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डेट म्युचुअल फंडों का मूल्य भविष्य में होगा वाजिब

संजय कुमार सिंह /  July 07, 2019

सितंबर, 2018 में आईएलऐंडएफएस संकट सामने आने के बाद डेट म्युचुअल फंडों को ऐसे घटनाक्रमों का भी सामना करना पड़ा है, जिनसे उनका एक दिन में नेट एसेट वैल्यू (एनएवी) आधा हो गया। ऐसे उतार-चढ़ाव से निवेशकों का भरोसा डगमगाया है और सावधि जमाओं से निकलकर डेट फंडों में जाने का निवेशकों का रुझान अब पलट गया है। ऐसी चिंताओं के समाधान के लिए भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने पिछले सप्ताह नियामकीय बदलावों का एक प्रारूप जारी किया है।  

मूल्यांकन नियमों में बदलाव, एक्जिट लोड लागू  

पहले 30 दिन तक की परिपक्वता वाले वाणिज्यिक पत्रों का मूल्यांकन एमोर्टाइजेशन पद्धति से तय होता था, लेकिन अब सभी वाणिज्यिक पत्रों का मूल्यांकन मार्क-टू-मार्केट (एमटीएम) आधार पर होगा। एमोर्टाइजेशन पद्धति में वाणिज्यिक पत्र की परिपक्वता नजदीक आने पर उसके मूल्य में तेजी से बढ़ोतरी होती है। एमटीएम लागू होने से फंडों का एनएवी उस कीमत को बेहतर दिखा पाएगा, जो उनके वाणिज्यिक पत्रों को बाजार में मिल सकती है। हालांकि लिक्विड फंडों का एनएवी में उतार-चढ़ाव थोड़ा बढ़ सकता है। श्रेणीबद्ध एक्जिट लोड 7 दिन तक की परिक्वता वाले लिक्विड फंडों पर लागू होगा। इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि संस्थागत निवेशक लिक्विड फंडों में कम से कम एक सप्ताह के लिए निवेश करें। 

लिक्विड फंडों में ज्यादातर निवेश संस्थागत निवेशक ही करते हैं। इन निवेशकों के निवेश के तरीके में बड़ा उतार-चढ़ाव रहता है। वे हर तिमाही के समाप्त होने से पहले बड़ी धनराशि की निकासी करते हैं और कुछ दिनों के बाद फिर से निवेश कर देते हैं। जब संस्थागत निवेशक निकासी करते हैं तो ऐसा फंड के एनएवी पर करते हैं। असल में एनएवी से उन कीमतों का सही पता नहीं चलता है, जिन पर बॉन्ड (एमोर्टाइजेशन आधार पर मूल्यांकन) बाजार में बिकता है। कुछ कम पर बिकते हैं। इसलिए संस्थागत निवेशक अच्छी कीमत पर बाहर निकलते हैं, जबकि उनमें बने रहने वाले निवेशकों को नुकसान उठाना पड़ता है। 

मॉर्निंगस्टार इन्वेस्टमेंट एडवाइजर इंडिया में निदेशक (प्रबंधक अनुसंधान) कौशतुभ बेलापुरकर ने कहा, 'इन बदलावों से सेबी ने यह सुनिश्चित किया है कि निवेशक 7 दिन से कम समय के लिए लिक्विड फंडों में न आएं और जब वे निकासी करें तो पीछे बचने वाले निवेशकों को कोई नुकसान न हो।' जो निवेशक अपना पैसा 7 दिन या उससे कम समय के लिए निवेश करना चाहते हैं, उन्हें ओवरनाइट फंडों में जाना चाहिए। जो निवेशक लंबे समय के लिए निवेश करना चाहते हैं, वे लिक्विड फंडों से जुड़े रहें। इन फंडों के ओवरनाइट फंडों की तुलना में ज्यादा प्रतिफल देने के आसार हैं।  

क्रेडिट-एनहांस्ड बॉन्डों में निवेश की सीमा 

कोई भी फंड क्रेडिट एनहांस्मेंट वाली डेट एवं मनी मार्केट योजनाओं में 10 फीसदी से अधिक निवेश नहीं कर सकता। ऐसी योजनाओं में एक समूह का निवेश पोर्टफोलियो के 5 फीसदी से नहीं हो सकता। लिक्विड और ओवरनाइट फंडों को स्ट्रक्चरड ओब्लिगेशंस (एसओ) और क्रेडिट एडवांस्ड बॉन्ड में निवेश की मंजूरी नहीं होगी।

