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नई योजनाओं की शुरुआत पुराने कार्यक्रमों का विस्तार

अजय शाह /  July 05, 2019

बजट भाषण में एक जमी-जमाई टीम की सोची-समझी रणनीति नजर आती है।  इस बारे में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं अजय शाह

 
आम चुनाव के बाद का पहला बजट अगले पांच वर्षों के लिए सरकार की आर्थिक रणनीति में झांकने का मौका है। जुलाई 2019 के बजट भाषण का पूरा ध्यान योजनाओं पर है, और सरकार की भूमिका के विस्तार पर है। इस बाबत सबसे बड़ी चिंता इस बात को लेकर है कि क्या यह बजट बीते वर्ष की आर्थिक मंदी से पार पाने में मदद कर पाएगा। इस वक्त की सबसे बड़ी जरूरत यह है कि अर्थव्यवस्था में तेजी आए। अर्थव्यवस्था की यही तेजी सरकार की कल्याणकारी योजनाओं के लिए पैसा जुटाएगी। 
 
नई सरकार का पहला बजट खासा अहम होता है। चुनाव के तुरंत बाद एक नई टीम को अपनी जड़ें जमानी होती है। हालांकि इस बार टीम पुरानी है। इसीलिए बजट भाषण में भी एक जमी-जमाई टीम की सोची-समझी रणनीति नजर आती है।   कुछ विश्लेषक इस बजट भाषण की आलोचना भी कर रहे हैं। उनके मुताबिक इस भाषण में तथ्यों का अभाव है। साथ ही, योजनाओं के ऐलान के बजाय उन पर विचार की बात कही गई है। इसके अलावा, वे इस बात को लेकर भी खासे नाराज हैं कि सरकार ने खर्च का तो ऐलान कर दिया, लेकिन उसके लिए राशि का प्रबंध नहीं किया। हालांकि मेरा मानना है कि हमें बजट भाषण को अगले पांच वर्षों के लिए सरकार के नीतिगत वक्तव्य के रूप में देखना चाहिए। इस नजरिये के साथ ये मोटा-मोटी आंकड़े असल में काफी उपयोगी भी हैं। यह बजट भाषण हमें अपने आर्थिक नीति-निर्धारकों के नजरिये में झांकने का मौका देता है। साथ ही, इससे हम अगले पांच वर्षों में सरकार की नीतियों को लेकर भी अनुमान लगा सकते हैं। 
 
भारतीय जनता पार्टी की सरकार बीते कार्यकाल में कई कल्याणकारी योजनाओं को लेकर आई थी। पार्टी नेताओं की मानें तो हालिया चुनावों में मिली जबरदस्त सफलता इन्हीं योजनाओं का नतीजा है। इसी वजह से इस बजट में सरकार ने अपनी नई योजनाओं की शुरुआत और पुरानी के विस्तार ज्यादा जोर दिया है। इसी के साथ पैदा होता है संसाधनों का सवाल।  अंतरराष्ट्रीय अनुभव को देखा जाए तो कल्याणकारी सरकारों को कामयाबी मिली है, जब बाजार अर्थव्यवस्था ने अच्छे परिणाम दिए हैं। तेज आर्थिक विकास ही मोटे कर राजस्व को लेकर आती है, जिससे सरकार की कल्याणकारी योजनाओं को बल मिलता है। इसके उलट, अगर निजी क्षेत्र का तेजी से विकास नहीं हुआ, तो कल्याणकारी व्यवस्था ढेर हो जाती है। 
 
इधर-उधर एक्का-दुक्का क्षेत्रों पर कर बढ़ाने से कर संग्रहण में तेजी नहीं आने वाली। अगर सरकार कर राजस्व को दोगुना करने के लिए गंभीर है, तो उसे विकास की रफ्तार दोगुनी करनी होगी। कल्याणकारी व्यवस्था को मजबूत करने के लिए हमें अपनी जड़ें मजबूत करनी होंगी। आर्थिक स्वतंत्रता और एक आधुनिक अर्थव्यवस्था के संस्थागत ढांचे का काम निजी क्षेत्र में उत्साह फूंकना है, जिससे निवेश की संभावनाएं और रोजगार के अवसर पैदा होते हैं। इससे विकास को रफ्तार मिलती है।  बीते कुछ वर्षों के आर्थिक आंकड़ों पर नजर डालें तो चेहरे पर शिकन पडऩा स्वाभाविक है। हमारी बाजार अर्थव्यवस्था का इंजन सुस्त पड़ रहा है। इससे सरकारी खजाने पर असर हो रहा है। जब विकास की रफ्तार सुस्त पड़ती है, तो घाटे-सकल घरेलू उत्पाद और कर्ज-सकल घरेलू उत्पाद जैसे बेहद जरूरी अनुपात भी बिगड़ जाते हैं। नतीजतन, सरकार को अब कर्ज लेने पर ज्यादा ब्याज का भुगतान करना पड़ता है। 
 
