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देश की प्रतिरक्षा बतर्ज मेरा जूता है जापानी!

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  July 14, 2019

तीन बातों ने इस सप्ताह की विचार प्रक्रिया को प्रभावित किया है:

 
सामरिक समुदाय रक्षा बजट में इजाफा न होने के कारण व्यापक तौर पर हताश है।
 
द प्रिंट के सृजन शुक्ल को दिए साक्षात्कार में अमेरिकी सामरिक विद्वान क्रिस्टाइन फेयर ने कहा कि लश्कर-ए-तैयबा केवल एक और आतंकी संगठन नहीं बल्कि पाकिस्तानी सेना का एक कम खर्च वाला दस्ता है। इसका लक्ष्य ऐसी असंगत लड़ाई छेडऩा है जिसका मुकाबला भारत नहीं कर सकता। उन्होंने यह भी कहा कि भारत अल्पकालिक लड़ाई में पाकिस्तान को नहीं हरा सकता।
 
वायुसेना के दिवंगत कमांडर जसजीत सिंह ने अपनी किताब में कुछ दिलचस्प बातें लिखी हैं। मसलन कैसे भारतीय वायुसेना ने इजरायली इंजीनियरों को अपने पुराने फ्रांसीसी मिराज विमानों में बदलाव की अनुमति दी ताकि उन्हें रूसी आर-73 हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइल ढोने लायक बनाया जा सके। ऐसा इसलिए क्योंकि मिराज की मूल मात्रा 530-डी मिसाइल बेकार हो चुकी थीं।
 
यह पूरा वाकया मशहूर गीतकार शैलेंद्र के लिखे उस शानदार गीत की याद दिलाता है जो उन्होंने राजकपूर की फिल्म श्री 420 के लिए लिखा था: मेरा जूता है जापानी / ये पतलून इंगलिस्तानी / सर पे लाल टोपी रूसी / फिर भी दिल है हिंदुस्तानी।  ये पंक्तियां सन 1955 में एक नए बने देश के लिए थीं। परंतु 65 वर्ष बाद भी यह देश के सशस्त्र बलों की स्थिति स्पष्ट करने के लिए पर्याप्त है। सबसे पहले बात करते हैं बजट बनाम जीडीपी के मुद्दे का। इस वर्ष का रक्षा बजट पेंशन समेत 4.31 लाख करोड़ रुपये का है। यह राशि जीडीपी के 2 फीसदी के बराबर है। अगर पेंशन को निकाल दिया जाए तो यह राशि 3.18 लाख करोड़ रुपये यानी जीडीपी के 1.5 फीसदी के बराबर रह जाती है। यहां दो सवाल उत्पन्न होते हैं: क्या भारत इतनी कम राशि में अपना बचाव कर सकता है? और क्या भारत इससे अधिक रक्षा बजट का प्रावधान कर सकता है? तात्कालिक प्रतिक्रिया में पहले सवाल का तात्कालिक जवाब है न, लेकिन दूसरे का जवाब हां है। स्पष्टीकरण: कुछ समय पहले तक शायद मैं भी यही कहता लेकिन मैं गलत था। रणनीतिक क्षेत्र से जुड़ी बहस में जीडीपी और राष्ट्रीय बजट के बीच हमेशा अंतर नहीं किया जाता। बजट सरकार का है, जीडीपी नहीं। रक्षा व्यय पर और करीबी नजर डालने का सही तरीका है राष्ट्रीय बजट का प्रतिशत।
 
