बिजनेस स्टैंडर्ड - राजस्व पूर्वानुमान अवास्तविक
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राजस्व पूर्वानुमान अवास्तविक

नितिन देसाई /  July 05, 2019

किसी बजट के वृहद-आर्थिक प्रभाव का आकलन बुनियादी रूप से इस पैमाने पर किया जाता है कि इसके कराधान और उधारी संबंधी प्रस्तावों के जरिये सरकार परिवारों और कंपनी जगत से कितनी मांग पैदा करने में सफल होती है? सरकार की तरफ से किए जाने वाले व्यय की मात्रा भी वृहद-आर्थिक सेहत के लिए मायने रखती है। बजट ने गत वर्ष के संशोधित अनुमान के बरक्स अपने बजट अनुमानों के आंकड़े पेश कर दिए हैं। हालांकि बजट के जुलाई में पेश किए जाने से हमारे पास महालेखा नियंत्रक द्वारा दिए गए अनंतिम वास्तविक अनुमान हैं जो फरवरी 2019 में पेश अंतरिम बजट में रखे गए संशोधित अनुमानों से काफी अलग हैं। बजट पूर्वानुमान में दर्ज वृद्धि दर के आधार रूप में अनंतिम वास्तविक आंकड़ा कुल प्राप्तियों का 25 फीसदी और कुल व्यय का 20.5 फीसदी है। राजस्व पूर्वानुमान अवास्तविक लग रहे हैं। वास्तविक वृद्धि दर के सात फीसदी रहने और मुद्रास्फीति के 3-5 फीसदी दायरे में रहने पर सांकेतिक सकल घरेलू उत्पाद  (जीडीपी) वृद्धि दर 10-12 फीसदी रहेगी। राजस्व अनुमान में 2 फीसदी से अधिक लचीलापन है जबकि ऐसा होने के आसार नहीं हैं। साफ तौर पर वर्ष 2018-19 के अनंतिम वास्तविक राजस्व में आई 1.67 लाख करोड़ रुपये की कमी का संज्ञान नहीं लिया गया है। पूरी संभावना है कि घाटे का आंकड़ा लक्ष्य के भीतर रखने के लिए इस साल के अंत तक सब्सिडी भुगतान में कोई बाजीगरी देखने को मिले। वास्तविक घाटा बजट के 3.3 फीसदी लक्ष्य से अधिक 4 फीसदी के करीब रहने की उम्मीद है। 

 
वित्त वर्ष 2019-20 के बजट में सरकार ने अपनी परिसंपत्तियों की बिक्री से 1.05 लाख करोड़ रुपये आने का अनुमान जताया है जो 2018-19 में हासिल 80 हजार करोड़ रुपये से अधिक है। सरकार की तरफ से परिसंपत्ति बिक्री कर्ज के बोझ से दबे प्रवर्तक द्वारा अपनी देनदारियां पूरी करने के लिए कुछ परिसंपत्तियों की बिक्री से कोई खास अलग नहीं है। मुख्य आर्थिक लाभ तब होगा जब परिसंपत्ति बिक्री के साथ प्रबंधन भी किसी निजी खरीदार के पास चला जाए ताकि वह इस संपत्ति का बेहतर इस्तेमाल कर सके। महज कुछ शेयरों की सीधी बिक्री या ईटीएफ के जरिये बिक्री होने से वित्त मंत्रालय को घाटे की लक्षित सीमा के भीतर टिके रहने में मदद मिल सकती है। लेकिन अगर परिसंपत्ति बिक्री प्रक्रिया का इस्तेमाल मौजूदा उपभोग के लिए वित्त जुटाने में होता है तो घाटे को काबू में रखने के लाभप्रद असर कमोबेश गायब हो जाएंगे। दूसरी तरफ अगर उनका इस्तेमाल नए निवेशों के जरिये ठोस परिसंपत्ति बनाने में होता है तो यह सरकार की परिसंपत्ति पोर्टफोलियो पुनर्गठित करने जैसा होगा और मध्यावधि या दीर्घावधि में उससे आर्थिक लाभ भी हो सकते हैं। इस बजट में केंद्र सरकार का प्रत्यक्ष पूंजीगत व्यय गत वर्ष की तुलना में 11.8 फीसदी अधिक रखा गया है जबकि राजस्व व्यय 21.9 फीसदी ज्यादा है। इससे यही निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि परिसंपत्ति बिक्री से हासिल रकम मौजूदा उपभोग में ही लग जाएगी।
 