क्रेडिट एनहांस्मेंट का मतलब उस व्यवस्था से है, जिसमें किसी योजना की क्रेडिट रेटिंग सुधारी जाएगी। इसका एक आसान उदाहरण देते हैं। माना कि बॉन्ड को बीबीबी  रेटिंग मिली हुई है और वह इसे सुधारना चाहता है। अगर जुटाई जाने वाली राशि 1,000 करोड़ रुपये है तो प्रवर्तक पहले 100 करोड़ रुपये पर गारंटी मुहैया करा सकते हैं। इससे रेटिंग एजेंसी इसे बेहतर रेटिंग दे सकती है। इस व्यवस्था से किसी समूह की कमजोर कंपनियां बेहतर ब्याज दरों पर उधार ले पाती हैं। सुंदरम म्युचुअल फंड के मुख्य निवेश अधिकारी (फिक्स्ड इनकम) द्विजेंद्र श्रीवास्तव ने कहा, 'विशेष रूप से क्रेडिट रिस्क फंडों का ज्यादातर निवेश एसओ और क्रेडिट एनहांस्ड बॉन्डों में होता है। उन्हें इसमें कमी लानी होगी।'

किसी 100 करोड़ रुपये के फंड का पांच फीसदी 5 करोड़ रुपये होता है। इन योजनाओं के बाजार लॉट का आकार 25 से 50 करोड़ रुपये होता है। इसलिए छोटे फंडों के लिए इनमें निवेश करना मुश्किल होगा। मोबिक्विक के परिसंपत्ति प्रबंधन प्रमुख कुणाल बजाज ने कहा, 'सेबी का संदेश यह है कि फंडों को पेचीदा योजनाओं में कम निवेश रखना चाहिए।' 

शेयरों पर ऋण का कवर बढ़ा 

सेबी ने म्युचुअल फंडों और प्रवर्तकों के बीच शेयरों पर ऋण (एलएएस) जैसे सौदों से पैदा होने वाली दिक्कतों से निपटने के लिए दो कदम उठाए हैं। पहला, सुरक्षा कवर बढ़ाकर चार गुना कर दिया गया है। दूसरा, सेबी ने 'भारग्रस्त' शेयरों को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया है। अगर किसी शेयर के मुक्त एवं लेनदेन योग्य मालिकाना हक पर कोई प्रत्यक्ष या परोक्ष प्रतिबंध है तो इसे भारग्रस्त माना जाएगा। प्रवर्तकों या किसी व्यक्ति समूह के भारग्रस्त शेयरों के कंपनी की कुल शेयर पूंजी के 20 फीसदी से अधिक होने या कंपनी में उनके 50 फीसदी शेयरों से अधिक होने पर उन्हें भारग्रस्त शेयरों की विस्तृत वजह बतानी होंगी। 

हाल में एलएएस समझौतों में ज्यादातर म्युचुअल फंडों के पास 1.5 गुना कवर था। प्रवर्तकों ने अपने शेयरों का एक बड़ा हिस्सा हिस्सा विभिन्न ऋणदाताओं के पास गिरवी रखा हुआ था। जब कुछ ऋणदाताओं ने अपने पास गिरवी रखे हुए शेयर बेचे तो कीमतों में भारी गिरावट आई। गिरवी परिसंपत्ति का मूल्य ऋण राशि से कम हो गया। प्रवर्तक गिरवी के लिए अतिरिक्त शेयरों की पेशकश नहीं कर सके क्योंकि उन्होंने पहले ही बड़ी मात्रा में शेयर गिरवी रखे हुए थे। बेलापुरकर ने कहा, 'अब अगर शेयर की कीमत 75 फीसदी तक नहीं गिरेगी तो ऋणदाताओं के पास पर्याप्त गिरवी परिसंपत्ति होगी।'

अगर किसी प्रवर्तक ने अपने शेयरों का एक बड़ा हिस्सा गिरवी रखा है तो यह सूचना सार्वजनिक करनी होगी। निवेशक उसके साथ शेयर गिरवी रखकर कर्ज देने का सौदा करने से बचेंगे। गिरवी शेयर कम होने से कुछ ऋणदाता ही एक समय बाजार में अपने पास रखे शेयरों को बेचने के लिए आएंगे। इन कदमों से यह सुनिश्चित होगा कि बड़े पैमाने पर लिए जाने वाले ऋण के लिए पर्याप्त परिसंपत्ति गिरवी रखी जाए।  

इन उपायों से आपको क्या फायदा होगा

विशेषज्ञों के मुताबिक भविष्य में डेट फंडों का मूल्य वाजिब बनेगा। लिक्विड फंडों के निवेशक बड़ी निकासी से कम प्रभावित होने के आसार हैं। ये फंड निवेशकों के लिए सुरक्षित बन जाएंगे। बजाज ने कहा, 'भविष्य में लिक्विड फंडों की बिक्री इस आधार पर होनी चाहिए कि वे कितने सुरक्षित हैं, बजाय इसके कि उन्होंने कितना प्रतिफल दिया है।' एसओ में निवेश की सीमा तय होने और सेक्टोरल सीमा कड़ी किए जाने से डेट फंडों का जोखिम प्रबंधन ढांचा सुधरेगा। दूसरी तरफ अत्यधिक लिक्विड योजनाओं में 20 फीसदी निवेश के नियम से लिक्विड फंडों से प्रतिफल थोड़ा कम हो सकता है।
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