बिजनेस स्टैंडर्ड - वित्तीय क्षेत्र सुधार के अनचाहे परिणाम
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वित्तीय क्षेत्र सुधार के अनचाहे परिणाम

आकाश प्रकाश /  July 10, 2019

फिलहाल डेट बाजार में जो संकट नजर आ रहा है, उसकी वजह है वित्तीय क्षेत्र की बेहतरी के लिए उठाए गए सुधारात्मक कदम। इस संबंध में विस्तार से जानकारी प्रदान कर रहे हैं आकाश प्रकाश 

 
भारतीय वित्तीय व्यवस्था एक अप्रत्याशित सफाई के दौर से गुजर रही है। अंकेक्षकों और रेटिंग एजेंसियों से लेकर बैंकों और फंड तक हर जगह मानक कड़े किए जा रहे हैं। लंबी अवधि में इसके अनेक लाभ सामने आएंगे। व्यवस्था का प्रबंधन करके चीजों को ज्यादा टाला नहीं जा सकता है। रसूख के बल पर ऋण का सिलसिला भी लंबा नहीं चल सकता। तमाम बाजार प्रतिभागी आशंकित हैं और अतिरिक्त सावधानी बरत रहे हैं। काम करने या न करने वालों की जवाबदेही भी तय हो रही है। इस प्रक्रिया की शुरुआत ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता (आईबीसी) के क्रियान्वयन के साथ हुई थी जहां पहले बड़े निस्तारण के बाद प्रवर्तकों को अहसास हुआ था कि पुराने तौर तरीके अब नहीं चलेंगे और वे कंपनियों पर से नियंत्रण गंवा सकते हैं। कर्ज का अपना असर होता है। कंपनी स्तर पर ज्यादा कर्ज आपसे कंपनी का नियंत्रण छीन सकता है। प्रवर्तक स्तर पर ज्यादा कर्ज परिसंपत्ति पर से नियंत्रण छीन सकता है। कर्ज हमेशा से दोधारी तलवार रहा है। हमारे यहां अतीत में ज्यादा कर्ज के अधिक जोखिम नहीं थे लेकिन अब हालात बदल चुके हैं।
 
ज्यादा कर्ज और उसे चुका पाने में नाकामी के अब कई दुष्परिणाम हो सकते हैं। ऐसे में आश्चर्य नहीं कि देश भर में कंपनियां और प्रवर्तक समूहों की बैलेंस शीट में कर्ज कम किया जा रहा है। कर्ज के स्वीकार्य स्तर की परिभाषा बदल चुकी है। बैलेंस शीट में मंदी आईबीसी का अनचाहा परिणाम है। इससे तंत्र में डेट और इक्विटी का अनुपात कम होगा। यही कारण है कि सरकार को निवेश पर जोर जारी रखना होगा। बैलेंस शीट की इस मंदी के बीच निजी क्षेत्र निवेश नहीं करेगा। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि दरें कितनी कम हैं। अगर आप नकदीकरण के इच्छुक हैं तो अपना जोखिम कम करने के लिए आप नया कर्ज नहीं लेंगे। 
 
नकदी की आवक का इस्तेमाल नई परियोजनाओं में नहीं किया जाएगा बल्कि उसका इस्तेमाल डेट-इक्विटी का मिश्रण सुधारने के लिए किया जाएगा। दरों में 100 या 200 आधार अंक की कमी से निवेशकों का मन नहीं बदलेगा। समूचे कारोबारी जगत में अगर आप 50 प्रमुख कारोबारी घरानों पर नजर डालें तो हर कोई नकदी कम कर रहा है। यह सफाई आवश्यक है। हालांकि नकदी की कमी वृद्घि पर असर डाल रही है। परंतु आने वाले दिनों में यह वित्तीय तंत्र को मजबूती प्रदान करेगी। समस्त बाजार प्रतिभागियों में मानक और परिचालन प्रक्रियाओं में सुधार होगा। खुलासे, रेटिंग, अंकेक्षण नोट आदि बाजार को मजबूती देंगे। हम बुनियाद मजबूत कर रहे हैं। मजबूत और अच्छी तरह संचालित कंपनियां वित्तीय जगत को बेहतर बनाएंगी। निकट भविष्य में सरकार को तयशुदा परिसंपत्ति निवेश पर ध्यान देना होगा। बजट से पता चलेगा कि इन निवेश के लिए संसाधन कहां से आएंगे। नीति निर्माता शायद जोखिम उठाएं और करों में कटौती कर वृद्घि की दिशा में आगे बढ़ें या उन्हें अधिक राजकोषीय गुंजाइश मुहैया कराएं। मैं उम्मीद करता हूं कि हम संसाधन के लिए कर बढ़ाने की पुरानी परिपाटी पर नहीं लौटेंगे। 
 
