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छप्परफाड़ कमाई का वादा, ठगी का है इरादा

संजय कुमार सिंह /  07 14, 2019

फर्जी जमा योजनाओं में निवेशकों की गाढ़ी कमाई डूबने की खबरें आए दिन आती रहती हैं। सारदा, रोज वैली, पीएसीएल जैसी कंपनियों ने पिछले कुछ साल में एक के बाद एक घोटाले किए, जिनमें हजारों निवेशकों को अपनी जिंदगी भर की बचत गंवानी पड़ी। हाल ही में ऐसा एक और मामला सामने आया, जब बेंगलूरु की आई मॉनिटरी एडवाइजरी (आईएमए) की जमा योजना में घोटाला हुआ।

 
पोंजी योजना की शुरुआत
 
आईएमए (या पहले हैदराबाद के हीरा समूह) जैसी पोंजी योजनाएं पहले से ज्यादा शातिर होती जा रही हैं। इन समूहों के पास कुछ आरंभिक पूंजी होती है, जिसके दम पर ये कई तरह के कारोबार शुरू कर देते हैं। आईएमए ने आभूषण स्टोर खोले थे और उसके पास एक रियल एस्टेट कंपनी तथा फार्मेसी कारोबार भी था। बेंगलूरु में उसकी कई बड़ी-बड़ी इमारतें थीं, जिनमें कई कंपनियों के दफ्तर थे। लोगों को लगता था कि यह कंपनी एकदम कानूनी तरीके से कारोबार कर रही है। बेंगलूरु में कुछ साल पहले जब उसने आभूषण स्टोर खोला तो सफल कारोबारी समूह के तौर पर उसकी साख और भी मजबूत हो गई। आईएमए की जमा योजना में करीब चार साल पहले तेजी आने लगी। मगर अब दिन बदल चुके हैं और कर्नाटक में करीब 50,000 लोग आईएमए के खिलाफ शिकायत दर्ज करा चुके हैं। माना जा रहा है कि निवेशकों की संख्या इससे बहुत अधिक है।
 
ऊंचे प्रतिफल के वायदे से ठगी
 
जब आईएमए ने जमा योजना शुरू की तो शुरुआत में उसने निवेशकों को 6 फीसदी महीने का प्रतिफल दिया। पिछले दो-तीन साल से यह कंपनी जमा योजना पर करीब 3 फीसदी मासिक प्रतिफल दे रही थी। कई निवेशकों ने अपनी संपत्तियां बेच दीं और इस योजना में पैसा लगा दिया। उन्होंने अपने परिजनों और करीबी लोगों को भी इसमें रकम लगाने की सलाह देना शुरू कर दिया। आईएमए अपनी आभूषण की दुकानों में लॉकर की सुविधा भी देती थी। जिन लोगों ने लॉकर लिए थे और अपना कीमती सामान उनमें रख दिया था, उनका सामान वापस मिलने की संभावना भी बहुत कम है। कंपनी के प्रवर्तक ने हाल ही में एक वीडियो पोस्ट किया था, जिसमें उसने कहा था कि वह खुदकुशी करने जा रहा है। माना जा रहा है कि वह पश्चिम एशिया भाग गया है।
 
पोंजी योजना का कैसे लगाएं पता
 
अगर छप्परफाड़ यानी बहुत अधिक प्रतिफल का वादा किया जा रहा है तो पोंजी योजना होने का सबसे बड़ा इशारा है। बेंगलूरु में क्राइस्ट यूनिवर्सिटी में संपत्ति प्रबंधन पर व्याख्याता एसजी राजा शेखरन कहते हैं, 'बैंक बचत खाते पर साल भर में 3 से 6 फीसदी प्रतिफल मिलता है। अगर कोई योजना हर महीने 3 फीसदी प्रतिफल देने की बात कहे तो निवेशक के कान खड़े हो जाने चाहिए।' दूसरी बात, निवेशकों को पूछना चाहिए कि प्रवर्तक जितना वादा कर रहे हैं, उतना ज्यादा प्रतिफल आखिर कहां से लाएंगे। क्या उनके कारोबार से लगातार इतना अधिक प्रतिफल मिलता है? सेबी में पंजीकृत निवेश सलाहकार और फिडुशियरीज के संस्थापक अविनाश लूथरिया आगाह करते हैं, 'कोई भी कारोबारी योजना अगर अपारदर्शी है तो उसमें जोखिम हो सकता है।' आईएमए के प्रवर्तक का दावा था कि उसे सोने में कारोबार करने का एक गुप्त गणित उसके पास है। लेकिन पिछले कई साल से सोने पर बहुत खराब प्रतिफल मिलता आया है। प्रवर्तक ने यह दावा भी किया कि वह सोने का इंट्राडे कारेाबार करता है। बाजार को थोड़ा बहुत समझने वाला भी जानता है कि सोने की कीमतें एक दिन के कारोबार में इतनी ऊपर-नीचे नहीं जातीं कि उनसे तगड़ा प्रतिफल हासिल हो जाए। इसलिए निवेशक को योजना के साथ जुड़े कारोबारी मॉडल की बारीकी से पड़ताल करनी चाहिए और जरा भी शुबहा होने पर हाथ खींच लेने चाहिए।
 
