बिजनेस स्टैंडर्ड - हिस्सेदारी घटाने पर मोहलत!
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हिस्सेदारी घटाने पर मोहलत!

न्यूनतम सार्वजनिक शेयरधारिता 35 फीसदी करने का प्रस्ताव
श्रीमी चौधरी / नई दिल्ली 07 08, 2019

शेयरधारिता का मामला

शेयरधारिता प्रावधान के लिए सेबी दे सकता है 2 साल की मोहलत
1,300 से अधिक फ र्मों में प्रवर्तक हिस्सेदारी 65 फीसदी से अधिक
अनुपालन के लिए बेचने होंगे 4 लाख करोड़ रुपये के शेयर
शीर्ष 20 कंपनियों को करना होगा 2 लाख करोड़ रुपये का विनिवेश
55 से अधिक पीएसयू में प्रवर्तक हिस्सेदारी 65 फीसदी से अधिक

बिजनेस स्टैंडर्ड हिस्सेदारी घटाने पर मोहलत!भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) सूचीबद्ध कंपनियों को न्यूनतम सार्वजनिक शेयरधारिता 25 फीसदी से बढ़ाकर 35 फीसदी करने के लिए दो साल का समय दे सकता है। हाल में पेश 2019-20 के आम बजट में इसका प्रस्ताव है। एक सरकारी अधिकारी ने कहा, 'अनुपालन और समयसीमा सभी सूचीबद्ध कंपनियों के लिए एक समान होगी, जिसमें सार्वजनिक उपक्रम भी शामिल हैं।' उन्होंने साथ ही कहा कि सेबी सभी संबंधित पक्षों के साथ विचार विमर्श के बाद इस बारे में एक विस्तृत व्यवस्था बनाएगा।

बाजार नियामक इस मुद्दे पर सभी बारीकियों की जांच कर रहा है और जल्दी ही सुझाव के लिए इसका एक मसौदा जारी किया जाएगा। एक सूत्र ने कहा कि अगर प्रवर्तक शेयरधारिता को 35 फीसदी तक सीमित किया जाता है तो सेबी खासतौर पर अधिग्रहण संहिता के नियमों को लेकर चिंतित है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने अपने बजट भाषण में कहा कि यह सूचीबदद्ध कंपनियों में न्यूनतम सार्वजनिक शेयरधारिता बढ़ाने पर विचार करने का उपयुक्त समय है। उन्होंने कहा, 'मैंने सेबी को मौजूदा शेयरधारिता की सीमा 25 फीसदी से बढ़ाकर 35 फीसदी करने के प्रस्ताव पर विचार करने को कहा है।'

विशेषज्ञों का मानना है कि शेयरों की बेहतर कीमत पाने के संदर्भ में 35 फीसदी सार्वजनिक शेयरधारिता का प्रस्ताव सकारात्मक है। इससे वैश्विक सूचकांकों में भारत का भारांक बढ़ेगा और कंपनियों के कामकाज में मानक बेहतर होंगे। लेकिन इससे अधिग्रहण के महंगे होने की आशंका है क्योंकि 65 फीसदी प्रवर्तक शेयरधारिता की सीमा को पार करने वाले खरीदारों को शेयरों को फिर से बाजार में बेचना पड़ेगा।

सूत्रों के मुताबिक सेबी को इस मामले में कुछ सुझाव मिले थे और पूंजी बाजार के लिए ज्यादा न्यूनतम सार्वजनिक शेयरधारिता के फायदे और नुकसान के बारे में उसकी वित्त मंत्रालय के साथ कई दौर की चर्चा हो चुकी है। सरकार का मानना है कि न्यूनतम सार्वजनिक शेयरधारिता बढ़ाने से बाजार में सांठगांठ पर लगाम लगेगी, इक्विटी संस्कृति को बढ़ावा मिलेगा और पूंजीगत लाभ के जरिये कर संग्रह में सुधार होगा।