दूसरा अनचाहा परिणाम नोटबंदी से सामने आया। नोटबंदी के बाद हमने बैंकों और डेट म्युचुअल फंड दोनों में नकदी बढ़ती देखी। डेट फंड में पूंजी की आवक ने कॉर्पोरेट डेट बाजार को गति दी। अचानक गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियां और आवास वित्त कंपनियां लंबी अवधि के लिए भारी पूंजी जुटाने की स्थिति में आ गईं। फंड तक बढ़ी हुई पहुंच और सरकारी बैंकों द्वारा इन कंपनियों की वृद्घि प्रोफाइल बढ़ाने के साथ उनका मूल्यांकन कई गुना बढ़ गया। इसे बरकरार रखने के लिए उन्हें तेज वृद्घि दर्शानी पड़ी और तेज वृद्घि के लिए उन्हें इसी डेट बाजार से और अधिक राशि उठानी पड़ी। आईएलऐंडएफएस डिफॉल्ट के बाद डेट बाजार में पूंजी की आवक कम हुई और जोखिम से बचने की प्रवृत्ति बढ़ी। इन कंपनियों में से कई इस स्तर की उधारी को संभाल नहीं सकतीं। उन्हें परिसंपत्ति और जवाबदेही के बेहतर संतुलन की आवश्यकता है। उनकी वृद्घि की महत्त्वाकांक्षा पर लगाम लगानी होगी। 
 
डेट फंड में पूंजी का प्रवाह की बात करें तो यह फंड मोटे तौर पर समकक्ष समूह में बेचा जाता है इसलिए यह उच्च प्रतिफल देने की स्थिति में रहता है। इससे आवक बढ़ती है। कई फंड ने अपनी पूंजी उच्च जोखिम में डाली। होल्डिंग कंपनी और गैर सूचीबद्घ कंपनियों ने भी काफी अहम फंड तक पहुंच बनाई। प्रतिफल की तलाश में और अधिक जोखिम लिया गया। इन डेट फंड को ध्यान में रखें। बैंकों के उलट इनके यहां बड़े ऋण विभाग नहीं होते। वे पूरी तरह रेटिंग पर निर्भर करते हैं। जब तक उनकी रेटिंग निवेश श्रेणी की रहती है उन्हें खरीदा जा सकता है। भले ही वह प्रवर्तक की फंडिंग हो और संस्थान के पास कोई नकद प्रवाह न हो। जोखिम से बचाव के मौजूदा माहौल में यह सब बदल रहा है। डेट फंड अब और अधिक सचेत हैं। निवेशक और ज्यादा सचेत हैं। 
 
अगर बाजार आगे बढ़ता रहता है और परिपक्व होता है तो इसे सामान्य व्यवहार माना जाएगा। हमें वृद्घि के साथ-साथ नए उपाय, नवाचारी ढांचा देखने को मिलता है और यह सब किसी भी परिसंपत्ति वर्ग के परिपक्वता चक्र में सामान्य बात है। हमारा कॉर्पोरेट डेट और ढांचागत ऋण बाजार अब परिपक्व हो रहे हैं। परिणामस्वरूप तमाम प्रतिभागी सीखेंगे और इन बाजारों को और मजबूत बनाएंगे। इस बीच जब इन बाजारों पर लगाम लगेगी तो ज्यादा जोखिम उठाने वाले कर्जदारों को इसकी कीमत चुकानी होगी। परंतु यह कोई व्यवस्थागत जोखिम नहीं है। डेट बाजार अत्यावश्यक ठहराव से गुजर रहे हैं। इसके बाद वे दोबारा गति पकड़ेंगे। हम मजबूत और नवाचारी कॉर्पोरेट ऋण और ढांचागत ऋण बाजार की आवश्यकता है। यह आवश्यक है कि नीति निर्माता डेट बाजार की इस अपरिहार्य हलचल को लेकर जरूरत से ज्यादा प्रतिक्रिया न दें। हमें इन पर अतिनियमन नहीं थोपना चाहिए और नवाचार तथा जोखिम उठाने की चाह समाप्त नहीं कर देनी चाहिए। वर्तमान में बहुत अधिक अनिश्चितता और आशंका का माहौल है लेकिन यह दौर भी समाप्त हो जाएगा। हमारे पास कहीं अधिक मजबूत और अनुशासित वित्तीय तंत्र होगा। मजबूत कंपनियां और अधिक नैतिक कारोबारी व्यवहार ही बचे रहेंगे। 
Keyword: india, economy, bank,,
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