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मरम्मत और सुधार

संपादकीय /  July 05, 2019

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने राजकोषीय मोर्चा दुरुस्त करने के मामले में अच्छा काम किया है। इसके साथ ही उन्होंने वित्तीय क्षेत्र में कुछ ऐसे नवाचार किए हैं जिनका दूरगामी असर होगा। उन्होंने सार्वजनिक क्षेत्र की परिभाषा में भी कुछ बदलाव किए हैं। खेद की बात है कि कर के मामले में वित्त मंत्री ने भी उस पुरानी भारतीय परंपरा का निर्वाह किया है जिसमें अमीरों से वसूली की जाती है। आयात शुल्क सीमा में इजाफा किया गया है और पेट्रोलियम उत्पाद महंगे किए गए हैं। व्यय की बात करें तो पांच महीने पहले पेश किए गए अंतरिम बजट में बहुत कम बदलाव किए गए हैं। राजकोषीय जवाबदेही की प्रतिबद्धता प्रशंसनीय है लेकिन बजट के आंकड़ों से परे कहीं अधिक अहम बदलाव मुमकिन हैं। 

 
पहले राजकोषीय प्रयास की बात करते हैं। वित्त मंत्री ने राजकोषीय घाटे को कम कर सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 3.3 फीसदी पर लाकर अच्छा काम किया है क्योंकि कर आधार अंतरिम बजट के समय जताए गए अनुमान से काफी कम रहा है। वर्ष के संशोधित अनुमान निराशाजनक ढंग से अपेक्षा से दूर रहे। महालेखा नियंत्रक द्वारा दिए गए 'प्रारंभिक वास्तविक' आंकड़े से राजस्व में 1.6 लाख करोड़ रुपये की चूक नजर आई। सीतारमण ने अपने लंबे बजट भाषण में कहीं भी इसका जिक्र नहीं किया। फिर भी गत वर्ष कर राजस्व में आई कमी ने उन्हें कर राजस्व लक्ष्य में अंतरिम बजट की तुलना में 91,000 करोड़ रुपये कम करने पर मजबूर किया। बाकी फासले की भरपाई उच्च विनिवेश अनुमान और आरबीआई से मिलने वाले भारी भरकम लाभांश से की गई है। यह अच्छा प्रयास है लेकिन नए आंकड़ों में भी दिक्कत हो सकती है। अनुमान है कि कर राजस्व 18 फीसदी बढ़ेगा जबकि सांकेतिक जीडीपी 12 फीसदी से अधिक नहीं बढ़ेगी। बेहतर राजस्व के ऐसे अनुमान हमेशा कारगर नहीं रहते। पहली तिमाही में वस्तु एवं सेवा कर से प्राप्त राजस्व उत्साहजनक नहीं रहा है। व्यय के मोर्चे पर गत वर्ष के कई बिल बकाया हैं जिन्हें अब चुकाना होगा। अब यह साफ है कि खाद्य सब्सिडी का बिल चुकाने के लिए बजट से इतर ली गई 90,000 करोड़ रुपये की उधारी को कैसे वितरित किया जाएगा? घाटे के शीर्ष आंकड़े तक पहुंचने के लिए इतना पर्याप्त नहीं है और वह आंकड़ा विश्वसनीय भी नजर आना चाहिए। जहां तक कर क्षेत्र के प्रयासों की बात है तो शुल्क बढ़ाने की घातक प्रवृत्ति कोई-न-कोई वजह देकर जारी रखी गई है। यह संरक्षणवाद का उदाहरण है जिस पर नियंत्रण करना होगा। उच्च आयवर्ग पर लगने वाली कर दरों में लगातार इजाफा भी ऐसी ही घातक प्रवृत्ति है। पी चिदंबरम ने दो दशक पहले उच्चतम आय वर्ग पर 30 फीसदी कर लगाया था और वह दर अब तक अपरिवर्तित है लेकिन उसमें अधिभार और उपकर लगातार जोड़े जाते रहे हैं। नवीनतम वृद्धि के बाद प्रभावी उच्चतम दर 42 फीसदी हो गई है। इसका शायद ही विरोध हो क्योंकि सात करोड़ रिटर्न वाले इस देश में 50,000 से भी कम करदाता इस दायरे में आते हैं। लेकिन लंबी अवधि में इससे नुकसान होगा। शायद उच्च कर दर को संपदा शुल्क दोबारा लगाने का बेहतर विकल्प माना गया। कंपनी जगत की बात करें तो 25 फीसदी कर दर के लिए किसी कंपनी के टर्नओवर की सीमा को 250 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 400 करोड़ रुपये करना समझ से परे है। कुछ कर रियायतें खत्म करना और सभी कंपनियों केलिए सांकेतिक दर कम करना क्या बेहतर नहीं होता? 
 
वित्त मंत्री अन्य सुधारात्मक प्रयासों में अधिक कल्पनाशील रही हैं। अगर वह सार्वजनिक कंपनियों में सरकारी हिस्सेदारी 51 फीसदी से कम करने का वादा पूरा करने में सफल रही हैं तो उन्हें इन कंपनियों को केंद्रीय सतर्कता आयोग, केंद्रीय जांच ब्यूरो और सीएजी की निगरानी से भी बाहर लाना होगा। यह देखना होगा कि परिचालन में अधिक आजादी मिलने से उनका प्रदर्शन भी बेहतर होता है या नहीं। इस बीच 44 श्रम कानूनों की जगह चार श्रम संहिताएं लाना, विदेशी निवेश के नए दरवाजे खोलना और इस्तेमाल नहीं हो रही सरकारी जमीन के वाणिज्यिक इस्तेमाल का प्रस्ताव अहम है। हालांकि पूरी हो चुकी ढांचागत परियोजनाओं की बिक्री और उससे मिले धन का इस्तेमाल नए ढांचागत निवेश में करने जैसे कदम भी उठाए जा सकते थे। अधिक रोचक बदलाव वित्तीय नवाचार के क्षेत्र में हैं। घरेलू बाजार के अलावा बाहर से भी उधार लेने का प्रस्ताव इसी श्रेणी में आता है। अगर इसे सुरक्षित दायरे में अंजाम दिया जाता है तो यह एक अच्छा विचार है। अगर भारत विदेश में 2.5 फीसदी दर पर उधार लेता है और तीन फीसदी दर से देता है तो वह घरेलू उधारी से सस्ता ही पड़ेगा। इससे घरेलू स्तर पर निजी निवेश के अधिक मौके बनेंगे। इस बीच बॉन्ड बाजार के प्रोत्साहन, एनबीएफसी से गुïणवत्ता वाली परिसंपत्तियां खरीदने के लिए बैंकों को मंजूरी और विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की राह आसान बनाने के लिए भी वादे किए गए हैं। 
 
सवाल यह है कि क्या इस बजट में आर्थिक वृद्धि को बढ़ावा देने के लिए पर्याप्त प्रावधान किए गए हैं? वृद्धि दर के सात फीसदी रहने का आर्थिक समीक्षा का अनुमान आशावादी नजरिया ही दर्शाता है। हालांकि वित्त मंत्री ने मुश्किल राजकोषीय परिवेश में भी ब्याज दरों को नीचे रखने और वित्तीय क्षेत्र को मुश्किल दौर से निकालने में मदद देने जैसे मसलों का हल निकालने की कोशिश की है। देखना होगा कि उनका यह प्रयास काफी होता है या नहीं। 
Keyword: nirmala sitaraman, economy, budget,,
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