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शून्य लागत खेती पर कई सवाल

संजीव मुखर्जी /  July 09, 2019

सुभाष पालेकर और उनकी 'शून्य लागत प्राकृतिक कृषि' एक बार फिर सुर्खियों में है। पहले 2018-19 की आर्थिक समीक्षा में इसे छोटे किसानों के लिए आजीविका का एक आकर्षक विकल्प बताया गया। इसके अगले दिन वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने शुक्रवार को अपने बजट भाषण कहा कि यह कृषि पद्धति नवोन्मेषी है, जिसके जरिये वर्ष 2022 तक किसानों की आय दोगुनी की जा सकती है। शून्य लागत प्राकृतिक कृषि करीब 10 वर्षों से विभिन्न तरीकों से की जा रही है। 

अध्ययनों से पता चलता है कि जापानी वैज्ञानिक और दार्शनिक मासानोबू फुकुओका ने सबसे पहले प्राकृतिक कृषि को लोकप्रिय बनाया। उन्होंने सबसे पहले इस कृषि मॉडल का परीक्षण सिकोकू में अपने पैतृक खेत में किया। प्राकृतिक कृषि ऑर्गेनिक खेती से अलग है, लेकिन कई बार गलती से इन्हें एक मान लिया जाता है। भारत में प्राकृतिक कृषि का चलन पुराने समय से है, लेकिन शून्य लागत प्राकृतिक कृषि को देश भर में लोकप्रिय बनाने का श्रेय सुभाष पालेकर को जाता है। शून्य लागत प्राकृतिक कृषि को उस समय बड़ा प्रोत्साहन मिला, जब आंध्र प्रदेश सरकार ने 2015 में इस कृषि पद्धति को किसानों के बीच लोकप्रिय बनाने के लिए एक गैर-लाभकारी संगठन शुरू किया। इस गैर-लाभकारी संगठन का नाम रैयत साधिकरा संस्था (आरवाईएसएस) है, जिसे अजीम प्रेमजी फिलनथ्रॉपिक इनिशिएटिव (एपीपीआई) और आंध्र प्रदेश सरकार वित्तीय मदद मुहैया करा रहे हैं। इस संगठन ने करीब 1,38,000 किसानों तक शून्य लागत प्राकृतिक कृषि को पहुंचाया है और महज दो वर्ष की अवधि में 1.5 लाख हेक्टेयर भूमि में इस कृषि मॉडल को अपनाया जाने लगा है। 

इसके बाद इस कृषि पद्धति का देश के अन्य हिस्सों में प्रसार हुआ है, जिसके लिए पालेकर और उनकी टीम ने प्रयास किए हैं। वर्ष 2018-19 की आर्थिक समीक्षा के मुताबिक कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश उन अन्य राज्यों में शामिल हैं, जहां यह कृषि पद्धति लोकप्रिय बन रही है। आर्थिक समीक्षा के मुताबिक अभी केंद्र की राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के तहत 704 गांवों के 131 संकुलों और परंपरागत कृषि विकास योजना के तहत 268 गांवों के 1,300 संकुलों में शून्य लागत प्राकृतिक कृषि को अपनाया जा रहा है। इस कृषि मॉडल को करीब 1,63,034 किसान अपना रहे हैं। अधिकारियों ने कहा कि हिमाचल प्रदेश में करीब 4,000 किसान इस कृषि प्रणाली को अपना रहे हैं। यह राज्य वर्ष 2022 तक पूर्णतया शून्य लागत प्राकृतिक कृषि को अपनाने वाला पहला राज्य बनने की योजना बना रहा है। ऐसे में सवाल पैदा होता है कि असल में शून्य लागत प्राकृतिक कृषि क्या है और इस कृषि का तरीका क्या है। 

ऊर्जा, पर्यावरण और जल परिषद (सीईईडब्ल्यू) की 2018 की रिपोर्ट के मुताबिक पालेकर की शून्य लागत प्राकृतिक कृषि के चार घटक हैं। यह रिपोर्ट सौरभ त्रिपाठी, श्रुति नागभूषण और तौसिफ शाहिदी ने तैयार की है। इन चार घटकों में पहला 'बीजामृत' है, जिसमें गोबर एवं गौमूत्र के घोल का बीजों पर लेप किया जाता है। दूसरा घटक 'जीवामृत' है, जिसमें भूमि पर गोबर, गौमूत्र, गुड़, दलहन के चूरे, पानी और मिट्टी के घोल का छिड़काव किया जाता है ताकि मृदा जीवाणुओं में बढ़ोतरी की जा सके। तीसरा घटक 'आच्छादन' है, जिसमें मिट्टी की सतह पर जैव सामग्री की परत बनाई जाती है ताकि जल के वाष्पीकरण को रोका जा सके और मिट्टी में ह्यूमस का निर्माण हो सके। चौथा घटक 'वाफसा' है, जिसमें मिट्टी में हवा एवं वाष्प के कणों का समान मात्रा में निर्माण करना है। 

