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बॉन्ड बाजार में दिखते परिपक्वता के संकेत

नीलकंठ मिश्रा /  July 11, 2019

तनाव से निपटने की परीक्षा से गुजरने के बाद बॉन्ड बाजार अब मजबूती हासिल कर रहा है। इस संबंध में विस्तार से जानकारी प्रदान कर रहे हैं नीलकंठ मिश्रा

 
बॉन्ड बाजार को लेकर कितना चिंतित होने की आवश्यकता है? एक ऐसे वित्तीय बाजार में जो क्षमता की कमी से जूझ रहा हो, बॉन्ड बाजार से यही अपेक्षा थी कि वह सरकारी बैंकों की धीमी वृद्धि से रिक्त हुए स्थान की पूर्ति करेगा। इसके अलावा लंबी अवधि की फंडिंग की आर्थिक आवश्यकता को देखते हुए, इसे वित्तीय ढांचे का एक अहम हिस्सा माना जा रहा है। खासतौर पर बुनियादी ढांचा क्षेत्र में इसकी जरूरत ज्यादा है जहां, बैंकों के पंचवर्षीय ऋण अपर्याप्त प्रतीत हो रहे हैं। बहरहाल, बीते नौ महीनों में कई डिफॉल्ट हुए। उनमें से कई तो एएए की सर्वोच्च श्रेणी वाले बॉन्डों में हुए। इससे जोखिम लेने की इच्छाशक्ति कम हुई। उच्च ब्याज दर श्रेणी में ऐसा देखने को मिला। इससे यह चिंता उत्पन्न हुई है कि बॉन्ड बाजार अपनी भूमिका निभा पाएगा या नहीं। 
 
परंतु एक सोच यह भी है कि पिछली तिमाहियों में जो दबाव बना वह वास्तव में तेज वृद्धि के दौर के बाद सुदृढ़ीकरण और परिपक्वता की जरूरी अवधि रही होगी। संभावित वृद्धि के मामले में इसे अभी भी लंबी दूरी तय करनी है। परंतु हालिया तनाव बाजार में कुछ अनिवार्य गुणात्मक बदलावों का वाहक है। मुझे याद है कि कुछ वर्ष पहले जब मैं एक परिचर्चा में शामिल हो रहा था तो एक बड़े बैंक के कॉर्पोरेट ऋण विभाग के प्रमुख इस बात को लेकर सशंकित थे कि वित्तीय बचत बैंकों के बचाय बॉन्ड म्युचुअल फंड में जाएगी तो क्या होगा? उनकी दलील थी कि तेजी से बढ़ता बॉन्ड बाजार डिफॉल्ट के पहले संकेत पर ठप हो जाएगा। उनकी आशंका थी कि ऐसा कोई भी डिफॉल्ट सामने आने पर ऋणमुक्ति का सिलसिला शुरू हो जाएगा और अपेक्षाकृत नकदीकृत बॉन्ड बाजार उससे निपट नहीं पाएगा। बहरहाल बीते नौ महीनों में कई बड़ी कंपनियां डिफॉल्ट हुई हैं। इनमें दो पर तो एक लाख करोड़ रुपये से अधिक की देनदारी थी लेकिन बाजार तो चल रहा है।
 
बॉन्ड म्युचुअल फंड की प्रबंधन अधीन परिसंपत्तियों (एयूएम) में दिसंबर 2017 से गिरावट आने लगी। मौद्रिक नीति समिति के रुख में चौंकाने वाला बदलाव, सरकार द्वारा बॉन्ड जारी करने को लेकर कुछ गलत घोषणाएं और बैंकों के ट्रेजरी विभागों द्वारा बॉन्ड प्रतिफल में तेज इजाफे के बाद खरीदारों की हड़ताल इसकी वजह रही। बॉन्ड म्युचुअल फंड का एयूएम नवंबर 2017 के 8.7 लाख करोड़ रुपये से गिरकर सितंबर 2018 में 7.2 लाख करोड़ रुपये रह गया। दिलचस्प बात है कि बॉन्ड डिफॉल्ट शुरू होने के बाद भी एयूएम में अब तक कोई बदलाव नहीं हुआ है। वहीं ऋणमुक्ति केवल 300 अरब रुपये रही है। बाजार के लिए यह एक अभूतपूर्व परीक्षा रही। भविष्य के ऋण चक्र के लिए हमें इसे ध्यान में रखना चाहिए। 
 