करीब 23 फीसदी की ऋण अदायगी के बाद 15.5 फीसदी के साथ यह बजट का दूसरा सबसे बड़ा हिस्सेदार है। यह कृषि, ग्रामीण विकास, शिक्षा और स्वास्थ्य के समेकित 15.1 फीसदी के आंकड़े से भी ज्यादा है। जीडीपी का और आधा फीसदी या कुल बजट का 3.5 फीसदी, केंद्रीय अर्धसैनिक बलों पर व्यय किया जाता है। ऐसे में कोई भी वित्त मंत्री  रक्षा के लिए अतिरिक्त बजट कहां से लाएगा?  हमारे डेटा पत्रकार साथी अभिषेक मिश्रा ने सन 1986 से अब तक के रक्षा बजट के आंकड़े जुटाए। इसके मुताबिक जिस समय राजीव गांधी सैन्य विस्तार पर जोर दे रहे थे उस वक्त  रक्षा बजट जीडीपी के 4 फीसदी तक पहुंचा था। यही वह दौर था जब मिराज विमानों का देश में आगमन शुरू हुआ। तब से बजट में निरंतर, स्थिर और पारंपरिक तरीके से वृद्धि हुई है और यह औसतन जीडीपी के 2.82 फीसदी के बराबर रहा (विश्व बैंक के आंकड़े)। सन 1991 के सुधार के बाद जीडीपी आंकड़ों में तेजी आनी शुरू हुई। 
 
बीते दो दशक में करगिल की जंग के बाद बजट में औसतन सालाना 8.91 फीसदी की वृद्धि हुई। आप चीख चिल्ला सकते हैं, शिकायत कर सकते हैं लेकिन अब यह स्पष्ट है कि कोई भी सरकार इतनी गैरजवाबदेह नहीं हो सकती है कि वह रक्षा व्यय में इजाफा करने के लिए नए नोट छापे या गरीबों की सब्सिडी कम करे (यह बजट का 6.6 फीसदी है) या फिर कृषि, स्वास्थ्य, शिक्षा या ग्रामीण विकास के बजट में कटौती करे। यह धारणा गलत और अनुचित थी कि अधिक ताकतवर मोदी सरकार कुछ नाटकीय करेगी। मोदी मूर्ख या लापरवाह सैन्यवादी नहीं हैं। मजबूत रणनीतिक रुख का यह मतलब नहीं कि वह देश को पाकिस्तान की तरह राष्ट्रीय सुरक्षा वाले मुल्क में बदल दें जो अपने खर्च के लिए आईएमएफ का मोहताज है। 
 
देश की रणनीतिक बहस को नई हकीकत के मुताबिक ढालना होगा। हमें देखना होगा कि क्या व्यावहारिक है। अगर 2024 में जीडीपी का आकार 5 लाख करोड़ डॉलर हो जाता है तो रक्षा बजट करीब दो फीसदी रहेगा। ऐसे में बहस इस बात पर होनी चाहिए कि इस राशि से देश की किस हद तक रक्षा-सुरक्षा की जा सकेगी। मौजूदा सैन्य स्तर पर देखा जाए तो लंबी लड़ाई की स्थिति में हमारा देश पाकिस्तान से बहुत बेहतर स्थिति में है लेकिन फिलहाल लड़ाई के हालात नहीं हैं। याद रहे सन 1965 और 1971 की पिछली दो लड़ाइयां भी बमुश्किल 22 और 13 दिन चलीं। परंतु क्रिस्टीन फेयर का यह कहना भी सही है कि आज भारत अल्पकालिक लड़ाई में पाकिस्तान को नहीं हरा सकता। हमें यह सवाल उठाने की आवश्यकता है कि क्या भारत के पास यह क्षमता है कि वह पुलवामा जैसी कुटिल और असमान लड़ाइयों की स्थिति में वह पाकिस्तान को प्रतिरोधात्मक सबक सिखा सके, वह भी बिना भारतीयों की जान जोखिम में डाले। बालाकोट और उसके अगले दिन जो कुछ हुआ वह बताता है कि हमें फिलहाल ऐसी कोई बढ़त हासिल नहीं है। यह सही है कि लंबी लड़ाई में वायुसेना का कौशल निर्णायक साबित होगा लेकिन हमारे रक्षा बजट के सातवें हिस्से के बराबर रक्षा बजट और हमारे विदेशी मुद्रा भंडार के बमुश्किल 3 फीसदी मुद्रा भंडार वाला देश अपनी मर्जी के चुने समय में हमें शिकस्त क्यों दे? यहां फिर वही सवाल आता है कि क्या हम अपने रक्षा बजट को सही तरीके से खर्च कर रहे हैं?
 