अकसर लोग पंजीकृत और नियमित इकाइयों में फर्क नहीं कर पाते। आईएमए ने यह बात जोर-शोर से कही कि कंपनी पंजीयक के पास उसने सीमित देनदारी वाली साझेदारी (एलएलपी) के रूप में पंजीकरण कराया है। लेकिन इसकी वजह से उसकी जमा योजना नियमित योजना नहीं हो जाती है। निवेशकों को यह भी मालूम करना चाहिए कि धना जुटाने वाली इकाई या योजना किस तरह की है। भारत सरकार की शर्तों के मुताबिक किसी भी प्राइवेट लिमिटेड कंपनी में 200 से ज्यादा शेयरधारक नहीं हो सकते। सेबी से मंजूरी प्राप्त वैकल्पिक निवेश फंड (एआईएफ) माउंट जूडी वेंचर्स के प्रिंसिपल अली शरीफ बताते हैं, 'स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्घ पब्लिक लिमिटेड कंपनी ही जनता से रकम जुटा सकती है। यदि कोई निजी कंपनी रकम के लिए आम जनता के पास जा रही है तो खबरदार हो जाइए।' प्रवर्तक का इतिहास खंगालिए। हीरा गोल्ड की प्रवर्तक अशिक्षित महिला थी, जिसने झूठ बोलते हुए अपने नाम से पहले डॉक्टर लगा रखा था। अगर आपको प्रवर्तक के पिछले जीवन में कुछ भी खास नहीं मिलता है तो आपको सावधान हो जाना चाहिए।
 
जब ये योजनाएं शुरू होती हैं तो निवेशकों को थोड़े समय के बाद ही रकम निकालने की इजाजत मिल जाती है। इस तरह लोग योजनाओं पर भरोसा करना शुरू कर देते हैं। लेकिन समय बीतने के साथ और नई योजनाएं आने के साथ ही प्रवर्तक निकासी की शर्तों को और भी सख्त बनाते जाते हैं। यह आपके लिए जोखिम का इशारा है। अंत में इन अनियमित जमा योजनाओं में कागजी कामकाज बहुत घटिया होता है। म्युचुअल फंड और बीमा कंपनियों जैसी नियमित इकाइयां अपने निवेशकों को ढेर सारी चि_ियां और ईमेल आदि भेजती हैं। पोर्टफोलियो प्रबंधन योजनाएं, म्युचुअल फंड और वैकल्पिक निवेश फंड निवेशकों और नियामकों को अपने प्रतिफल की जानकारी नियमित रूप से देते हैं। लेकिन फर्जीवाड़े वाली योजनाओं में आम तौर पर यह सब नहीं किया जाता।
 
विशेषज्ञों की सलाह है कि निवेशक या तो सरकार के पास जा सकते हैं या वे भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) जैसी नियामक संस्थाओं का दरवाजा खटखटा सकते हैं। सरकार धन जुटाने वाली अवैध योजनाओं के प्रवर्तकों पर अपनी कानून-प्रवर्तन एजेंसियों के जरिये कार्रवाइ कर सकती है। आईएमए के मामले में कर्नाटक सरकार ने एक विशेष जांच दल (एसआईटी) बना दिया है। खेतान ऐंड कंपनी में पार्टनर अतुल पांडेय बताते हैं, 'सेबी के पास ऐसी अनियमित सामूहिक निवेश योजनाओं का नियमन करने या उनके खिलाफ कार्रवाई करने का अधिकार है, जिनमें 100 करोड़ रुपये या उससे अधिक की राशि जुटाई जा रही हो।'
 
नए प्राधिकरण से मिलेगी राहत
 
पोंजी योजनाओं की समस्या से निपटने के लिए राष्ट्रपति ने अनियमित जमा योजनाओं पर प्रतिबंध के अध्यादेश, 2019 को इस वर्ष 21 फरवरी को मंजूरी दे दी। इसके तहत समर्पित वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों को पोंजी योजनाओं से निपटने के लिए 'सक्षम अधिकारी' के रूप में नियुक्त किया जा सकता है। प्राधिकरण को भुगतान में चूक करने वालों (डिफॉल्टर) की संपत्ति अस्थायी रूप से कुर्क करने, लोगों को तलब करने और पूछताछ करने तथा दस्तावेज एवं सबूत मंगाने का आदेश देने का अधिकार मिल गया है। अध्यादेश में निर्धारित क्षेत्रों में एक या अधिक विशेष अदालतें बनाने का प्रावधान है। इसमें 180 दिन की समयसीमा दी गई है, जिसके भीतर सक्षम प्राधिकरण को विशेष जांच दल का गठन करना है, मामले की जांच पूरी करानी है और विशेष अदालत से आदेश प्राप्त करना है। विधि फर्म एमवी किनी ऐंड कंपनी की पार्टनर रानी राज भल्ला को लगता है, 'इन विशेष अदालतों में समाधान तेजी से होने की उम्मीद है।' अध्यादेश में इस बात की भी कल्पना की गई है कि जमा लेने वाली कंपनियों की ऑनलाइन केंद्रीय पंजी तैयार की जाएगी। आखिर में इस अध्यादेश के तहत डिफॉल्टरों को 10 साल तक की कैद और/अथवा 5 करोड़ रुपये तक के जुर्माने की सजा दी जा सकती है।
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Comments
 
Pawan Kumar Chauhan
14-Nov-19
 
कानून बनने के बाद पोन्जी/फर्जी कम्पनियो मे कमी आयेगी
  आपका मत
 क्या ई-वॉलेट से कर भुगतान की सुविधा से बढ़ेगा कर अनुपालन?
हां नहीं  
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