सूत्रों के मुताबिक सेबी बाजार पूंजीकरण के आधार पर अनुपालन के नियम बना सकता है। उदाहरण के लिए जिन लोगों को 1,000 करोड़  रुपये से अधिक विनिवेश करना है उन्हें अनुपालन के लिए कानून में संशोधन की तिथि के बाद दो साल दिए जा सकते हैं। एक सूत्र ने कहा कि जिन कंपनियों को 1,000 करोड़ रुपये से अधिक के शेयर बेचने हैं, उन्हें और एक साल दिया जा सकता है।35 फीसदी सार्वजनिक शेयरधारिता के नियम आईपीओ के जरिये बाजार में उतरने जा रही नई कंपनियों पर तुरंत प्रभाव से लागू हो सकता है। हालांकि यहां भी बाजार पूंजीकरण पर आधारित नीति लागू की जा सकती है। अगर सूचीबद्धता के बाद किसी कंपनी का बाजार पूंजीकरण 3,000 करोड़ रुपये से अधिक है तो उसे न्यूनतम 10 फीसदी शेयर तुरंत बेचने होंगे और बाकी 25 फीसदी वह अगले तीन साल के भीतर बेच सकती है।

सूचीबद्धता पर जिन कंपनियों का बाजार पूंजीकरण 1,000 करोड़ रुपये से 3,000 करोड़ रुपये होगा, उन्हें 25 फीसदी शेयर बेचने होंगे जबकि 1,000 करोड़ रुपये से कम बाजार पूंजीकरण वाली कंपनी को सूचीबद्धता के बाद 35 फीसदी शेयर बेचने होंगे। अलबत्ता इससे वे छोटी कंपनियां सूचीबद्धता से परहेज करेंगी जिनके पास पूंजी जुटाने की योजना नहीं है क्योंकि उन्हें प्रवर्तक की शेयरधारिता बेचने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।

साथ ही सेबी न्यूनतम सार्वजनिक शेयरधारिता बढ़ाने के लिए कंपनियों को कुछ नए विकल्प दे सकती है। अभी कंपनियों के पास इसके लिए ऑफर फॉर सेल (ओएफएस), राइट इश्यू, सार्वजनिक शेयरधारकों के लिए बोनस इश्यू और फॉलो ऑन पब्लिक ऑफर का विकल्प है। नियामक प्रवर्तकों को ब्लॉक ट्रेड की अनुमति दे सकता है जहां मूल्य निर्धारण मौजूदा बाजार मूल्य से 5 फीसदी तक की छूट पर हो सकता है। सूत्रों का कहना है कि संस्थागत नियोजन कार्यक्रम (आईपीपी) की प्रक्रिया को आसान बनाया जा सकता है। साथ ही क्यूआईपी के जरिये शेयर जारी करने वाली कंपनियों को भी कुछ राहत दी जा सकती है।

सेबी प्रवर्तक शेयधारकों को सामान्य शेयरधारक के रूप में पुनर्वर्गीकृत करने के नियमों को भी सख्त बनाएगा ताकि कंपनियां अनुपालन के लिए इस विकल्प का दुरुपयोग न करें। अभी 1300 से अधिक ऐसी सक्रिय कंपनियां हैं जिनमें प्रवर्तकों की हिस्सेदारी 65 फीसदी से अधिक है। मौजूदा बाजार दर के हिसाब से इन कंपनियों को प्रस्तावित नियमों के अनुपालन के लिए 4 लाख करोड़ रुपये के शेयरों को बेचना पड़ेगा। प्राइम डेटाबेस के संस्थापक पृथ्वी हल्दिया ने कहा, 'कई लोगों को आशंका है कि क्या बाजार इतनी आपूर्ति झेल पाएगा?' इस प्रस्ताव के समर्थक रहे हल्दिया ने कहा कि इससे बेहतर सार्वजनिक हिस्सेदारी सुनिश्चित होगी, बाजार में सांठगांठ और उतारचढ़ाव में कमी आएगी और शेयरों के बेहतर मूल्य मिलेंगे।
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