हमारी दो प्राथमिक सामरिक जरूरतें हैं: चीन के खिलाफ मजबूत बचाव जो उसे किसी तरह के भौगोलिक दुस्साहस न करने दे और पाकिस्तान बिना किसी भय की आशंका के बेमेल लड़ाइयां छेडऩे से रोकना। दो मोर्चों पर जंग असंभव तो नहीं लेकिन इसकी संभावना कम है। भारत तीनों परमाणु हथियार संपन्न देशों के बीच अपना बचाव करने सक्षम है। कोई भी देश लंबी लड़ाई में अगर हारता है तो वह दूसरे को भी डुबाएगा। दो मोर्चों पर लड़ाई के सोच से बाहर निकलना होगा। बल्कि हमें स्पष्ट नजर आ रही हकीकत पर ध्यान देना होगा। 
 
फिलहाल हमारी वायु सेना या थल सेना के पास पाकिस्तान के खिलाफ उक्त दंडात्मक प्रतिरोध मौजूद नहीं है। तीन सप्ताह की लड़ाई की बात तो छोड़ दें, नियंत्रण रेखा पर भी पाकिस्तान ने अब तक हमसे बेहतर हथियार, बॉडी आर्मर, स्नाइपर राइफल और गोला-बारूद तैनात कर रहा है। संप्रग के 10 वर्ष के कार्यकाल में हमने जो लापरवाही बरती और जो असंतुलन आया वह 26-27 फरवरी को उजागर हो गया। केवल हमारी नौसेना को ही आज पाकिस्तान पर निर्णायक बढ़त हासिल है। परंतु सेना का दंडात्मक इस्तेमाल शेष विश्व के लिए जरूरी जलमार्गों को असंतुलित कर सकता है। 4.31 लाख करोड़ रुपये के रक्षा व्यय में 1.12 लाख करोड़ रुपये पेंशन के मद में जाते हैं। इसके बाद तीनों सेनाओं के वेतन में 1.08 लाख करोड़ रुपये व्यय होते हैं। इसमें डीआरडीओ और असैन्य व्यय शामिल नहीं है। एक लाख करोड़ रुपये की राशि अन्य तयशुदा खर्च, रखरखाव आदि में लगते हैं। इसके बाद कुछ सौ करोड़ रुपये की राशि बचती है जो वेतन भत्तों की राशि से भी कम है। यही कारण है कि तीनों सेनाओं का आधुनिकीकरण नहीं हो पा रहा है और उन्हें जैसे-तैसे काम चलाना पड़ रहा है। हम सब जानते हैं कि आखिर मायने यही रखता है कि मशीन के पीछे कौन खड़ा है, क्योंकि ...फिर भी दिल है हिंदुस्तानी।
 
महाशक्ति बनने के आकांक्षी देश को कहीं बेहतर की जरूरत है। अगर हम ज्यादा नहीं खर्च कर सकते तो हमें समझदारीपूर्वक खर्च करना होगा। हम वेतन और पेंशन में कमी नहीं कर सकते, बल्कि हमारे जवानों को और अधिक की आवश्यकता है। परंतु क्या हमें पूर्णकालिक स्तर पर इतने अधिक सैनिक चाहिए? हमें सेना को छोटा, फुर्तीला और आक्रामक बनाने की जरूरत है। हमें अल्पकालिक सेवा और अमेरिका के क्लाइन अमेरिकन आरओटीसी (रिजर्व ऑफिसर्स ट्रेनिंग कोर) जैसे नए विचारों पर काम करना होगा। इस दिशा में कुछ पहल भी हो रही है क्योंकि मौजूदा सरकार संप्रग की तरह बदलाव को लेकर शंकित नहीं है। हमें सैद्धांतिक बदलाव की जरूरत है। रणनीतिकारों को भी अतीत की जंगों को भुला देना चाहिए। 
Keyword: india, pakistan, air force, army,,
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