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धनाढ्यों पर कर

संपादकीय /  July 08, 2019

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बजट प्रस्तुत करने के दौरान शुरुआत में ही यह कह कर एकदम उचित किया कि सरकार वैध तरीके से लाभ अर्जित करने को खराब नहीं मानती। यह स्वागत योग्य टिप्पणी थी। देश में कारोबारी जगत बहुत लंबे समय तक लाइसेंस राज का शिकार रहा और पैसे कमाने को हमेशा अच्छा नहीं माना गया। उन्हें यह श्रेय भी मिलना चाहिए कि उन्होंने कम कॉर्पोरेट कर दर का लाभ 0.7 फीसदी कंपनियों को छोड़कर शेष तक पहुंचाया, हालांकि उम्मीद की जा रही थी कि यह सबको मिलेगा।

परंतु इस घोषणा का सुखद प्रभाव बहुत लंबे समय तक कायम नहीं रहा क्योंकि मंत्री ने 2 करोड़ रुपये से अधिक आय अर्जित करने वाले करदाताओं पर अधिभार बढ़ाने का प्रस्ताव रख दिया। प्रस्ताव के मुताबिक 2.5 करोड़ रुपये और 5 करोड़ रुपये से अधिक की कर योग्य आय वाले करदाताओं के लिए प्रभावी कर दर में क्रमश: 3 और 7 फीसदी का इजाफा होगा। प्रस्ताव करदाताओं के एक छोटे तबके को ही प्रभावित करेगा लेकिन यह विचार कई स्तरों पर गड़बड़ है और इससे बचा जाना चाहिए था। अनुमान है कि आय कर संग्रह में 3,000 करोड़ रुपये से भी कम इजाफा होगा। व्यापक तौर पर देखा जाए तो यह कर ढांचे को सरल बनाने के मूल विचार के ही खिलाफ है। हालांकि अतीत में भी कई तरह के उपकर और अधिभार लगाए गए हैं लेकिन इस बजट में यह काम अलग ही स्तर पर हुआ। स्वाभाविक सी बात है कि राजनीतिक कारणों से इन्हें पलटना भी संभव नहीं होगा। यह स्पष्ट नहीं है कि सरकार ऐसी व्यवस्था को बदलना क्यों चाहती है जो लंबे समय से लागू है। अनुभव बताता है कि जब दरें कम रहती हैं तो संग्रह बढऩे की आशा रहती है।

यह बात भी सर्व स्वीकार्य है कि सरकार को सामाजिक दायित्व पूरा करने के क्रम में राजस्व और पूंजीगत व्यय दोनों बढ़ाने की आवश्यकता है। ऐसे में संग्रह बढ़ाने के लिए अनुपालन और कर दायरा बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए। कोशिश यह होनी चाहिए कि लोगों को कर चुकाने के लिए प्रोत्साहित किया जाए और कर प्रशासन को सुधार कर अनुपालन न होने की घटनाओं का पता लगाया जा सके। हालांकि अनुपालन और प्रशासन के मोर्चे पर कुछ प्रगति देखने को मिली है लेकिन रियायतों और छूट की सीमा की नियमित समीक्षा ने कर आधार में सार्थक बढ़ोतरी की संभावनाओं को सीमित किया है। उदाहरण के लिए अंतरिम बजट में 5 लाख रुपये तक की कर योग्य आय वाले करदाताओं को पूरी छूट दी गई थी। इसका राजस्व प्रभाव 18,000 करोड़ रुपये से अधिक था।

वांछित यह है कि कम तादाद वाले करदाताओं से अधिक राशि वसूलने के बजाय ऐसी व्यवस्था कायम की जाए जहां ढेर सारे लोग थोड़ा-थोड़ा कर चुकाएं। इतिहास बताता है कि उच्च कर दर कर वंचना को जन्म देती है। संभव है कि अत्यधिक अमीर तबका अपना कर दायित्व कम करने की राह तलाश करे। यह देखना दिलचस्प होगा कि नए अधिभार के बाद वास्तविक संसाधनों में क्या तब्दीली आती है। इसके अलावा अगर सरकार मानती है कि अमीरों को अधिक योगदान करना चाहिए तो उसे कर स्लैब में संशोधन करना चाहिए। इससे ढांचा सहज और पारदर्शी बना रहेगा तथा राज्यों को भी उचित हिस्सेदारी मिलेगी। दरअसल सरकार ने नई प्रत्यक्ष कर संहिता पर काम कर रहे पैनल की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। आशा की जानी चाहिए कि पैनल प्रत्यक्ष करों को सहज बनाने की अनुशंसा करेगा और सरकार इससे संतुष्ट होगी। उच्च वृद्धि दर हासिल करने के लिए यह आवश्यक है कि देश में एक स्थिर, सहज और ऐसी कर व्यवस्था हो जिसके बारे में अनुमान लगाना आसान हो।

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