बिजनेस स्टैंडर्ड - देरी से कर भुगतान पर बजट में राहत
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देरी से कर भुगतान पर बजट में राहत

इंदिवजल धस्माना / नई दिल्ली July 14, 2019

निर्धारित तिथि के बाद वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) का भुगतान करने वालों को बजट में राहत दी गई है। वित्त विधेयक में प्रस्ताव है कि भुगतान में देरी पर ब्याज शुद्ध भुगतान के आधार पर किया जाएगा। सकल कर देनदारी में इनपुट टैक्स क्रेडिट (आईटीसी) भी शामिल होता है, जिसका इस्तेमाल करदाता अगली कर देनदारी के लिए करते हैं, जबकि शुद्ध कर में यह हिस्सा शामिल नहीं किया जाता है। इस मकसद के लिए बजट में केंद्रीय जीएसटी अधिनियम में संशोधन का प्रस्ताव किया गया है। भुगतान में देरी करने पर 18 प्रतिशत ब्याज लगाया जाता है। 
 
दरअसल पिछले साल 21 दिसंबर को अपनी 31वीं बैठक में जीएसटी परिषद ने फैसला किया था कि शुद्ध भुगतान के आधार पर ब्याज लगाया जाएगा। यह भ्रम तब सामने आया था, जब हैदराबाद के केंद्रीय कर के मुख्य आयुक्त ने इस साल फरवरी में कहा, 'इलेक्ट्रॉनिक क्रेडिट लेजर में आईटीसी/क्रेडिट बैलेंस को कर भुगतान के रूप में नहीं माना जा सकता है, जब तक कि कहे गए क्रेडिट लेजर में वह न आ गया हो। रिटर्न दाखिल करते समय वह देनदारी लेजर में होता है, ऐसे में ब्याज की देनदारी पूरी राशि पर बनती है, जिसका भुगतान नियत तिथि तक नहीं किया गया है।' 
 
इस आदेश की व्याख्या इस तरह से हुई कि जीएसटी की कुल राशि पर ब्याज का भुगतान करना होगा, भले ही वह इनपुट टैक्स क्रेडिट की राशि है। इसके अलावा तेलंगाना उच्च न्यायालय ने इस सला अप्रैल मेंं आईटीसी सहित कुल वस्तु एवं सेवा कर की देनदारी पर ब्याज लगाने को चुनौती देने वाली रिट याचिका खारिज कर दी थी।  न्यायालय ने कहा था, 'कर अधिकारियों द्वारा आईटीसी वाले हिस्से पर ब्याज लगाए जाने में कोई त्रुटि नहीं है। इसलिए रिट याचिका खारिज की जाती है।'  बहरहाल वित्त विधेयक ने इस मामले में अब स्थिति साफ कर दी है।
 
इसमें कहा गया है, '(ब्याज) कर के उस हिस्से पर लगाया जाएगा, जिसका भुगतान इलेक्ट्रॉनिक कैश लेजर में डेबिट करके होता है।'  खेतान ऐंड कंपनी में पार्टनर अभिषेक रस्तोगी ने कहा कि यह बड़ी राहत है और इससे ब्याज का बोझ कम होगा। रस्तोगी ने कहा, 'उद्योग जगत की ओर से मांग थी कि ब्याज की देनदारी कैश लेजर के मुताबिक होना चाहिए और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इसका समाधान कर दिया है।'  उद्योग जगत के तमाम लोगों ने जीएसटी परिषद से अनुरोध किया था कि इस सिलसिले मेंं स्थिति साफ की जानी चाहिए। 
 
फेडरेशन आफ ऑटोमोबाइल डीलर्स एसोसिएशन (फाडा) ने परिषद से अनुरोध किया था कि इससे ऑटो डीलरों को होने वाली दिक्कतों पर ध्यान देना चाहिए क्योंकि शुद्ध आईटीसी के बजाय सकल मूल्य पर ब्याज देना पड़ता है, जब वे जीएसटी का मासिक भुगतान करते हैं।  फाडा के अध्यक्ष आशीष हर्षराज काले ने कहा था कि एफएडीए के तमाम सदस्य परिवार द्वारा चलाए जाने वाले व्यवसाय करते हैं, जो छोटे और मझोले कस्बों में काम कर रहे हैं और उन्हें जीएसटी अनुपालन या रिटर्न में परेशानी हो रही है। परिषद को इस संगठन ने लिखा था कि ऑटो रिटेल कारोबार की प्रकृति ऐसी है कि इसमेंं कारोबार का टर्नओवर और इनपुट टैक्स क्रेडिट बहुत ज्यादा होता है।  नियत तिथि के बाद फॉर्म जमा करने पर ब्याज लगाया जाता है। 
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