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नागरिकों के डेटा बेचने के लिए बने ढांचा

नेहा अलावधी और करण चौधरी / नई दिल्ली/बेंगलूरु July 04, 2019

आर्थिक समीक्षा में जनहित के तौर पर डेटा (जानकारियां) के इस्तेमाल और इनके लिए ढांचा तैयार करने का सुझाव दिया गया है। सुझाव में विभिन्न मंत्रालयों में डेटा केंद्रीकरण की बात कही गई है। हालांकि समीक्षा में नागरिकों से जुड़ी जानकारियां बेचने के सुझाव पर कई तरह की आशंकाएं जताई गई हैं। ऐसी आशंकाओं की बुनियाद यह है कि भारत में डेटा सुरक्षा या गोपनीयता से जुड़ा कोई असरदार कानून अस्तित्व में नहीं है।  समीक्षा में डिजिटल स्टोरेज और डेटा प्रोसेसिंग पर जोर दिया गया है। इसमें कहा गया है कि तकनीक ने सूचना संग्रह, इनका भंडारण, इनकी प्रोसेसिंग और प्रसार से जुड़े कार्यों पर लागत कम करने और प्रक्रिया आसान बनाने में अहम भूमिका निभाई है। समीक्षा में कहा गया है,'लोगों का डेटा लोगों द्वारा तैयार होता है और इनका इस्तेमाल भी लोगों के लिए ही होना चाहिए। जनहित के लिए डेटा का श्रेष्ठतम इस्तेमाल होना चाहिए।' इस तरह, समीक्षा में सरकार को डेटा गोपनीयता के दायरे में रहकर जनहित के लिए डेटा भंडार तैयार करने का सुझाव दिया गया है। 

 
आर्थिक समीक्षा में 'डेटा: ऑफ द पीपुल, बाय द पीपुल, फॉर द पीपुल' के नाम से एक विस्तृत खंड में एक डैशबोर्ड बनाने का सुझाव दिया गया है। इसका मकसद सरकार के साथ नागरिकों द्वारा साझा की जाने वाली जानकारियों के आधार पर सरकारी सेवाओं को लोगों तक पहुंचाने में सुधार करना है।  समीक्षा के अनुसार एक इसके लिए बुनियादी ढांचा तैयार होने के बाद लोगों तक कल्याणकारी योजनाओं और सब्सिडी की पहुंच के मोर्चे पर त्रुटिया कम हो जाएंगी। समीक्षा में कहा गया है,'निजी क्षेत्रों को व्यावसायिक इस्तेमाल के लिए कुछ खास डेटाबेस तक पहुंच की अनुमति दी जा सकती है। लोकहित के तौर पर डेटा की अवधारणा के मद्देनजर लाभ के लिए इनके व्यावसायिक इस्तेमाल पर रोक लगाने की कोई वजह नहीं है। हालांकि सामाजिक लाभ सरकार के खर्च से कहीं अधिक रहेंगे, सरकार पर वित्तीय दबाव कम करने के लिए कम से कम डेटा के एक हिस्से की बिक्री की जानी चाहिए। निजी क्षेत्र को डेटा से काफी लाभ पहुंच सकता है, इसके मद्देनजर इनके(डेटा) इस्तेमाल के लिए शुल्क लेना वाजिब की माना जाएगा। समीक्षा में यह भी कहा गया है कि डेटासेट एनालिटिक्स एजेंसियों को बेचे जा सकते हैं। ये एजेंसियां डेआ प्रोसेस कर सूक्ष्म तथ्यों की जानकारियां हासिल करती हैं और बाद में इन्हें कंपनियों को बेच देती हैं। कंपनियां इन सूचनाओं का इस्तेमाल कर बाजार में मांग आदि का अंदाजा लगाती हैं और नए उत्पाद उतारने के साथ उन बाजारों का पता लगाती हैं, जहां कारोबार की भरपूर संभावनाएं हैं। फिलहाल देश में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जिसमें सरकार या अन्य सूचनाओं की बिक्री किा जाने का जिक्र है। प्रस्तावित पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन बिल ने अपने अंतिम मसौदे में इस मुद्दे पर व्यापक रूप से कुछ नहीं कहा है। 
 
