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आधार से जुड़ी भुगतान व्यवस्था से सुधरी मनरेगा

संजीव मुखर्जी / नई दिल्ली July 04, 2019

आर्थिक समीक्षा 2018-19 में लखनऊ के नवाब आसफुद्दौला के उस दोषपूर्ण योजना अकाल पीडि़तों के लिए काम के बदले भोजन का उल्लेख करते हुए पिछली सरकारों में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) के क्रियान्वयन की आलोचना की गई है। इसमें बताया गया है कि 2015 में खोले गए जन धन खातों में तब से आधार से जुड़े भुगतान करने की व्यवस्था के बाद से यह आधारभूत रूप से कितना बदल गया है।   लखनऊ में 1784 में आसफुद्दौला के काम के बदले भोजन कार्यक्रम के तहत दिन में मजदूरों को इमामबाड़ा के निर्माण के काम में लगाया जाता था और रात में दूसरे मजदूर समूह से उसी निर्माण को ध्वस्त करने का काम लिया जाता था। मुख्य आर्थिक सलाहकार (सीईए) कृष्णमूर्ति सुब्रमण्यन ने अपने पहले आर्थिक समीक्षा में एक पूरा अध्याय मनरेगा में डीबीटी लागू करने के बाद समय पर मजदूरी भुगतान में आए सुधार, दाखिल किए जाने वाले मस्टर रॉल की संख्या में वृद्घि, बढ़ी हुई मांग और योजना के तहत काम की आपूर्ति के बारे में बताने के लिए दिया है। इसमें यह बताया गया है कि यह महिला, दिव्यांग, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति जैसे वंचित वर्गों की आर्थिक तंगी को दूर करने में भी सहायक हुआ है। 
 
समीक्षा में कहा गया है कि इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि इसने योजना में होने वाले रिसाब को तो रोका ही है फर्जी मजदूर भी इससे बाहर हो गए हैं। इसमें कहा गया है कि जो ब्लॉक सूखे से प्रभावित नहीं है वहां आधार से जुड़े भुगतान का काम मांगने वाले लोगों की संख्या पर कोई असर नहीं हुआ है लेकिन सूखा प्रभावित ब्लॉकों में इस सुविधा के बाद काम मांगने वालों की संख्या में 20.7 फीसदी का उछाल आया है।  2015 में सरकार ने देश के बैंकिंग व्यवस्था के अधिक प्रसार वाले 300 जिलों में मनरेगा में आधार से जुड़े भुगतान सुविधा की शुरुआत की थी। जबकि बाकी बचे जिलों को 2016 में इसके दायरे में लाया गया। समीक्षा में कहा गया है कि मनरेगा के तहत सक्रिय 11.61 करोड़ मजदूरों में से अब तक 10.16 करोड़ मजदूरों (87.51 फीसदी) का आधार लिया जा चुका है और उसे इससे जोड़ा जा चुका है। 
 
फिलहाल मनरेगा के तहत होने वाले सभी भुगतानों में से करीब 55.05 फीसदी भुगतान आधार आधारित भुगतान प्रणाली से किया जाता है। मनरेगा मॉडल से प्रभावित होकर सुब्रमण्यन ने अपनी सिफारिशों में पीडीएस, छात्रवृत्ति कार्यक्रम, एलपीजी सब्सिडी आदि सरकारी योजनाओं में आधार से जुड़ी भुगतान प्रणाली और अन्य उन्नत तकनीक को शामिल करने की बात कही है। समीक्षा में कहा गया है, 'छात्रवृत्ति या पेंशन जैसी नकद लाभ के अंतरण वाले कार्यक्रमों और किरोसिन, एलपीजी, जन वितरण प्रणाली (पीडीएस), उर्वरकों आदि पर दी जाने वाली मूल्य सब्सिडियों तथा दूसरी इनपुट सब्सिडियों में डीबीटी को लागू कर योग्य व्यक्ति को इससे बाहर रखे जाने और गैर-गरीब को इसमें शामिल किए जाने जैसी खामियों को दुरुस्त करने की जरूरत है। इससे सार्वजनिक खर्च ज्यादा प्रभावी होगा और प्रभावपूर्ण तरीके से लक्षित होगा।' 
 
समीक्षा में कहा गया है कि आधार से जुड़े भुगतान सेवा के पहले के मुकाबले अब बैंकों खातों में होने वाला भुगतान लगभग दोगुना हो गया है। पहले जहां 1.82 करोड़ रुपये प्रति ब्लॉक प्रतिवर्ष जाता था वहीं अब यह 3.98 करोड़ रुपये प्रति ब्लॉक प्रति वर्ष हो गया है। यह दिखाता है कि आधार से जुड़े भुगतान सेवा शुरू करने बाद डीबीटी के जरिये अधिक रकम का प्रवाह हुआ है। हालांकि, सामाजिक कार्यकर्ताओं और मनरेगा पर काम करने वाले लोगों का कहना है कि सरकार के दावे के उलट मनरेगा में आधार से जुड़ी भुगतान प्रणाली और डीबीटी के आने से योजना के तहत पात्र मजदूर बाहर हुए हैं और समय पर भुगतान की सुविधा बढऩे की बजाय इससे मजदूरों को ज्यादा नुकसान पहुंचा है।
 
मजदूर किसान शक्ति संगठन के निखिल डे ने बिज़नेस स्टैंडर्ड से कहा, 'मनरेगा में आधार से जुड़े भुगतान और डीबीटी की शुरुआत से पहले इस कार्यक्रम के तहत 10 करोड़ से अधिक बैंक खाते खोले गए थे जिसमें मजदूरी जमा कराई जाती थी। अब आधार से जुड़े भुगतान के आने से बस इतना हुआ है कि पात्र मजदूर इससे बाहर हो गए हैं और कई पात्र लोगों को लाभ देने से मना कर दिया गया है।' उन्होंने कहा कि समीक्षा में दावा किया गया है कि आधार से जुड़े भुगतान सेवा को शुरू करने के बाद मनरेगा के तहत दाखिल होने वाले मस्टर रॉल की संख्या में इजाफा हुआ है जो कि गलत है। इसकी वजह है कि काम की मांग हमेशा से ही गरीब तबकों वाले जिलों से अधिक रही है। 
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