सहायता से इसरो के शोध एवं विकास कौशल का मौद्रिक लाभ लेने की कोशिश विफल रही थी। देवास सौदे के बाद यह विवादों में घिर गई थी। ऐसे में इसरो के शोध एवं विकास का लाभ उठाने, बाजार उपग्रह प्रक्षेपित करने आदि के लिए न्यू स्पेस इंडिया लिमिटेड (एनएसआईएल) के रूप में सरकारी उपक्रम का गठन स्वागत की बात है। एनएसआईएल छोटे उपग्रहों की तकनीक उद्योग जगत को हस्तांतरित करने, संयुक्त उपक्रम बनाकर स्मॉल सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल का निर्माण करने और पोलर सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल के निर्माण का काम कर सकता है। आदर्श स्थिति में एनएसआईएल अन्य लाभकारी क्षेत्रों को भी चिह्नित कर सकता है।
 
चंद्रयान के एजेंडे में चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर उतर कर रोबोटिक रोवर की मदद से खोजबीन शामिल है। अगर 14 जुलाई को सकुशल प्रक्षेपण हो जाता तो 6-7 सितंबर को यान चंद्रमा की सतह पर उतरता। बहरहाल, इसरो ने समझदारीपूर्वक कहा है कि तकनीकी समस्या दूर किए बिना वह नई तारीख की घोषणा नहीं करेगा। ऐसे जटिल अभियानों में तकनीकी गड़बडिय़ों से देरी अस्वाभाविक नहीं है। पोकरण-2 के बाद लगे प्रतिबंधों के पश्चात जीएसएलवी के लिए क्रायोजेनिक इंजन बनाने में भी काफी देरी हुई थी। इसरो का भविष्य में चंद्रमा पर मानव सहित यान भेजने का अभियान और जटिल समस्याओं को सुलझाकर सफल होगा ताकि उच्च विकिरण और अलग गुरुत्व वाले माहौल में मनुष्य स्वस्थ रह सके। इसमें भी काफी समय लगेगा और वह बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं, खाने-पीने के संरक्षण और पुनर्चक्रण तकनीक जैसे लाभ हमारे सामने ला सकता है। देश में मौजूद जरूरी कौशल को देखते हुए अगर इसरो को और अधिक संसाधन दिए जाएं तो अंतरिक्ष संबंधी शोध एवं विकास की गति बढ़ाई जा सकती है। तकनीक का तेज विकास आत्म निर्भर बनने में भी मदद करेगा। 
Keyword: ISRo, moon, chandrayan,,
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