कानूनी एवं सामाजिक प्रभाव
 
नागरिकों से जुड़ी सूचनाएं सरकार द्वारा बेचने के सुझाव पर कानूनी जानकारों ने बहुत उत्साह नहीं दिखाया है। इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन में कार्यकारी निदेशक अपार गुप्ता कहते हैं, 'आम तौर पर सरकार नागरिकों की सूचनाएं नहीं बेचती हैं, लेकिन इस तरह के सुझावों पर पहले ही अमल हो चुका है। उदाहरण के लिए सड़क एवं राजमार्ग मंत्रालय ने वाहनों के पंजीकरण से जुड़ी सूचनाएं बेचने की नीति की घोषणा की। इससे चिंताएं और बढ़ जाती हैं क्योंकि भारत में कोई पुख्ता डेटा सुरक्षा कानून नहीं है।' टेकलेगिस एडवोकेट्स ऐंड सॉलिसिटर्स के सलमान वारिस के अनुसार अगर दो प्रस्तावित विधेयक पारित हो जाते हैं तो यह आर्थिक समीक्षा में प्रस्तावित सुझाव के बिल्कुल विपरीत होंगे। 
 
सबका डेटा हो एक जगह इकट्ठा
 
इस साल फरवरी में पेश की गई मसौदा ई-कॉमर्स नीति में सामुदायिक डेटा का साझा करने के लिए पहला सुझाव दिया गया था। उस आधार पर, आर्थिक समीक्षा में यह स्पष्ट किया गया है कि डेटा स्टोरेज की प्रति गीगाबाइट लागत 1981 के 61,050 रुपये से घटकर आज महज 3.48 रुपये कैसे रह गई है और डेटा एनालिटिक्स तेजी से बढ़ा है। मोबाइल डेटा और ब्रॉडबैंड के बेहद सस्ता होने की वजह से इंटरनेट पर डेटा प्रसार की लागत बेहद मामूली है। इसे ध्यान में रखते हुए आर्थिक समीक्षा में नागरिकों का डेटा एक समग्र डेटाबेस के तहत विभिन्न मंत्रालयों और विभागों से जोडऩे का प्रस्ताव रखा गया है। पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन बिल के मसौदे से पहले इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय द्वारा जारी श्वेत पत्र में निजी तथा सरकारी इकाइयों द्वारा डेटा के अनियंत्रित संग्रह और इस्तेमाल से जुड़ी चिंताओं के बारे में जानकारी दी गई। श्वेत पत्र में कहा गया है, 'कुछ चिंताएं डेटाबेस के केंद्रीकरण, व्यक्तियों के प्रोफाइल तैयार करने, निगरानी बढऩे और व्यक्तिगत स्वायत्तता में कमी आने से संबंधित हैं।' हालांकि डेटा के मुद्दे पर सरकार की सोच पिछले कुछ वर्षों में बदली है। समीक्षा में तेलंगाना सरकार की समग्र वेदिका पहल का उदाहरण दिया गया है, जिसमें डेटा को समेकित किए जाने के संभावित लाभ का अनुमान व्यक्त किया गया है। इसमें कहा गया है, 'यह पहल लगभग 25 मौजूदा सरकारी डेटाबेस से संबंधित है। ये डेटा व्यक्ति के नाम और पते के साथ एक सामान्य पहचानकर्ता के तौर पर शामिल हैं। प्रत्येक व्यक्ति के बारे में जानकारी की सात श्रेणियां इस समेकन पहल में शामिल हैं - अपराध, परिसंपत्तियां, यूटिलिटीज, सब्सिडी, शिक्षा, कर और पहचान की जानकारी। 
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