शून्य लागत प्राकृतिक कृषि में कीटों के नियंत्रण के लिए गोबर, गौमूत्र, बकाइन और हरी मिर्च से बने विभिन्न घोलों का इस्तेमाल किया जाता है, जिसे 'क्षयम' कहा जाता है। क्या असल में शून्य लागत प्राकृतिक कृषि किसानों के लिए लाभप्रद है। सीईईडब्ल्यू अध्ययन 2016 और 2017 के बीच किया। यह आंध्र प्रदेश के 13 जिलों में फसल कटाई के अनुभवों पर आधारित था, जहां राज्य सरकार के रैयत साधिकरा संस्था के तहत शून्य लागत प्राकृतिक कृषि को अपनाया जा रहा है। इस अध्ययन में पाया गया कि इस तकनीक का इस्तेमाल करने वाले किसानों की लागत में भारी कमी आई और उनके उत्पादन में सुधार हुआ। साफ तौर पर पालेकर और उनकी तकनीक के कुछ कद्रदान हैं। लेकिन भारत की कृषि अर्थव्यवस्था के पैमाने और आकार को देखते हुए क्या यह तकनीक देश भर में फैल सकती है और सभी भौगोलिक क्षेत्रों में एकसमान नतीजे दे सकती है? यह एक बड़ा सवाल है। 

देश के विभिन्न कृषि जलवायु जोनों में किसानों के लिए इस कृषि पद्धति की व्यावहारिकता को समझने के लिए सरकारी भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर), विभिन्न विश्वविद्यालयों समेत विभिन्न स्तरों पर खेतों में अध्ययन किए जा रहे हैं, लेकिन अभी तक कोई भी अध्ययन किसी ठोस निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा है। 

हिमाचल प्रदेश स्थित सरकारी विश्वविद्यालय वाई एस परमार यूनिवर्सिटी ऑफ हॉर्टिकल्चर ऐंड फॉरेस्ट्री के मुख्य वैज्ञानिक राजेश्वर सिंह चंदेल ने कहा, 'इस समय देश में टमाटर उत्पादक  किसानों के लिए सबसे बड़ी चुनौती एक कीट है, जिसे 'टूटा एब्सोल्यूटा' कहा जाता है। यह कीट देश में 2015 में आया था और यह जल्द ही सभी खेतों को साफ कर सकता है। हमारे अध्ययनों ने दिखाया है कि जिन खेतों में शून्य लागत प्राकृतिक कृषि को अपनाया गया है, उनमें इस खतरनाक कीट का प्रकोप महज 5 फीसदी है। इसका प्रकोप ऑर्गेनिक खेतों में 60 फीसदी है। रासायनिक कीटनाशकों के इस्तेमाल वाले खेतों में कीट का प्रकोप 20 फीसदी है, जबकि उनमें चार बार नुकसानदेह कीटनाशकों का इस्तेमाल किया गया है।' चंदेल ने कहा कि अगले दो वर्षों में खेतों में अध्ययन पर आधारित उचित दस्तावेजी सबूत होंगे, जो शून्य लागत प्राकृतिक कृषि के किसानों के खेतों, उनकी आय और उत्पादन पर असर को बताएंगे। लेकिन ऐसा लगता है कि हर कोई इससे सहमत नहीं है। इंदिरा गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट रिसर्च (आईजीआईडीआर) के निदेशक और प्रख्यात अर्थशास्त्री महेंद्र देव ने कहा कि शून्य लागत प्राकृतिक कृषि को बड़े पैमाने पर अपनाना मुश्किल होगा। देव ने कहा, 'यह किसानों की आय दोगुनी करने के मॉडलों में से एक हो सकता है, लेकिन यह एकमात्र समाधान नहीं है क्योंकि अभी परंपरागत कृषि पद्धतियों की तुलना में शून्य लागत प्राकृतिक कृषि की उत्पादकता में लंबी अवधि में बढ़ोतरी का पता नहीं है। शून्य लागत प्राकृतिक कृषि के देश भर में प्रसार की कोई योजना बनाने से पहले विभिन्न कृषि जलवायु क्षेत्रों में और परीक्षण एवं अध्ययन किए जाने चाहिए अन्यथा यह गैर-उत्पादक साबित हो सकती है।'

फेडरेशन ऑफ सीड इंडस्ट्री ऑफ इंडिया के महानिदेशक राम कौंडिन्य ने कहा कि इस बारे में वैज्ञानिक आकलन किया जाना चाहिए कि शून्य लागत प्राकृतिक कृषि का उत्पादकता पर क्या असर होगा और क्या इस कृषि पद्धति के दायरे में देश के 14 करोड़ किसानों को लाया जा सकता है।

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