बिजनेस स्टैंडर्ड - निवेश जुटाने की दृष्टि से पर्याप्त नहीं मांग
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निवेश जुटाने की दृष्टि से पर्याप्त नहीं मांग

नीति नियम
मिहिर शर्मा /  July 10, 2019

आर्थिक समीक्षा को वास्तविक बजट की तुलना में अधिक अग्रगामी और आर्थिक रूप से तर्कसंगत माना जाता है। दरअसल आर्थिक समीक्षा अर्थशास्त्रियों द्वारा तैयार की जाती है जबकि बजट अफसरशाहों द्वारा। हालांकि बजट को वास्तविक दुनिया से दो चार होना होता है जबकि समीक्षा तमाम अर्थशास्त्रियों की तरह आदर्श की दुनिया में भी रह सकती है। बजट और आर्थिक समीक्षा में व्यापक अंतर है। दोनों में निवेश में नई जान फूंकने को प्राथमिकता दी गई है। परंतु नीतियों के स्तर पर काफी अंतर है: समीक्षा में यह दलील सही है कि निवेश को बढ़ावा देने के किसी भी कदम में निर्यात वृद्धि अनिवार्य है। 

 
अर्थव्यवस्था में बचत बढ़ाकर भी निवेश को गति दी जा सकती है। परंतु इससे एक विवाद भी उत्पन्न होता है: निजी क्षेत्र का निवेश बिना मांग के वादे के गति नहीं पकड़ेगा और बचत में इजाफा, खपत बढ़ाने की मांग का विरोधाभासी है। समीक्षा में कहा गया है, 'उच्च स्तर की बचत के कारण जीडीपी में खपत की हिस्सेदारी सीमित रहने से घरेलू खपत ज्यादा से ज्यादा उस स्थिति में ताकत बढ़ाने का काम कर सकती है जब उच्च आय वृद्घि खपत की पूर्ति करे। ऐसे में उच्च निवेश आने से जो भारी भरकम क्षमता विकसित होगी उसके लिए मांग कहां से तैयार होगी? इसका उत्तर है निर्यात। यही कारण है कि एक आक्रामक निर्यात नीति के आधार पर ही निवेश आधारित वृद्घि मॉडल बनना चाहिए।'
 
देश का हालिया आर्थिक इतिहास बताता है कि अगर नए निवेश के लिए केवल घरेलू खपत की मांग ही एकमात्र दलील हो तो निवेश में नई जान फूंकना मुश्किल है। कम ईंधन दरों के कारण खपत में तेजी आई लेकिन निजी क्षेत्र की अतिरिक्त क्षमता की समस्या हल नहीं हुई। इसने निवेश को प्रभावित किया। निर्यात 2014 से ठहरा हुआ है और हाल में वृद्घि में समस्या नजर आई। स्थायी वृद्घि देखने को नहीं मिल रही है। जब तक हम खपत आधारित वृद्घि की नीति तलाशेंगे ऐसा बना रहेगा।  बजट का रुख समीक्षा से अलग है। उसने निवेश के मामले में आपूर्ति क्षेत्र की दिक्कत दूर करने का प्रयास किया है लेकिन मांग क्षेत्र को लेकर नीतियों में कोई बदलाव नहीं आया। हमारा देश निवेशकों को गति देने के लिए घरेलू मांग का संरक्षण कर रहा है, यह बड़ी चूक है। देश में निवेश कैसे आएगा? अमेरिका और चीन के बीच तनाव के चलते वैश्विक आपूर्ति शृंखला लडख़ड़ाई हुई है। भारत की विश्व कारोबार में हिस्सेदारी दो फीसदी से भी कम है और वह इसका फायदा उठा सकता है। अगर विश्व व्यापार धीमी गति से बढ़ रहा है तो भी श्रम अधिशेष वाले देश की विश्व व्यापार में इतनी कम हिस्सेदारी को देखते हुए निर्यात में इजाफा किया जा सकता है। हम चीन की कुछ हिस्सेदारी पर काबिज होकर ऐसा कर सकते हैं।
 