सरकार की उधारी जरूरत मुख्य रूप से बाजार उधारी से पूरी होती है और एक तिहाई वित्त छोटी बचत एवं भविष्य निधि कोषों से आता है। वर्तमान प्राप्तियों और व्यय के बीच का अंतर ही उधारी जरूरत को दर्शाता है। इस साल केंद्र सरकार की बाजार उधारी जीडीपी का करीब 2.2 फीसदी रहने का अनुमान है। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने वित्त वर्ष 2018-19 में नई जारी करीब 75 फीसदी सरकारी प्रतिभूतियां अपने पास रख लीं ताकि गैर-बैंकिंग वित्त कंपनियों (एनबीएफसी) संकट से हलकान बाजान में तरलता लाई जा सके। सरकारी ऋण की बड़े पैमाने पर विमुक्ति 2019-20 में शुरू होगी और नए वित्त वर्ष में सकल उधारी काफी अधिक रहेगी। मौजूदा राजकोषीय दायित्व एवं बजट प्रबंधन (एफआरबीएम) नियमों की समीक्षा के लिए गठित एन के सिंह समिति ने वर्ष 2022-23 तक केंद्र सरकार का कर्ज एवं जीडीपी अनुपात 40 फीसदी रखने की अनुशंसा की है। वर्तमान में यह अनुपात करीब 48 फीसदी है और इस वित्त वर्ष में तो इसमें कमी की खास गुंजाइश नहीं है। बजट में मध्यम अवधि के अनुमानों को देखें तो सिंह समिति के लक्ष्य को हासिल कर पाना संभव नहीं लगता है।
 
राज्य सरकारों एवं सार्वजनिक उपक्रमों से आने वाली मांगों को भी जोड़ लें तो कुल सार्वजनिक उधारी जरूरत जीडीपी का करीब नौ फीसदी होगी जो परिवार के स्तर की समूची वित्तीय बचत को ही निगल जाती है। इस बजट में सरकार ने यह ऐलान किया है कि वह उधारी जरूरतों का कुछ हिस्सा बाहरी स्रोतों से भी जुटाना चाहती है। शायद सरकार के कुछ लोगों ने यह अंदाजा लगाया है कि अपनी सॉवरेन निवेश रेटिंग के चलते इसमें कितनी लागत आएगी? ऋण बाजार की हालत भी वृहद-आर्थिक परिदृश्य के लिए एक बड़ी चिंता की बात है। भले ही बैंकों के फंसे कर्ज (एनपीए) की समस्या काबू के भीतर आती हुई लग रही है लेकिन एनबीएफसी क्षेत्र का संकट अब तक हल नहीं हुआ है। इस समस्या के मूल में परिसंपत्ति देनदारी का बेमेल होना है क्योंकि एनबीएफसी ने बैंकों और म्युचुअल फंडों से कम अवधि के कर्ज लेकर इन परिसंपत्तियों को फंड मुहैया कराया था। दो बड़ी कंपनियों की कर्ज अदायगी में चूक को ध्यान में रखने के साथ ही हमें यह भी देखना होगा कि अधिक सक्षम एनबीएफसी भी बैंकों की अति-सजगता और लिक्विड एवं डेट म्युचुअल फंडों द्वारा रेटिंग की गहन समीक्षा किए जाने से मुश्किल दौर का सामना कर रही हैं। लिक्विड एवं डेट फंडों में बड़ी होल्डिंग उन कंपनियों के पास है जिनके ट्रेजरी विभाग अपने अतिरिक्त फंड को रखने के लिए अधिक सुरक्षित विकल्प तलाशने में काफी सजगता दिखा रहे हैं।
 
एनबीएफसी नकदी की कमी से जूझ रहे प्रवर्तकों, प्रॉपर्टी डेवलपरों, छोटे उद्योगों और घर एवं टिकाऊ उत्पाद के खरीदारों के लिए फंड जुटाने का महत्त्वपूर्ण जरिया रही हैं। लेकिन अब उनसे कर्ज नहीं मिल पाने से निजी निवेश को प्रोत्साहित करने का लक्ष्य हासिल करने में भी अड़चन आएगी। मजबूत क्रेडिट रिकॉर्ड वाली एनबीएफसी की उधारी को बैंक गारंटी देने के बारे में रखा गया बजट प्रस्ताव निश्चित रूप से मदद करेगा। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में 70,000 करोड़ रुपये की पूंजी डालने की प्रतिबद्धता भी तरलता स्थिति में सुधार लाएगी। उम्मीद है कि इससे ब्याज दरों का संचरण बेहतर होगा और एनबीएफसी संकट उत्पन्न होने पर फैला ऋण जोखिम भी कम होगा। इस बजट ने राजकोषीय प्रबंधन में कुछ जोखिम उठाया है और घाटा (एवं सरकारी उधारी जरूरत) इसके पूर्वानुमान से कहीं अधिक हो सकती है। स्टार्टअप और छोटी-मझोली इकाइयों में निवेश बढ़ाने के लिए उठाए गए कदम, आयकर सीमा बढ़ाने से उपभोग मांग बढऩे की उम्मीद और तरलता एवं क्रेडिट प्रवाह बढ़ाने के लिए उठाए गए कदमों से आर्थिक वृद्धि को कुछ प्रोत्साहन मिलेगा। लेकिन निर्यात बढ़ाने और पूंजी की वास्तविक लागत कम करने की दिशा में कदम उठाए जाते तो बेहतर होता। आर्थिक समीक्षा में भी इन कदमों की वकालत की गई थी।
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