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मीडिया और मनोरंजन के बीच का धुंधला होता फर्क

मीडिया मंत्र
वनिता कोहली-खांडेकर /  July 11, 2019

आंकड़े दिमाग चकरा देने वाले हैं और उनका प्रभाव काफी वास्तविक है। मार्च 2018 में गूगल इंडिया ने 9,337 करोड़ रुपये का राजस्व अर्जित किया था जिसने उसे ज़ी समूह, डिज्नी और टाइम्स समूह के बाद भारत की चौथी बड़ी मीडिया कंपनी बना दिया। गूगल के इस राजस्व का बड़ा हिस्सा सर्च एवं डिस्प्ले विज्ञापनों से आया था। अकेले यूट्यूब से 2,000 करोड़ रुपये गूगल ने कमाए थे जिसके बाद यूट्यूब भारत का सबसे बड़ा ओवर-द-टॉप (ओटीटी) प्लेटफॉर्म या मझोले स्तर का ब्रॉडकास्टर बन गया। गूगल और यूट्यूब 137 अरब डॉलर के आकार वाली दुनिया की सबसे बड़ी मीडिया फर्म अल्फाबेट के अंग हैं। अल्फाबेट अमेरिका ही नहीं बल्कि दुनिया भर में डिजिटल विज्ञापन बाजार पर दबदबा रखती है। इसके बाद कॉमकास्ट (94.5 अरब डॉलर) का स्थान आता है और फिर 60 अरब डॉलर के राजस्व के साथ डिज्नी मौजूद है।

 
एक बार फिर भारत का रुख करते हैं। यहां की शीर्ष 15 मीडिया एवं मनोरंजन कंपनियों की सूची पर एक नजर डालते हैं जिनमें गूगल इंडिया भी मौजूद है। इस सूची की दो बातें आपको खासी प्रभावित करेंगी।  पहली, दिग्गज कंपनियों का संयोजन कई तरह की तकनीकों और मीडिया स्वरूपों वाला होता जा रहा है जबकि पहले प्रिंट या टेलीविजन का ही वर्चस्व होता था। ज़ी समूह, डिज्नी, टाइम्स और गूगल के बाद डीटीएच सेवा प्रदाता टाटा स्काई पांचवें स्थान पर है जबकि मल्टीप्लेक्स सिनेमा कंपनी पीवीआर सिनेमाज 11वें स्थान पर है। इस सूची में पीवीआर की मौजूदगी मेरे हिसाब से सबसे प्रशंसनीय बात है क्योंकि लंबे समय से फिल्में हरेक मीडिया संवर्ग का अभिन्न हिस्सा रही हैं लेकिन कभी भी कारोबार के तौर पर उन्हें ऊंचा मुकाम नहीं मिल पाया था। पीवीआर की बढ़त इस बात का पुख्ता संकेत है कि फिल्में भी आखिरकार कारोबार में अहम हो रही हैं, भले ही खुदरा स्तर पर।
 
दूसरी बात और इस लेख का मुख्य बिंदु यह है कि भारत में मीडिया कारोबार कुछ बड़े बदलाव देखने वाला है। डिज्नी ने पिछले साल फॉक्स को खरीदा था जिसके बाद उसे भारत की सबसे बड़ी मीडिया फर्मों में शामिल स्टार का स्वामित्व मिल गया है। ज़ी को जुलाई के अंत तक अपनी 20 फीसदी हिस्सेदारी किसी रणनीतिक या वित्तीय निवेशक के हाथों बेच देनी चाहिए। बहुत लोगों का मानना है कि इस सौदे के जरिये कोई बड़ी वैश्विक कंपनी भारतीय बाजार में आएगी। और फिर तेजी से बढ़ती घरेलू कंपनी रिलायंस जियो भी है जिसका आकार 38,838 करोड़ रुपये का हो चुका है। यह कंपनी अपने आंकड़े साझा नहीं करती है और न ही अपने मीडिया कारोबार के बारे में कोई साक्षात्कार ही देती है। लेकिन जियो वितरण एवं कंटेंट के मोर्चे पर लगातार सक्रिय है। अकेले पिछले साल ही उसने दो केबल वितरण कंपनियों- डेन और हैथवे के अलावा संगीतमय स्ट्रीमिंग ऐप सावन में बहुलांश हिस्सेदारी खरीदी है। पहले से ही दूरसंचार पर उसका कब्जा है और उसके पास सस्ता डेटा देने की क्षमता भी है। बाकी कंपनियों के उलट जियो का सभी तरह के डेटा संसाधनों और उसके जरिये प्रसारित हो रहे कंटेंट के भी कुछ हिस्से पर नियंत्रण है।
 