अगर निवेश को बढ़ावा देना है तो हमें एक स्थिर नीतिगत माहौल के साथ-साथ ऐसी भावना की जरूरत है कि हम प्रभावी तरीके से वैश्विक आपूर्ति शृंखला का हिस्सा बन सकता है। मौजूदा सरकार के नजरिये से मुख्य बाधा है देश का समस्याग्रस्त बुनियादी ढांचा। यह बात आंशिक रूप से सही है। समीक्षा में भी कहा गया है कि नीतिगत स्थिरता अहम है। यही बात प्रतिस्पर्धा पर भी लागू होता है। बजट इन दो बाधाओं को कैसे दूर करता है? वह इन्हें पूरी तरह हल नहीं करता। बड़ी कंपनियों के साथ सौतेला व्यवहार जारी है और उन्हें कॉर्पोरेट आय कर के 25 फीसदी के आधार दर दायरे से बाहर रखा गया है। ये वे कंपनियां हैं जो सबसे अधिक प्रतिस्पर्धी और उत्पादक हैं। ये कंपनियां ऐसे विश्वस्तरीय रोजगार तैयार करती हैं जिनकी हमें जरूरत है। इन कंपनियों पर असंगत ढंग से ऊंची कर दर इन कंपनियों को निर्यात की दृष्टि से गैर प्रतिस्पर्धी बनाती है। समीक्षा में कहा गया है, श्रम सुधार हमारी मदद कर सकते हैं। राजस्थान जैसे राज्यों में ऐसा हो चुका है। परंतु हालांकि बजट में एक बार फिर श्रम कानूनों को तार्किक बनाने की बात कही गई है लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर लचीले श्रम कानून अभी भी दूर बने हुए हैं। नीतिगत निश्चितता की बात करें तो बजट में चीजें और खराब हुई हैं। वैश्विक आपूर्ति शृंखला में टैरिफ की स्थिरता अहम है। हम ऐसी जगह निवेश करना नहीं चाहते जहां टैरिफ से निरंतर छेड़छाड़ की आशंका बनी रहती हो। 
 
सहज, प्रतिस्पर्धी कर दर और टैरिफ की जरूरत है लेकिन इस बजट में भी आयात शुल्क में मनमाना बदलाव देखने को मिला। इससे भी बुरी बात यह है कि यह घरेलू बाजार के संरक्षण के लिए किया जा रहा है। यह स्पष्ट है कि भारत केवल अपने ग्राहकों में रुचि रखता है, उसे वैश्विक उत्पादक बनने में रुचि नहीं है। यह बात तमाम हालिया नीतियों में महसूस की जा सकती है। ये नीतियां विदेशी निवेशकों को निशाना बनाती हैं। मामला चाहे ई-कॉमर्स का हो, या भुगतान का। सरकार के आक्रामक और संरक्षणवादी रुख के कारण ही बजट भाषण में विदेशी कंपनियों का देश में बड़े विनिर्माण संयंत्र लगाने का आह्वान थोड़ा विरोधाभासी नजर आया। इसकी भाषा भी बहुत दुरूह और उलझाऊ है। पहले तो अर्थव्यवस्था को गैर प्रतिस्पर्धी बना दिया गया जिससे कोई यहां आना ही नहीं चाहता, उसके बाद इसके लिए उत्प्रेरण किया जा रहा है ताकि सत्ता राजनेताओं और नौकरशाहों के हाथ में रहे। 
 
न केवल अल्पावधि बल्कि दीर्घावधि में भी देश के निवेश में सुधार की जरूरत है। हमें अतिशय क्षमता की समस्या को अप्रासंगिक बनाना होगा। उसके लिए हमें देश के बाहर दृष्टि डालनी होगी। ग्राहकों की संख्या देखकर भ्रमित होने की आवश्यकता नहीं है। वह केवल भ्रम है क्योंकि हर ग्राहक एक ऐसा व्यक्ति है जिसे रोजगार चाहिए। एक बड़ा देश जो विकसित होने का प्रयास कर रहा है उसके सामने वैसी ही बाधाएं होती हैं जैसी छोटे देशों के सामने। मसलन उसकी अपनी मांग निजी निवेश को बढ़ावा देने के लिए अपर्याप्त रहती है। अर्थशास्त्री और आर्थिक समीक्षा इसे याद रखते हैं लेकिन राजनेता और बजट इसे तवज्जो नहीं देते। 
Keyword: economy, survey, budget,,
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