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न्यूनतम वेतन प्रणाली समग्र विकास के लिए जरूरी

सोमेश झा / नई दिल्ली July 04, 2019

वित्त वर्ष 2018-19 की आर्थिक समीक्षा में न्यूनतम वेतन ढांचे पर खासा जोर दिया गया है। गुरुवार को संसद में पेश आर्थिक समीक्षा के अनुसार भारत के समग्र विकास के लिए एक प्रभावी न्यूनतम वेतन प्रणाली तत्काल लाए जाने की जरूरत है। समीक्षा में कहा गया है, 'श्रमिकों की हितों की सुरक्षा और गरीबी उन्मूलन के लिए न्यूनतम वेतन प्रणाली का पुख्ता ढांचा एक प्रभावी हथियार साबित हो सकती है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर होने वाली गतिविधियों से यह साफ हो गया है कि अपेक्षाकृत सरल प्रणाली अधिक प्रभावी होती है, जबकि इसकी तुलना में एक जटिल तंत्र सबसे कम बदलाव ला पाता है।'
 
समीक्षा में वेतन विधेयक पर संहिता की हिमायत की गई है, जिस पर केंद्रीय मंत्रिमंडल ने बुधवार को मुहर लगा दी थी। समीक्षा में मौजूदा न्यूनतम वेतन प्रणाली को जटिल करार दिया गया है, जिसमें विभिन्न राज्यों में रोजगार की 1,975 श्रेणिया हैं।  मौजूदा राष्ट्रीय फ्लोर लेवल न्यूनतम वेतन के मुकाबले समीक्षा में 'नैशनल फ्लोर मिनिमम वेज' पर जोर दिया गया है, जो पांच भौगोलिक क्षेत्रों में अलग-अलग हो सकता है। समीक्षा में कहा गया है, 'राज्य न्यूनम वेतन तय कर सकते हैं, लेकिन यह एक तय निश्चित वेतन से कम नहीं होंगा। इससे पूरे देश में न्यूनतम वेतन के निर्धारण में समानता आएगी। इससे निवेश के लिए श्रम लागत के लिहाज से देश के सभी राज्य समान रूप से आकर्षक हो जाएंगे और और लाचारी के कारण होने वाले पलायन पर भी नियंत्रण पाया जा सकेगा।'
 
समीक्षा के अनुसार भौगोलिक क्षेत्रों के आधार पर चार श्रेणियों- अकुशल, अद्र्ध कुशल, कुशल और अति कुशल- के लिए न्यूनतम वेतन का निर्धारण किया जाना चाहिए। समीक्षा में कहा गया है कि मौजूदा प्रणाली सरल बनाने के लिए वेतन सीमा से इतर सभी श्रमिकों को शामिल किया जाना चाहिए।  आर्थिक समीक्षा में कहा गया है कि तकनीक की मदद से एक सरल और लागू हो पाने वाली न्यूनतम वेतन प्रणाली तैयार की जानी चाहिए। समीक्षा के अनुसार न्यूनतम वेतन से पारिश्रमिक बढ़ता है और रोजगार पर खास असर डाले बिना यह वेतन असमानता दूर करता है। सर्वेक्षण में निकारागुआ, नीदरलैंड्स, उरुग्वे और कोस्टा रिका की तर्ज पर न्यूनतम वेतन में नियमित बदलाव करने का सुझाव दिया गया है। इन देशों में हरेक छह महीने में वेतन में आवश्यक बदलाव किए जाते हैं।   
 
इसमें राष्ट्रीय स्तर पर एक ऐसा मंच गठित करने का सुझाव दिया गया है, जहां सभी राज्यों की पहुंच होगी और वहां न्यूनतम वेतन के संबंध में अधिसूचनाएं अद्यतन होती रहेंगी। इससे श्रमिकों के पास पर्याप्त जानकार रहेगी और वे अपने कौशल के हिसाब से वेतन पा सकेंगे।  वेतन विधेयक पर प्रस्तावित संहिता में वेतन से जुड़े चार कानून-न्यूनतम वेतन अधिनियम, 1948, वेतन भुगतान अधिनियम, 1936, बोनस भुगतान अधिनियम,1965 और समान वेतन अधिनियम, 1976- शामिल होंगे। इसमें एक सांविधिक राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन का भी प्रस्ताव है, जिसे राज्य सरकारें रोजगार की सभी चार श्रेणियों के लिए लागू करेंगी।
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