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दूर करें दिक्कतें संपूर्ण विफलता के पहले

श्याम पोनप्पा /  July 12, 2019

इससे पहले कि संपर्क और संचार क्षेत्र में हम पूरी तरह नाकाम हो जाएं, हमें समस्याओं के जमीनी हल तलाश करने की आवश्यकता है। इस विषय में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं श्याम पोनप्पा 

 
देश की व्यापक तस्वीर में सुधार करने के बारे में काफी बातें होती हैं। हमें वास्तव में कुछ जमीनी सफलताओं की आवश्यकता है। भविष्य की सफलताओं की इमारत खड़ी करने के लिए हमें कुछ जमीनी समस्याओं को हल करना होगा। इसके दो उदाहरणों पर हम यहां चर्चा कर रहे हैं। पहला है कारोबारी विफलताओं की पहेली: जेट एयरवेज धीमी गति से ठप होने लगी। वह पहले ही दिवालिया हो चुकी है लेकिन आने वाले दिनों में ऐसी अन्य घटनाएं देखने को मिल सकती हैं। एक समय देश की सबसे रखूखदार विमानन कंपनियों में से एक रही जेट एयरवेज अकारण ही बैठ गई और ऐसा होने दिया गया। इससे 16,000 से अधिक कर्मचारी प्रभावित हुए हैं। कंपनी पर करीब 26,000 करोड़ रुपये की देनदारी है। देनदारों और सरकारी एजेंसियों ने कंपनी को चालू रखने के लिए कार्यकारी कदम क्यों नहीं उठाए, उन्होंने न्यायिक प्रक्रिया की सहायता भी नहीं ली और न ही फाइनैंसिंग का सहारा लिया। क्या वाकई न्यायिक प्रक्रिया निस्तारण को बाधित करती है? कर्जदाता ढुलमुल रह गए, या वे फंसे हुए कर्ज को लेकर मचे हो हल्ले के बीच घबरा गए या फिर अत्यधिक आश्वस्ति इस पतन का कारण बनी? अगर इन सवालों के जवाब तलाशे गए और उचित कदम उठाए गए तो अन्य भारी भरकम फंसे हुए कर्ज के मामलों से निपटने में सहायता मिल सकती है।
 
दूसरा मामला है दूरसंचार क्षेत्र में बीएसएनएल और एमटीएनएल की गड़बडिय़ों का। सन 1990 से एक के बाद एक सरकारों ने बार-बार यह प्रयास किया है कि इन दूरसंचार कंपनियों को गति प्रदान की जाए। इस दौरान उन्हें वास्तव में सफल बनाने वाला कोई काम नहीं किया गया। मिसाल के तौर पर उन्हें स्वतंत्र और हस्तक्षेप मुक्त तथा शक्तिशाली नेतृत्व की आवश्यकता थी जो उन्हें नहीं मिल सका। यही कारण है कि बीएसएनएल का समेकित घाटा करीब 100,000 करोड़ रुपये हो चुका है। यह जेट एयरवेज के घाटे का पांच गुना और एयर इंडिया के मार्च 2018 तक के घाटे का दो गुना है। बुनियादी सेवा क्षेत्र की इन दिक्कतों को दूर करना अहम है क्योंकि इनका रिश्ता सुरक्षा, शिक्षा और स्वास्थ्य, मनोरंजन तथा हमारे काम आदि सभी क्षेत्रों से है। अगर बीएसएनएल और एमटीएनएल चीजों में रचनात्मक बदलाव ला सके तो इन्हें बचाया जा सकता है। 
 
अगर इस हालात से निपटा जा सका तो हमारी क्षमता से जुड़े गहन गतिरोध दूर होंगे और उत्पादकता में सुधार होगा। संचार और संपर्क सामाजिक और आर्थिक क्षमताओं के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं। इन क्षेत्रों को लेकर दशकों से हमारा रुख बहुत गलत रहा है। हमने कभी इसमें जरूरी बदलाव नहीं किए जिसकी परिणति इस प्रकार सामने आई। अब सरकार इस क्षेत्र में करोड़ों की पूंजी डालने जा रही है। इसके अतिरिक्त जमीन और परिसंपत्तियों से भी धन जुटाया जाएगा। 
 
जनहित में क्या है?
 