बॉन्ड म्युचुअल फंड को भी ऋण आकलन क्षमता सुधारने को कहा गया और क्रेडिट रेटिंग अब अधिक बेहतर हुई हैं। जो फंड निवेश के लिए रेटिंग पर बहुत ज्यादा निर्भर थे उन्हें अपने बही खाते शिथिल करने पड़े और निवेशक अब म्युचुअल फंड को लेकर अधिक समझ का परिचय दे रहे हैं। बॉन्ड म्युचुअल फंड धारकों और संपदा सलाहकारों को भी डिफॉल्ट का सामना करना पड़ा है इसलिए वे भी बॉन्ड धारिता को कहीं अधिक परखने के बाद काम करते हैं। तय परिपक्वता योजना को एक वक्त तयशुदा जमा का विकल्प माना जाता था लेकिन अब ऐसा नहीं है। 
 
इसके अलावा रेटिंग एजेंसियां जिनकी विश्वसनीयता को काफी झटका लगा, वे अब रेटिंग घटा रही हैं। नियमन में भी सख्ती की जा रही है और एएए श्रेणी की अधिकता को कम किया जा रहा है। इसका असर बॉन्ड प्रतिफल पर नहीं पडऩा चाहिए क्योंकि बॉन्ड बाजार जोखिम को ध्यान में रख रहा है। फिलहाल जोखिम से बचने की प्रवृत्ति चरम पर है। बॉन्ड बाजार केवल चुनिंदा कंपनियों को फंड दे रहा है जो उसे सुरक्षित लग रहे हैं। कुछ अन्य फर्म को दिया जाने वाला ऋण अधिक जोखिम वाला है तो उसकी दर भी अधिक रखी गई है। जिन कंपनियों पर बाजार को भरोसा नहीं है उन्हें फंड दिया ही नहीं जा रहा है। जोखिम भरे बॉन्ड में कारोबार इतना नकदीकृत है कि उनकी कीमतों पर भी संदेह है। यह एक चक्रीय रुझान है जो हर बाजार में देखने को मिल रहा है। एक बार डिफॉल्ट करने वालों के हटने के बाद हालात बदल जाते हैं।
 
बीती तीन तिमाहियों की घटनाओं ने भी कर्जदारों के व्यवहार को प्रभावित किया है। पुराने और गड़बड़ी करने वाले कारोबारी समूहों को ऋण पाने की क्षमता बनाए रखने के लिए अपनी परिसंपत्तियों की बिक्री करनी पड़ी है। उन्हें अपनी कंपनियों पर नियंत्रण बनाए रखने के लिए भी संघर्ष करना पड़ रहा है। ऋण की गुणवत्ता पर असर और पूंजी के उचित आवंटन का सकारात्मक प्रभाव अगले चक्र से नजर आने लगेगा। इस बीच दो चिंताएं उभरी हैं। पहली है वृद्घि पर प्रभाव। बाजार स्वाभाविक रूप से इस उथलपुथल से उबर जाएगा, यह लंबी अवधि की दृष्टि से बेहतर ही होगा। परंतु हो सकता है इसमें काफी वक्त लग जाए। उदाहरण के लिए इन संस्थाओं में से कुछ जिन्हें बॉन्ड बाजार फंड देने से इनकार करता है, वे अब डिफॉल्ट के कगार पर हैं। बहरहाल जब तक वे डिफॉल्ट करेंगी, संभव है कुछ गैर म्युचुअल फंड धारकों को परेशानी महसूस न हो और इसका असर दिखाई न दे। परंतु कई महीनों की यह दिक्कत अनावश्यक प्रतीत होती है। इसी प्रकार रेटिंग में गिरावट, खासतौर पर एएए श्रेणी की रेटिंग में गिरावट के कारण पेंशन और बीमा फंड द्वारा की जाने वाली खरीद में कमी आ सकती है। कई लोगों ने परिसंपत्ति गुणवत्ता समीक्षा की सलाह दी है। अगर ऐसा होता है तो सुधार तेज होगा। 
 
दूसरा, मौजूदा मौद्रिक सख्ती जहां गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों की मौजूदा समस्याओं का कारण है लेकिन वह मौद्रिक चर में गिरावट के कारण भी है। बैंक जब ऋण देते हैं तो वे धन बनाते हैं। अगर व्यवस्था में 100 रुपये हैं और बैंक 5 रुपये ऋण के रूप में देता है तो मूल राशि तत्काल 105 रुपये हो जाती है। वहीं गैर बैंकिंग कंपनियां ऋण देकर पैसे नहीं बनातीं। ऐसे में अगर बाजार में गैर बैंकिंग कंपनियों की हिस्सेदारी बढ़ती है तो मौद्रिक चर स्वयं कम होगा। समस्त मौद्रिक आपूर्ति को स्वस्थ गति से बढ़ते रहने के लिए यह आवश्यक है कि केंद्रीय बैंक को और अधिक आधार राशि तंत्र में डालनी होगी। जबकि बैंक फंडिंग वाले बाजार में ऐसा नहीं होता। अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए यह नीतिगत व्यवस्था आवश्यक है। 
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