ऐसे में यह तय है कि अगला साल आते-आते 1,67,400 करोड़ रुपये के आकार वाले भारतीय मीडिया एवं मनोरंजन बाजार पर वर्चस्व के लिए चार दिग्गज कंपनियों- ज़ी, जियो, गूगल और डिज्नी के बीच कड़ा मुकाबला होगा। ये कंपनियां कहां पर खड़ी हैं? इन सबने डिजिटल कारोबार में बड़े पैमाने पर निवेश किया है। गूगल और यूट्यूब भले ही राजस्व और ट्रैफिक आंकड़ों के मामले में काफी आगे हैं लेकिन बाकी कंपनियां भी जल्द ही उनकी बराबरी कर सकती हैं। डिज्नी के पास हॉटस्टार और हुलु का स्वामित्व है और इस साल नवंबर में अपना डिज्नी प्लस भी लेकर आने वाली है। जियो असल में डिजिटल जगत की पैदाइशी खिलाड़ी है और उसके पास तमाम ऐप मौजूद हैं। इसके अलावा जियो के पास वूट पेश करने वाली वायकॉम18 में बहुलांश हिस्सेदारी भी है। ज़ी5 भी तगड़े प्रमोशन और मौलिक कार्यक्रमों के बूते दर्शकों का ध्यान आकृष्ट करने में सफल रहा है।
 
भारतीय कंपनियों के पास 'विदेशी' की तुलना में नीतिगत मसलों पर खुलकर अपनी बात रखने की क्षमता होने की बात कही जाती रही है लेकिन भारत में 25 साल पुरानी हो चुकी स्टार इंडिया का अब भी विदेशी कहा जाना बहस का मुद्दा हो सकता है। कमोबेश इनमें से सभी कंपनियों के पास सशक्त उत्पाद हैं और किसी न किसी क्षेत्र में उनका बाजार वर्चस्व भी है। डिज्नी के नियंत्रण वाली स्टार इंडिया सामान्य मनोरंजन क्षेत्र में शीर्ष कंपनी है और उसका प्लेटफॉर्म हॉटस्टार भी यूट्यूब के बाद दूसरा बड़ा ओटीटी है। स्टार की ही तरह ज़ी का छोटे एवं बड़े शहरों में दर्शकों पर समान रूप से दबदबा है। इसके पास डीटीएच कंपनी डिश टीवी और केबल प्रसारक सिटीकेबल भी है जबकि स्टार के पास टाटा स्काई में 20 फीसदी हिस्सेदारी है।
 
हालांकि आने वाले समय में मीडिया कंपनियों का एकीकरण होने के भी आसार हैं। इस लिहाज से सन टीवी और सोनी अधिक संवेदनशील नजर आती हैं। लेकिन भारत में मीडिया नियामक का कोई समुचित ढांचा नहीं होने से कोई भी कंपनी इस हालत में आ सकती है। अमेरिका में संघीय संचार आयोग और ब्रिटेन में ऑफकॉम मीडिया जगत में किसी एक कंपनी के दबदबे पर नजर रखते हैं।
Keyword: media, entertainment,,
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