बीएसएनएल और एमटीएनएल के लिए उचित लक्ष्य तय किए जाने चाहिए। उन्हें आम जनता के किन हितों का ध्यान रखना है? संचार मंत्री ने गृह और रक्षा के साथ बाढ़ या चक्रवात के दौरान आपदा प्रबंधन जैसे नीतिगत क्षेत्रों का जिक्र किया है। इसके अलावा जिन दो क्षेत्रों का इस्तेमाल किया गया उनके पीछे कोई तर्क नहीं है। कहा गया कि वे राष्ट्रीय परिसंपत्ति और मुफ्त सेवाओं के प्रमुख सेवा प्रदाता हैं। वाणिज्यिक संस्थान के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता। स्पेक्ट्रम साझेदारी संबंधी नीतिगत वक्तव्य आने के बाद नियमन इतने सख्त कर दिए गए कि उसका कोई उपयोग ही नहीं रहा। इसके बजाय नीति निर्माताओं को ऐसे लक्ष्य तय करने चाहिए जो वाकई जनहित में हों। 
 
अब तक हमें भ्रामक और परस्पर विरोधाभासी लक्ष्य देखने को मिले हैं। नीलामी शुल्क और अन्य शुल्क के रूप में सरकार ने काफी धन जुटाया, इस बीच उम्मीद यह की गई कि उचित मूल्य में अच्छी सेवा भी मिलेगी। जाहिर है ऐसे विरोधाभासी लक्ष्य हासिल नहीं किए जा सकते। सच तो यह है कि उच्च शासकीय शुल्क के कारण नेटवर्कों के पास फंड की कमी हो जाती है और लागत बढ़ जाती है। 
 
लक्ष्य संबंधी सुझाव
 
इस दिशा में कुछ कदम उठाए जा सकते हैं:
 
संपर्क सबसे अहम लक्ष्य है। आर्थिक और सामाजिक गतिविधियों में प्रमुख शहरों और समूहों की अहम हिस्सेदारी होती है और वे प्राथमिकता में हैं। इनमें से 35 से 50 बहुत तेजी से विकसित हो रहे होंगे। जबकि अगले 50 ऐसे होंगे जिन पर उनके आकार के कारण ध्यान देना होगा।  उदाहरण के लिए स्वीडन 2025 तक 98 फीसदी आबादी को न्यूनतम एक जीबीपीएस, 1.9 फीसदी आबादी को 100 एमबीपीएस और 0.1 फीसदी को 30 एमबीपीएस की इंटरनेट गति देना चाहता है। परंतु हमारे देश के दूरदराज इलाकों में सड़क, पानी और सफाई के साथ अगर संचार सुविधाएं मिलेंगी तो गतिविधियां और समृद्घि बढ़ेंगी। इससे शहरों पर प्रवासियों का दबाव कम होगा। ऐसे में दीर्घावधि का लक्ष्य हर जगह बेहतर संचार मुहैया कराना होना चाहिए।
 
जनहित का ध्यान रखना भी उतना ही आवश्यक है। इसके लिए किफायती दर पर विश्वसनीय और अच्छी सेवा मुहैया करानी चाहिए। सवाल यह नहीं है कि बीएसएनएल और एमटीएनएल को बंद किया जाए या नहीं बल्कि उनका सही पुनर्गठन करने और नये कौशल से लैसे करने की आवश्यकता है ताकि वे रक्षा, सुरक्षा और जनहित की निगरानी में काम कर सकें। 
 
तीसरा, मुफ्त सेवा और अस्थायित्व भरी कीमतों से बाजार को अस्थिर नहीं किया जाना चाहिए। सरकार ने दूरसंचार, विमानन और बिजली क्षेत्र में बार-बार ऐसा किया है। लोगों को बेहतर गुणवत्ता वाली सेवा चाहिए, जो जाहिर है सस्ती दर पर नहीं मिलेगी।
 
चौथा, यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि सेवाओं में क्षमता और गुणवत्ता की कमी न हो ताकि सार्वजनिक संसाधन बरबाद न हों। ऐसा करने से ही खराब सेवाओं से बचा जा सकता है। 
 
अंत में, हमें बुनियादी ढांचे और स्पेक्ट्रम साझेदारी को अपनाना चाहिए। स्वीडन का मॉडल यूरोपीय संघ के साथ भारत के लिए भी अनुकरणीय है। सिंगापुर में कुछ वर्ष पहले तक निजी- सार्वजनिक भागीदारी का मॉडल था जो सिंगटेल द्वारा ओपननेट के अधिग्रहण के बाद समाप्त हुआ। हमें अनिवार्य सक्रिय नेटवर्क साझेदारी की आवश्यकता है जो निजी क्षेत्र के सेवा प्रदाता समूहों द्वारा संचालित हो।  बीएसएनएल और एमटीएनएल इसमें संरक्षक प्रतिभागी हो सकते हैं। स्टॉकहोम की बुनियादी क्षेत्र की आईटी कंपनी स्टॉकैब की एक रिपोर्ट सेवाप्रदाता निरपेक्ष फाइबर और मोबाइल बुनियादी ढांचे के बारे में जानकारी मुहैया कराती है।  संपर्क की समस्या को हल करना फंसे हुए कर्ज या कृषि क्षेत्र की दिक्कतों को दूर करने की तुलना में कहीं अधिक सरल हो सकती है। 
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