आर्थिक सेहत के लिए सबसे प्राथमिक घाटा अहम होता है। अगर किसी देश ने बीते 10 वर्ष में से 8-9 में प्राथमिक घाटा नहीं दिखाया, तो आम तौर पर उसकी माली हालत को बेहतर समझा जाता है। आज के बजट आंकड़ों की मानें तो हम प्रति वर्ष 50,000 करोड़ रुपये के प्राथमिक घाटे में हैं। वैसे तो ये आदर्श स्थिति नहीं है, लेकिन हालत उतनी खराब भी नहीं है। इस घाटे को पाटना बहुत मुश्किल भी नहीं है। इसीलिए हम हमारी माली हालत अच्छी कही जा सकती है। हालांकि, इस बारे में विश्लेषकों को बेहद बारीकी से विश्लेषण करने की जरूरत है।
 
वहीं, राजकोषीय भार को नापने का दूसरा बड़ा मापक होता है ब्याज दर। बजट आंकड़ों के मुताबिक बीते वर्ष यह आंकड़ा 11.1 फीसदी, जबकि चालू वित्त वर्ष में 12.4 फीसदी रहने का अनुमान है। इस वक्त देश में करीब 4 फीसदी की महंगाई दर है। इस हिसाब से असल दर 7.1 फीसदी और 8.4 फीसदी रही हैं, जो बहुत ज्यादा है। देश के विकास दर से भी ज्यादा। इस वजह से देश में ब्याज और सकल घरेलू उत्पाद का अनुपात बढ़ेगा। इस बारे में बजट से इतर दूसरे कर्जों के ब्याज दर को भी जोडऩा होगा, तभी इस बाबत एक सही तस्वीर उभेरगी।
 
इस बजट के आंकड़ों पर ध्यान दें तो एक बड़ी बात उभरती है, वह है सरकार का आकार। एक तेज और सफल अर्थव्यवस्था में सरकार का आकार बहुत छोटा होता है। इस बारे में हमें केंद्र सरकार के गैर ब्याज भुगतान पर नजर दौड़ानी होगी। बजट आंकड़ों के मुताबिक बीते वित्त वर्ष में इसमें 15.9 फीसदी की बढ़ोतरी हुई थी, जबकि इस वर्ष इसमें 13.7 फीसदी का इजाफा होने का अनुमान है। इसमें 4 फीसदी की महंगाई दर को हटा दें तो सरकार का गैर ब्याज खर्च 12 और 10 फीसदी की रफ्तार से बढ़ा है। यह बहुत ज्यादा है। 10 फीसदी के इजाफे के साथ तो सरकार का आकार सात वर्षों में दोगुना हो जाएगा। 12 फीसदी के हिसाब से तो यह महज 5.8 वर्ष में दोगुना हो जाएगा। यह सीधे-सीधे अर्थव्यवस्था के विकास में रोड़े डालेगा। एक सफल और तेज अर्थव्यवस्था निजी क्षेत्र के नवाचार और रचनात्मकता से आगे बढ़ती है। 
 
क्या सरकार अगले पांच वर्षों में केंद्र सरकार के आकार को तेजी से बढ़ाना चाहती है? दरअसल, इसके पीछे दूसरे कारण भी हो सकते हैं। बजट के आंकड़े मुझे अक्सर बीते दशक के आंकड़ों की याद दिलाते हैं। वर्ष 2015 के बाद से महंगाई की दर में तेज गिरावट आई है। इससे पहले हम अक्सर महंगाई के लिए 8 फीसदी की दर को लेते थे, लेकिन भारतीय रिजर्व बैंक कानून में अब आरबीआई के लिए 4 फीसदी के महंगाई दर का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। इसीलिए रिजर्व बैंक का पूरा ध्यान अब 4 फीसदी के महंगाई दर को हासिल करने पर लगा सकता है। इसीलिए जब हमें 4 फीसदी महंगाई दर की आदत हो जाएगी, तो हम निचले स्तर के आंकड़ों को भी स्वीकारने लग जाएंगे। 
 
एक वक्त देश में 12 फीसदी की विकास दर की बातें आम होती थीं और राजकोषीय योजना में उसे जगह भी मिलती थी। उस वक्त तो 8 फीसदी महंगाई दर के साथ असल विकास दर 4 फीसदी ही मानी जाती थी। अब जब महंगाई दर आधी रह गई है, तो 12 फीसदी का मतलब 8 फीसदी असल विकास होता है। मतलब देश की अर्थव्यवस्था हर नौ साल में दोगुनी हो जाएगी। सरकार की आर्थिक और राजकोषीय नीतियों को भी हकीकत के धरातल पर उतरना होगा। 
Keyword: nirmala sitaraman, economy, budget,,
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